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ड्राइविंग से आगे, क्या सऊदी महिलाओं का बदलाव पर्याप्त है

क़ानूनी सुधार लागू हो चुके हैं, लेकिन संस्थागत सुधार, प्रशासनिक प्रक्रियाएँ और अमल के तंत्र अभी विकसित होने बाक़ी हैं।

राधिका लक्ष्मीनारायणन शोधकर्ता और इतिहासकार हैं, जिन्होंने 3 दशकों से अधिक समय तक कुवैत और भारत की अग्रणी संस्थाओं के साथ काम किया है। वे Small States Security Dilemma—Kuwait after 1991 की लेखिका हैं।

A woman checks her smartphone while walking in Riyadh, Saudi Arabia, in March 2026.
मार्च 2026 में सऊदी अरब के रियाद में चलते हुए अपना स्मार्टफ़ोन देखती एक महिला। · Shutterstock

क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के सुधार एजेंडे से शुरू हुए बदलावों के नतीजे में पिछले एक दशक में सऊदी अरब में महिलाओं का जीवन बदल गया है। इन सुधारों ने उन धारणाओं को चुनौती दी है जिन्हें सऊदी नागरिक कभी अपरिवर्तनीय मानते थे। इन्होंने उस आर्थिक हक़ीक़त को भी स्वीकार किया कि तेल से आगे विविधता तलाशती अर्थव्यवस्था अपनी आधी आबादी को सार्वजनिक जीवन के हाशिये पर छोड़ने का जोखिम नहीं उठा सकती।

इसीलिए Saudi Vision 2030 ने महिलाओं की भागीदारी को सिर्फ़ सामाजिक लक्ष्य नहीं, बल्कि आर्थिक अनिवार्यता भी बना दिया। आवाजाही, रोज़गार और सार्वजनिक भागीदारी पर लगी पाबंदियाँ हटने से जो बदलाव आया है, उसे राज्य-प्रेरित होने के बावजूद महज़ दिखावा कहकर ख़ारिज करना मुश्किल है। सऊदी महिलाएँ विश्वविद्यालयों, कार्यस्थलों, कारोबार और तकनीकी पेशों में दाख़िल हुई हैं और सार्वजनिक जीवन में लगातार अधिक दिखने वाले पदों पर पहुँच रही हैं।

क़ानूनी तौर पर सऊदी महिलाओं को 2018 में गाड़ी चलाने का अधिकार मिला और 2019 में सऊदी क़ानून ने पुरुष संरक्षकता से जुड़ी पाबंदियाँ ढीली कीं, जिससे महिलाओं को आवाजाही और यात्रा के अधिकार मिले। रोज़गार तक पहुँच और बढ़ी, कार्यस्थल पर सुरक्षा उपाय बेहतर हुए और वुसूल (Wusool) तथा क़ुर्रह (Qurrah) जैसे कार्यक्रमों ने परिवहन और देखभाल से जुड़ी बाधाओं को संबोधित किया। सऊदीकरण की नीतियों ने भी निजी क्षेत्र के नियोक्ताओं के लिए सऊदी नागरिकों, जिनमें महिलाएँ भी शामिल हैं, की भर्ती के लिए मज़बूत प्रोत्साहन पैदा किए। इन नीतियों ने महिलाओं के काम करने के क़ानूनी अधिकार को पूरक बनाया और उन अधिकारों का इस्तेमाल करने के लिए उन्हें उपयुक्त कौशल, बुनियादी ढाँचा और संस्थागत समर्थन दिया। महिला श्रमबल भागीदारी नाटकीय रूप से बढ़ी, 2016 में 22.8 प्रतिशत से 2025 में 33.6 प्रतिशत, जो Saudi Vision 2030 के 30 प्रतिशत लक्ष्य से अधिक है। यह दिखाता है कि सऊदी अरब में राजनीतिक सत्ता, आर्थिक ज़रूरत और संस्थागत नीति के मेल ने सामाजिक-आर्थिक बदलाव को तेज़ किया है।

फिर भी, सऊदी अरब में महिलाओं की भागीदारी प्रतीकात्मक समावेशन से आगे बढ़ चुकी है, लेकिन सशक्तीकरण तक का रास्ता अब भी लंबा है। सुधार के पहले चरण ने महिलाओं को पहुँच दी है, लेकिन अगला चरण कर्तृत्व, आर्थिक शक्ति, नेतृत्व और निर्णय लेने से जुड़ा होना चाहिए। ऐसा इसलिए कि एक महिला श्रम बाज़ार में दाख़िल होकर भी आर्थिक रूप से निर्भर रह सकती है, उसे पदोन्नति से वंचित किया जा सकता है, या वह अपनी संपत्ति पर नियंत्रण रखने की क्षमता तक से वंचित रह सकती है। अपनी शिक्षा और कौशल के बावजूद संभव है कि वह कभी उस बोर्डरूम तक न पहुँचे जहाँ वह रणनीतिक फ़ैसले ले सके। सशक्तीकरण का असली पैमाना सिर्फ़ इस पर आधारित नहीं हो सकता कि कितनी महिलाएँ काम करती हैं; इसमें यह भी शामिल होना चाहिए कि वे किन क्षेत्रों में काम करती हैं, कितना कमाती हैं, उनके पास क्या स्वामित्व है, वे कितना ऊपर उठती हैं और कितनी शक्ति का इस्तेमाल करती हैं।

विश्व बैंक के Women, Business and the Law 2026 ढाँचे में सऊदी अरब को क़ानूनी ढाँचों पर 56.2/100, सहायक ढाँचों पर 72.0 और अमल संबंधी धारणाओं पर 50.7 अंक मिले हैं। समान वेतन के साथ-साथ अभिभावकत्व, काम और शिशु देखभाल पर अंक ऊँचे हैं। फिर भी विवाह और संपत्ति कमज़ोर क्षेत्र बने हुए हैं, जहाँ दोनों को 25-25 अंक मिले हैं, जबकि आवाजाही पर 38 और उद्यमिता पर 50 अंक हैं। इससे संकेत मिलता है कि आर्थिक शक्ति का वितरण अब भी असमान है।

क़ानूनी सुधार लागू हो चुके हैं, लेकिन वास्तविक असर पैदा करने के लिए संस्थागत सुधार, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और अमल के तंत्रों का विकसित होना ज़रूरी है। इनके साथ सुलभ शिकायत तंत्र, पारदर्शी प्रशासनिक प्रक्रियाएँ, प्रभावी उपचार और अनुपालन सुनिश्चित करने में सक्षम संस्थाएँ भी होनी चाहिए। जब तक क़ानूनी और वास्तविक अधिकारों के बीच की खाई नहीं पाटी जाती, महिलाएँ सशक्तीकरण की दिशा में वास्तविक प्रगति से वंचित रहेंगी।

सऊदी अरब का उभरता हुआ महिला उद्यमी पारिस्थितिकी तंत्र एक आशावादी तस्वीर पेश करता है। काफ़ी हद तक राज्य समर्थित वित्तपोषण, प्रशिक्षण और उद्यमिता कार्यक्रमों के चलते महिलाएँ ई-कॉमर्स, पर्यटन, तकनीक, परामर्श, खाद्य और आतिथ्य क्षेत्रों में बढ़-चढ़कर दिख रही हैं। लेकिन अगली नीतिगत चुनौती महिला उद्यमियों को छोटे और सूक्ष्म उद्यमों से निकालकर पूँजी-गहन, प्रौद्योगिकी-आधारित और विस्तार योग्य कारोबार तक ले जाने की है। इसके लिए ऋण और वेंचर कैपिटल तक आसान पहुँच, कारोबार और संपत्ति अधिकारों की मज़बूत सुरक्षा, ख़रीद के अवसर, मार्गदर्शन नेटवर्क, बाज़ार तक पहुँच और ऐसे तंत्र चाहिए होंगे जो महिला स्वामित्व वाली कंपनियों को विस्तार देने में सक्षम बनाएं। ऐसे कॉर्पोरेट माहौल में, जो ढाँचे और सोच दोनों में अब भी काफ़ी हद तक पितृसत्तात्मक है, महिलाएँ ख़ुद को वरिष्ठ स्तर के फ़ैसलों से अलग-थलग पाती हैं।

इसके अलावा, राष्ट्रीयकरण की नीतियों ने महिलाओं सहित सऊदी नागरिकों पर सकारात्मक असर डाला है, फिर भी देश का श्रम बाज़ार विभाजित बना हुआ है। इसलिए राष्ट्रीय श्रम बाज़ार के पक्ष में जाने वाले लाभ अपने आप प्रवासी महिलाओं तक नहीं पहुँचते, जो बड़े पैमाने पर कम वेतन वाले सेवा क्षेत्रों, घरेलू काम, स्वास्थ्य और शिशु देखभाल से जुड़े पेशों में केंद्रित हैं। कोई भी परिवर्तनकारी श्रम-बाज़ार नीति नागरिक/ग़ैर-नागरिक के विभाजन पर रुक नहीं सकती; उसे उन परिस्थितियों को भी संबोधित करना होगा जिनमें व्यापक महिला श्रमबल काम करता है, जिनमें वेतन, कार्यस्थल सुरक्षा, आवाजाही और क़ानूनी उपचार तक पहुँच शामिल हैं।

शिक्षा एक और विरोधाभास पेश करती है। सऊदी महिलाएँ शिक्षित हैं, उच्च शिक्षा में उनकी मज़बूत मौजूदगी है और विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, चिकित्सा, व्यवसाय और क़ानून में उनकी पर्याप्त भागीदारी है। फिर भी शैक्षिक उपलब्धि अपने आप रोज़गार और अधिक कमाई में नहीं बदलती, न ही कॉर्पोरेट शीर्ष पर नेतृत्व तक पहुँच सुनिश्चित करती है। इसलिए शीशे की छत तोड़ने के लिए सऊदी अरब में सुधारों के अगले चरण को तरक़्क़ी के ढाँचों को बदलना होगा।

गाड़ी चलाने का अधिकार सऊदी महिलाओं के लिए व्यापक बदलाव का सबसे शक्तिशाली प्रतीक बन गया, क्योंकि आवाजाही स्वायत्तता, रोज़गार तक पहुँच और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी का प्रतिनिधित्व करती है। लेकिन वह दहलीज़ कब की पार हो चुकी है। विश्वविद्यालयों, कार्यस्थलों और कारोबार में आज मौजूद युवा सऊदी महिलाओं की अपेक्षाएँ अपनी माँओं और दादियों से अलग हैं। वे डिजिटल रूप से जुड़ी हुई हैं, पेशेवर रूप से महत्वाकांक्षी हैं और वैश्विक शैक्षिक तथा कार्यस्थल मानदंडों से परिचित हैं। उनके लिए पहुँच मंज़िल नहीं है; यह महज़ शुरुआत है।

सऊदी अरब के निजी क्षेत्र को इस रफ़्तार से क़दम मिलाने की ज़रूरत है। महिलाएँ सरकार-संचालित समावेशन कार्यक्रम की लाभार्थी बनकर नहीं रह सकतीं। उन्हें ऐसे अनिवार्य किरदारों के रूप में पहचाना जाना चाहिए जिनकी मानव पूँजी सऊदी अरब की तेल-उपरांत अर्थव्यवस्था के लिए अपरिहार्य है। उनकी सफलता का असली पैमाना अंततः यह होगा कि क्या सऊदी महिलाएँ गाड़ी चलाने, काम करने और भागीदारी से आगे कुछ कर सकती हैं। क्या वे स्वामित्व रख सकती हैं? क्या वे नेतृत्व कर सकती हैं? क्या वे पूँजी पर नियंत्रण रख सकती हैं? क्या वे कॉर्पोरेट रणनीति और सार्वजनिक नीति को आकार दे सकती हैं? और क्या वे सिर्फ़ उनके लिए बनाए गए पदों पर बैठने के बजाय शक्ति का इस्तेमाल कर सकती हैं?

मूल अंग्रेज़ी लेख पढ़ें: Beyond Driving, Has Saudi Women’s Transformation Gone Far Enough?

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