मध्य पूर्व में चीन का दीर्घकालिक दांव
बीजिंग अकसर कूटनीति की भाषा बोलता है, लेकिन साथ ही वह ऐसा बुनियादी ढांचा खड़ा कर रहा है जो उसे इस क्षेत्र में दबाव बनाने की ताक़त देता है।
इमरान ख़ुर्शीद, पीएचडी, भारत के नई दिल्ली स्थित इंटरनेशनल सेंटर फ़ॉर पीस स्टडीज़ (International Centre for Peace Studies) में एसोसिएट रिसर्च फ़ेलो हैं।

चीन भले ही मध्य पूर्व के युद्ध में सीधा पक्षकार न हो, लेकिन वह एक अप्रत्यक्ष शक्ति है, जो उस रणनीतिक माहौल को आकार दे रही है जिसमें यह संघर्ष आगे बढ़ रहा है। बीजिंग की ख़ुफ़िया क्षमताएँ, ईरान को सैन्य समर्थन, रणनीतिक साझेदारियाँ और क्षेत्र में बढ़ती मौजूदगी—ये सब उसे युद्धभूमि में सीधे उतरे बिना इस संघर्ष को प्रभावित करने के कई रास्ते देती हैं।
बीजिंग ने यह दिखाया है कि वह सीधे सैन्य टकराव से जुड़ी लागत और जोखिम उठाए बिना रणनीतिक बढ़त बनाना पसंद करता है। एक उभरती वैश्विक शक्ति के तौर पर, जो अपने रणनीतिक नज़रिए को साम्राज्य और शोषित—दोनों रहे अपने अतीत से जोड़कर उचित ठहराता है, बीजिंग अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि को गंभीरता से लेता है और अपने रणनीतिक हितों को साधते हुए साख पर पड़ने वाले असर को सीमित रखता है।
बीजिंग ने ईरान को आर्थिक, तकनीकी और दोहरे इस्तेमाल वाला समर्थन दिया है, जिससे तेहरान को प्रतिबंधों का असर कम करने और अपनी सैन्य-औद्योगिक क्षमता बनाए रखने में मदद मिली है। चीनी निजी कंपनियों ने उपग्रह चित्रण, निगरानी, नौवहन और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध से जुड़ी तकनीक मुहैया कराई है। फ़ॉरेंसिक विश्लेषण से पता चलता है कि ईरान अपने ड्रोन में सेंसर, सेमीकंडक्टर, वोल्टेज कन्वर्टर और इंजन समेत चीनी पुर्ज़ों का इस्तेमाल करता है, और बीजिंग ने ईरान को अपनी बेईदोउ (BeiDou) उपग्रह-नौवहन प्रणाली तक पहुँच दी है। चीन से जुड़ी आपूर्तियों में मिसाइल उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली सामग्री भी शामिल रही है, जबकि ख़बरों के मुताबिक़ ईरान ने चीन में बने MANPADS—जिनमें QW-12 और FN-16 प्रणालियाँ शामिल हैं—हासिल करने की कोशिश की है।
इसका ताज़ा सबूत जिबूती से आता है। चीन ने जिबूती में स्थित अपने एकमात्र स्वीकृत विदेशी सैन्य अड्डे को काफ़ी उन्नत किया है। उपग्रह चित्रों से पता चलता है कि 2024 के बाद से वहाँ नए एंटेना, उपग्रह संचार उपकरण और दो नए संचार परिसर लगाए गए हैं। ये उन्नयन बीजिंग को इस क्षेत्र में और ज़्यादा नज़रें देते हैं और उसकी ख़ुफ़िया, निगरानी और टोही क्षमताओं को मज़बूत करते हैं।
अहम यह भी है कि यह ठिकाना लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ने वाले रणनीतिक अवरोध-बिंदु बाब अल-मंदब के क़रीब है। अमेरिकी, फ़्रांसीसी, इतालवी और जापानी सैन्य अड्डों से इसकी नज़दीकी बीजिंग को ऐसी स्थिति देती है, जहाँ से वह क्षेत्र की गतिविधियों पर नज़र रख सकता है।
यह अहमियत और बढ़ जाती है, क्योंकि हूतियों ने इस क्षेत्र में अपने हमले और समुद्री आवाजाही में व्यवधान तेज़ कर दिए हैं, ख़ासकर मोखा और पेरिम द्वीप पर क़ब्ज़े के बाद। सऊदी अरब को हूतियों के और बड़े हमलों का सामना करना पड़ रहा है। लाल सागर के आसपास सुरक्षा हालात बिगड़ने और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में भी अस्थिरता रहने के चलते व्यापक समुद्री गलियारे का महत्व बढ़ गया है।
मिस्र के साथ चीन की बढ़ती भागीदारी इसी व्यापक तस्वीर का एक और हिस्सा है। 1–2 सितंबर 2026 को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक दशक में पहली बार मिस्र गए। इस दौरे में बीजिंग और काहिरा ने अपनी रणनीतिक साझेदारी को गहरा करने पर सहमति जताई, और चीन ने स्वेज़ नहर आर्थिक क्षेत्र के इर्द-गिर्द अपनी आर्थिक भागीदारी भी बढ़ाई। चीनी निवेश पहले से ही नहर क्षेत्र से जुड़ा हुआ है, जहाँ सैकड़ों चीनी कंपनियाँ काम कर रही हैं।
मिस्र की भौगोलिक स्थिति बेहद अहम है। स्वेज़ नहर लाल सागर को भूमध्य सागर से जोड़ती है और दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापार मार्गों में से एक बनी हुई है। नहर के आसपास चीन की बढ़ती आर्थिक मौजूदगी, जिबूती में उसके सैन्य और ख़ुफ़िया बुनियादी ढांचे के साथ मिलकर, बीजिंग को अदन की खाड़ी और लाल सागर से लेकर स्वेज़ नहर और भूमध्य सागर तक फैली रणनीतिक पैठ देती है।
पाकिस्तान भी इस ढांचे में उपयोगी बन गया है। वह चीन को मध्य पूर्व तक पहुँचने का स्थल मार्ग देता है, और बीजिंग के साथ उसका सैन्य संबंध चीन को एक स्थापित रक्षा-औद्योगिक और साजो-सामान संबंधी साझेदार मुहैया कराता है।
रूस भी इसी व्यापक तस्वीर में फिट बैठता है। यूक्रेन युद्ध के दौरान मॉस्को आर्थिक और तकनीकी रूप से बीजिंग पर लगातार अधिक निर्भर होता गया है। रूस के साथ चीन का रिश्ता बीजिंग को एक और अप्रत्यक्ष रास्ता देता है, जिसके ज़रिए वह इस संघर्ष को प्रभावित कर सकता है।
नतीजा एक व्यापक तंत्र के रूप में सामने आता है, जिसमें चीन को हर लड़ाई ख़ुद नहीं लड़नी पड़ती। इससे चीन अपने आप को उतने जोखिम में डाले बिना अपना प्रभाव बढ़ा पाता है।
बीजिंग भले ही अकसर संवाद, कूटनीति, संप्रभुता और शांतिपूर्ण समाधान की भाषा बोलता हो, लेकिन वह ऐसा बुनियादी ढांचा फैला रहा है, जो उसे ज़मीनी घटनाक्रम पर दबाव बनाने की ताक़त देता है।
चीन का मक़सद ईरान का समर्थन करने से कहीं बड़ा है। बीजिंग शक्ति संतुलन को नए सिरे से गढ़ना और मध्य पूर्व में अमेरिका की लंबे समय से चली आ रही मौजूदगी को घटाना चाहता है। जहाँ अमेरिका ने इस संघर्ष पर भारी सैन्य और कूटनीतिक संसाधन ख़र्च किए हैं, वहीं चीन एक लंबा खेल खेल रहा है—मौजूदा अस्थिरता का इस्तेमाल कर अपने विकल्प बढ़ाते हुए क्षेत्रीय संतुलन के बदलने का इंतज़ार कर रहा है।
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