आर्कबिशप ने ईशनिंदा क़ानून समर्थक इसराइल-विरोधी मुस्लिम मौलवी का सम्मान वापस लिया
रश्दी को नाइट की उपाधि मिलने पर इस पाकिस्तानी धर्मगुरु ने ओसामा बिन लादेन को “तलवार-ए-ख़ुदा” की उपाधि दी थी।
जूल्स गोम्स रोम में रहने वाले बाइबिल विद्वान और पत्रकार हैं।

कैंटरबरी की आर्कबिशप सारा मुलैली (Sarah Mullally) ने एक मुस्लिम मौलवी को दिया गया प्रतिष्ठित सम्मान वापस ले लिया है, जो पाकिस्तान के ईशनिंदा और बाल विवाह क़ानूनों को हटाए जाने का विरोध करते हैं और जिन्होंने यहूदियों तथा ईसाइयों पर परमाणु क्षमता-संपन्न पाकिस्तान को तबाह करने की साज़िश रचने का आरोप लगाया है।
मुलैली ने 11 सितंबर 2026 को लैम्बेथ पैलेस में हाफ़िज़ मुहम्मद ताहिर महमूद अशरफ़ी (Hafiz Muhammad Tahir Mehmood Ashrafi) को सुलह और अंतरधार्मिक सहयोग के लिए दिया जाने वाला ह्यूबर्ट वॉल्टर पुरस्कार प्रदान किया था। अशरफ़ी ओसामा बिन लादेन को भी सम्मानित कर चुके हैं और आत्मघाती हमलों का समर्थन कर चुके हैं। सोशल मीडिया पर तीख़ी प्रतिक्रिया के बाद आर्कबिशप ने 17 सितंबर को यह पुरस्कार वापस ले लिया।
लैम्बेथ पैलेस द्वारा जारी एक तस्वीर में मुलैली अशरफ़ी के साथ, और दो महिलाओं के साथ खड़ी दिखाई देती हैं, जो अशरफ़ी की पत्नी और बेटी प्रतीत होती हैं। मौलवी की पत्नी पूरी काली बुर्क़ा पहने हैं; बेटी ने चेहरे पर नक़ाब डाला हुआ है। लैम्बेथ पैलेस ने अशरफ़ी की “पाकिस्तान में अंतरधार्मिक सौहार्द के दूत के रूप में उनके उत्कृष्ट कार्य” के लिए प्रशंसा की थी।
अशरफ़ी इस्लाम के देवबंदी पंथ से ताल्लुक़ रखते हैं, जो तालिबान के धार्मिक आधार का बड़ा हिस्सा है। वे पाकिस्तान उलेमा काउंसिल के प्रमुख हैं, जो पाकिस्तान के ईशनिंदा क़ानूनों को ख़त्म किए जाने का विरोध करती है। इन क़ानूनों के चलते सैकड़ों ईसाइयों, अहमदियों, हिंदुओं, सिखों और सुधारवादी मुसलमानों को जेल भेजा गया या मार डाला गया है।
2012 में पुलिस द्वारा क़ुरआन के कथित अपमान के आरोप में एक मानसिक रूप से अक्षम 11 वर्षीय ईसाई लड़की को गिरफ़्तार किए जाने के बाद अशरफ़ी ने कहा था कि पाकिस्तान उलेमा काउंसिल “ईशनिंदा क़ानून के विवेकपूर्ण इस्तेमाल” का समर्थन करती है “लेकिन कमज़ोर आधारों पर या अंतरराष्ट्रीय दबाव में इस क़ानून को ख़त्म करने की कभी इजाज़त नहीं देगी।” अशरफ़ी ने कहा, “ईशनिंदा से जुड़े क़ानून को न रद्द किया जा सकता है, न उसमें संशोधन हो सकता है। पाकिस्तान को उदारवादी देश में बदलने की किसी भी कोशिश को नाकाम किया जाएगा।”
एक बहुचर्चित मामले में, पाकिस्तानी तालिबान ने 2011 में पाकिस्तान के इकलौते ईसाई राज्यमंत्री शहबाज़ भट्टी की हत्या कर दी थी, जब उन्होंने ईशनिंदा के लिए मृत्युदंड समाप्त करने की मांग की थी। इससे पहले, पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या उनके ही अंगरक्षक ने कर दी थी, क्योंकि उन्होंने ईशनिंदा की आरोपी ईसाई महिला आसिया बीबी का बचाव किया था।
2023 में पंजाब के जरांवाला में दो ईसाई निवासियों पर ईशनिंदा के आरोप लगने के बाद 1,200 पुरुषों की भीड़ ने 22 गिरजाघरों में आग लगा दी और 91 ईसाई घरों, कारोबारों तथा क़ब्रिस्तानों पर हमला किया। अशरफ़ी ने माफ़ी मांगते हुए कहा था कि “हमलावरों ने हमें शर्मसार किया है।”
ब्रिटिश-पाकिस्तानी महिला अधिकार कार्यकर्ता नूरिया ख़ान (Nuriyah Khan) ने कहा, “आर्कबिशप मुलैली इससे ज़्यादा बेसुरा चुनाव शायद ही कर सकती थीं। पाकिस्तानी ईसाई उन ईशनिंदा क़ानूनों के साये में जीते हैं, जिनका अशरफ़ी खुलकर समर्थन करते हैं। भले ही वे दावा करें कि वे इनके दुरुपयोग के ख़िलाफ़ हैं, पाकिस्तान की हक़ीक़त यही है कि महज़ एक आरोप किसी की जान ले सकता है।”
ख़ान ने शमा बीबी और शहज़ाद मसीह के मामले का ज़िक्र किया, जिस युवा ईसाई दंपति को ईशनिंदा के आरोप लगने के बाद पीटकर ज़िंदा जला दिया गया था। उन्होंने कहा, “शमा गर्भवती थीं। मेरी समझ में नहीं आता कि आर्कबिशप उस घटना को देखकर यह कैसे तय कर सकती हैं कि इन क़ानूनों का बचाव करने वाला कोई व्यक्ति ‘अंतरधार्मिक सौहार्द’ के पुरस्कार का हक़दार है।”
आइडियोलॉजिकल डिफ़ेंस इंस्टीट्यूट (Ideological Defense Institute) की फ़ेलो और इस्लामी क़ानून की विशेषज्ञ ख़ान ने कहा, “महिलाओं और बच्चों को लेकर उनका रिकॉर्ड भी इसी तरह की जाँच के दायरे में आना चाहिए। अशरफ़ी पाकिस्तान की इस्लामी विचारधारा परिषद के सदस्य थे, जब उसने यह घोषित किया था कि विवाह के लिए न्यूनतम आयु तय करने वाले क़ानून ग़ैर-इस्लामी हैं।”
रीजेंट यूनिवर्सिटी के इसराइल इंस्टीट्यूट के निदेशक ए.जे. नोल्टे (A.J. Nolte) ने कहा, “ईशनिंदा क़ानूनों का इस्तेमाल पाकिस्तान समेत कई मुस्लिम देशों में दशकों से ईसाइयों को सताने के लिए होता आया है। पाकिस्तान में ईसाई लड़कियों को नियमित रूप से बाल विवाह के लिए मजबूर किया जाता रहा है। यह बेहद चिंताजनक है कि कैंटरबरी की आर्कबिशप ने इन प्रथाओं के समर्थक को सम्मानित करने का फ़ैसला किया।”
जुलाई 2026 की ब्रिटिश गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट में कहा गया कि ईशनिंदा क़ानूनों के तहत मृत्युदंड तक दिया जा सकता है। 2024 में ईशनिंदा क़ानूनों के तहत आरोपित 344 लोगों में 20 ईसाई थे, जबकि 2023 में 329 आरोपितों में से 11 ईसाई थे। रिपोर्ट में कहा गया कि कम से कम नौ ईसाइयों को जेल में डालकर मृत्युदंड या आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई, और नौ अन्य को हिरासत में रखा गया।
अशरफ़ी का हिंसा का समर्थन कोई नई बात भी नहीं है। जब ब्रिटेन ने 2007 में सलमान रश्दी को नाइट की उपाधि दी, तो अशरफ़ी ने जवाब में 9/11 हमलों के सूत्रधार को सम्मानित किया। अशरफ़ी ने कहा था, “ब्रिटिश सरकार द्वारा ईशनिंदा करने वाले रश्दी को ‘Sir’ की उपाधि देने के फ़ैसले के बाद हमें ओसामा बिन लादेन को सैफ़ुल्लाह [ख़ुदा की तलवार] की उपाधि देते हुए ख़ुशी हो रही है।” 2013 में अशरफ़ी ने कहा था कि “अफ़ग़ानिस्तान में आत्मघाती हमले जायज़ हैं, क्योंकि नाटो सैनिक हमलावर हैं जिन्होंने देश पर क़ब्ज़ा कर रखा है,” हालाँकि बाद में उन्होंने दावा किया कि पत्रकारों ने उनकी बात संदर्भ से काटकर पेश की। अशरफ़ी की जाँच-परख के दौरान ऐसे सार्वजनिक बयानों को नज़रअंदाज़ कर आर्कबिशप ऐसे आतंकवाद को तर्कसंगत ठहराती और स्वीकार करती प्रतीत होती हैं। अशरफ़ी ने सरकार से उन पाकिस्तानियों पर मुक़दमा चलाने की मांग भी की है जो इसराइल जाते हैं, क्योंकि उन्होंने “मुस्लिम उम्मा के दिलों को ज़ख़्मी किया है।”
मुलैली द्वारा ऐसे मौलवी को यह पुरस्कार देना, जो इसराइल नामक “नाजायज़ राज्य” को पाकिस्तान द्वारा मान्यता दिए जाने का विरोध करते हैं, उकसाने वाला है—ख़ासकर चर्च ऑफ़ इंग्लैंड द्वारा फ़लस्तीनी कैरोस II दस्तावेज़ को मंज़ूरी दिए जाने पर यहूदी समुदाय के साथ हाल में हुए उनके टकराव के बाद। यह दस्तावेज़ इसराइल को यहूदी वर्चस्ववादी राज्य बताकर उसकी निंदा करता है और 7 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा यहूदियों के नरसंहार का बचाव करता है।
ख़ान ने अफ़सोस जताते हुए कहा, “मुलैली महिलाओं के अधिकारों और कमज़ोर लोगों की रक्षा पर बहुत बोलती हैं। फिर भी उन्होंने एक ताक़तवर मौलवी को सम्मानित करना चुना और उन ईसाइयों तथा महिलाओं से पूरी तरह बेख़बर रहीं जिनके अधिकार पाकिस्तान में धार्मिक सत्ता की भेंट नियमित रूप से चढ़ा दिए जाते हैं। यह पाखंड नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है। इसे ‘अंतरधार्मिक सौहार्द’ कहना इस शब्द का मज़ाक़ उड़ाना है।”
लैम्बेथ पैलेस ने पहले कहा था कि उसे अशरफ़ी से जुड़ी, ऑनलाइन प्रसारित टिप्पणियों की जानकारी है और वह तत्काल इस मामले की समीक्षा कर रहा है। बाद में उसने एक बयान जारी कर कहा कि अशरफ़ी द्वारा पहले की गई टिप्पणियाँ सामने आई हैं, जिनके चलते लैम्बेथ पैलेस ने पुनर्विचार करते हुए पुरस्कार वापस ले लिया।
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