MEF Menu
Middle East ForumSupport MEF
मिडिल ईस्ट फ़ोरम · Middle East Forum
Observer

क्या खाड़ी के अरब देश भारत और पाकिस्तान के बीच संतुलन साध रहे हैं

खाड़ी के अरब देश अब किसी एक पक्ष के साथ विशेष गठजोड़ के बजाय विशिष्ट क्षमताओं पर आधारित रिश्ते तलाश रहे हैं।

राधिका लक्ष्मीनारायणन शोधकर्ता और इतिहासकार हैं, जिन्होंने 3 दशकों से अधिक समय तक कुवैत और भारत की अग्रणी संस्थाओं के साथ काम किया है। वे Small States Security Dilemma—Kuwait after 1991 की लेखिका हैं।

The India-Pakistan Attari-Wagah border ceremony, a daily military drill held just before sunset.
भारत-पाकिस्तान की अटारी-वाघा सीमा पर होने वाला समारोह, जो हर दिन सूर्यास्त से ठीक पहले आयोजित किया जाने वाला सैन्य अभ्यास है। · Shutterstock

1947 में भारत और पाकिस्तान की आज़ादी और विभाजन के बाद से दोनों देश कई युद्ध लड़ चुके हैं और कश्मीर पर दावों, सीमा विवादों और आतंकवाद को लेकर उनके बीच टकराव बना हुआ है। पिछले एक दशक में भारत अपने ऐतिहासिक धर्मनिरपेक्ष रुख़ से हटकर अधिक साफ़ तौर पर हिंदुत्व-केंद्रित राजनीतिक एजेंडे की ओर बढ़ा है, जिसके साथ धार्मिक अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ कथित भेदभाव को लेकर चिंता भी बढ़ी है। खाड़ी के अरब देश पाकिस्तान की तरह मुस्लिम-बहुल हैं, जिनमें धार्मिक रूढ़िवाद अलग-अलग स्तर पर मौजूद है, फिर भी वे इन दोनों प्रतिद्वंद्वी देशों से रिश्ते निभाते समय आर्थिक व्यापार, सुरक्षा हितों और धार्मिक जुड़ाव को अलग-अलग रखते हैं और अपनी भू-रणनीतिक वास्तविकताओं को प्राथमिकता देते हैं।

भारत और पाकिस्तान मेज़ पर अलग-अलग प्रस्ताव रखते हैं। भारत आर्थिक आकार, तकनीक, निवेश, कनेक्टिविटी और विशाल उपभोक्ता बाज़ार देता है। पाकिस्तान सैन्य विशेषज्ञता देता है, जिसकी पुष्टि सऊदी अरब के साथ 2025 के रणनीतिक पारस्परिक रक्षा समझौते (Strategic Mutual Defense Agreement) और हाल में सऊदी अरब तथा तुर्की के साथ हुए मक्का संयुक्त समझौते (Mecca Joint Agreement) से होती है, जिसे कुछ मीडिया ने, शायद समय से पहले ही, “इस्लामी नेटो” बताया है। दशकों तक पाकिस्तान के सैन्यकर्मियों ने खाड़ी के अरब सशस्त्र बलों के साथ, ख़ासकर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात में, प्रशिक्षण लिया और सेवा दी। वित्तीय दबावों से बड़े पैमाने पर ग्रस्त पाकिस्तान को खाड़ी के अरब देशों से वित्तीय सहायता, ऊर्जा आपूर्ति और मिलियन पाकिस्तानियों के लिए रोज़गार के अवसर मिले। खाड़ी के अरब देशों के साथ मज़बूत रिश्ते पाकिस्तान को निवेश और कूटनीतिक गुंजाइश दे सकते हैं, साथ ही दक्षिण एशिया से परे एक प्रासंगिक सुरक्षा पक्ष के रूप में उसकी स्थिति को मज़बूत कर सकते हैं।

क्षेत्र में पाकिस्तान की उभरती सुरक्षा भूमिका अमेरिकी सुरक्षा गारंटी का विकल्प नहीं हो सकती, लेकिन उसकी सैन्य क्षमताएँ, परमाणु शक्ति का दर्जा और प्रशिक्षित रक्षा कर्मियों की तैनाती की क्षमता खाड़ी के अरब देशों को प्रतिरोधक क्षमता दे सकती है। फिर भी पाकिस्तान के सामने बड़ी आर्थिक और राजनीतिक बाधाएँ हैं और उसकी सीमाओं के भीतर आतंकवादी समूह सक्रिय हैं। पाकिस्तान के सुरक्षा प्रस्ताव का असली मूल्य इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या सैन्य क्षमता को विश्वसनीय और समयबद्ध कार्रवाई में बदला जा सकता है। सऊदी अरब पर हूती हमले और लाल सागर में बिगड़ती सुरक्षा स्थिति पहले ही यह परख रही है कि क्या उनकी सामूहिक रक्षा प्रतिबद्धताएँ परिचालन स्तर पर प्रतिरोधक क्षमता में बदल सकती हैं।

खाड़ी के अरब देशों ने विभाजन के बाद के भारत के साथ अपने रिश्ते की नींव ऊर्जा, व्यापार और मिलियन भारतीय कामगारों की श्रम-शक्ति पर रखी। भारत के लिए ये भारतीय अतिथि कामगार विप्रेषण (रेमिटेंस) के ज़रिए विदेशी मुद्रा का बड़ा स्रोत रहे, जिससे भारत का भुगतान संतुलन मज़बूत हुआ। भारत आज आर्थिक वृद्धि दिखा चुका है और वह तकनीक, सेवाओं, दवाओं, इंजीनियरिंग विशेषज्ञता और निवेश का स्रोत है। फ़रवरी 2026 में भारत और खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) ने मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत शुरू की, जिसका लक्ष्य वस्तुओं और सेवाओं के व्यापार, निवेश और आर्थिक सहयोग का विस्तार करना है। उनका रिश्ता पारंपरिक तेल-बदले-श्रम मॉडल से आगे बढ़ रहा है। आर्थिक विविधीकरण की तलाश में भव्य राष्ट्रीय दृष्टि पर काम कर रही खाड़ी की अरब सरकारों के लिए भारत महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्रों में योगदान दे सकता है। भारत के साथ यह रिश्ता हिंद महासागर में उसकी व्यापक महत्वाकांक्षाओं और भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे से भी जुड़ा है।

खाड़ी के अरब देश भारतीय आर्थिक शक्ति और पाकिस्तानी सैन्य विशेषज्ञता के बीच किसी एक को नहीं चुन सकते। अमेरिका-ईरान संघर्ष के बाद से उनकी ज़रूरतें काफ़ी बदल गई हैं और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में मौजूदा व्यवधानों ने दिखा दिया है कि व्यापक अमेरिकी सुरक्षा साझेदारियाँ भी खाड़ी के अरब देशों की भेद्यता से उनकी रक्षा नहीं कर सकतीं। उन्हें निवेश और प्रतिरोधक क्षमता, तकनीक और सैन्य क्षमता, बाज़ार और समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा साझेदारियाँ और खाद्य सुरक्षा—सब चाहिए। यह संघर्ष दिखाता है कि कोई एक बाहरी साझेदार उनकी सभी ज़रूरतें पूरी नहीं कर सकता और न ही उनकी गारंटी दे सकता है।

इसलिए वे चीन, भारत, पाकिस्तान, तुर्की, यूरोप और अन्य शक्तियों के साथ बहु-संरेखण (मल्टी-अलाइनमेंट) की राह पर हैं। यह रणनीति ज़रूरी नहीं कि अमेरिका-विरोधी हो, बल्कि यह कथित अनिश्चितता और अमेरिकी साझेदारी के मुक़ाबले अपनी भेद्यता के प्रति प्रतिक्रिया है। खाड़ी के अरब देश अब किसी एक पक्ष के साथ विशिष्ट गठजोड़ के बजाय खास क्षमताओं पर आधारित रिश्ते तलाश रहे हैं। वे ज़रूरी नहीं कि अमेरिका के ख़िलाफ़ संतुलन साध रहे हों, बल्कि अमेरिकी वायु और मिसाइल रक्षा, भारतीय तकनीक, पाकिस्तानी सैन्य विशेषज्ञता, चीनी व्यापार और बुनियादी ढाँचे और तुर्की के रक्षा सहयोग के बीच हेजिंग कर रहे हैं, साथ ही ईरान के साथ अपने कूटनीतिक रास्ते भी खुले रखने की कोशिश कर रहे हैं।

इसे समझना अमेरिकी रणनीतिक हितों के लिए केंद्रीय है। क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका अमेरिका की अपनी हिंद-प्रशांत रणनीति से टकराती भी है और उसे पूरक भी बनती है। पाकिस्तान के लिए अलग गणित चाहिए, क्योंकि पाकिस्तान सऊदी अरब और तुर्की के साथ अपनी प्रतिबद्धताओं को भारत, ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के प्रति अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं के साथ संतुलित करता है। तुर्की इस गठजोड़ में एक बड़ा रक्षा-औद्योगिक और तकनीकी आयाम भी जोड़ देता है। बहु-संरेखण से परस्पर अतिव्यापी सुरक्षा प्रतिबद्धताएँ, अलग-अलग तकनीकी मानक, अंतर-संचालनीयता की दिक़्क़तें और प्रतिस्पर्धी बाहरी दायित्व भी पैदा हो सकते हैं, जिससे सामूहिक कार्रवाई असंभव हो जाए। भारत और पाकिस्तान की ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्विता संभवतः इस क्षेत्र तक फैल सकती है और खाड़ी के अरब देशों के भीतर विखंडन की एक और परत पैदा कर सकती है, ख़ासकर यह देखते हुए कि वहाँ बड़ी संख्या में भारतीय और पाकिस्तानी प्रवासी रहते हैं।

खाड़ी के अरब देशों के सामने रणनीतिक दुविधा अब यह नहीं है कि कौन-सी बाहरी शक्ति क्षेत्र को सुरक्षित कर सकती है, बल्कि यह है कि वे किसी एक पर निर्भर हुए बिना कई साझेदारियों के बीच हेजिंग कैसे करें। इसलिए खाड़ी के अरब देश केवल अपने आपूर्तिकर्ताओं में विविधता नहीं ला रहे, बल्कि अस्थिर भौगोलिक माहौल में टिके रहने के लिए अपने रणनीतिक रिश्तों में विविधता ला रहे हैं। खाड़ी के अरब देश मुद्दा-दर-मुद्दा आधार पर पाकिस्तान और भारत के बीच अपने दाँव बाँट सकते हैं, लेकिन वे किसी एक के साथ पूरी तरह और विशेष रूप से प्रतिबद्ध होने को तैयार नहीं हैं।

मूल अंग्रेज़ी लेख पढ़ें: Are the Gulf Arab States Hedging Their Bets Between India and Pakistan?

मिडिल ईस्ट फ़ोरम के विश्लेषण ईमेल पर पाएँ: न्यूज़लेटर की सदस्यता लें (अंग्रेज़ी में)