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लाल सागर पर इरिट्रिया का पुराना आख्यान, बदलता मध्य पूर्व

खाड़ी के अरब देश इसराइल से रिश्ते क़ायम रखते हुए भी इथियोपिया, इरिट्रिया और हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका के अन्य देशों से जुड़ाव बनाए रख सकते हैं।

ब्लेन मामो दिरिबा इथियोपिया की क़ानूनी और नीति विश्लेषक हैं और Horn Review की कार्यकारी निदेशक हैं। Horn Review एक स्वतंत्र अनुसंधान और प्रकाशन मंच है, जो हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका, लाल सागर और अदन की खाड़ी क्षेत्र में राजनीति, कूटनीति और सुरक्षा पर केंद्रित है। वे इथियोपिया के विदेश मामलों के संस्थान (Institute of Foreign Affairs) में सहयोगी शोधकर्ता भी हैं।

Eritrea's Foreign Affairs Minister Osman Mohammed Saleh.
इरिट्रिया के विदेश मंत्री ओसमान मोहम्मद सालेह। · Shutterstock

क़तर समर्थित समाचार संस्थान Middle East Eye को 12 सितंबर 2026 को दिए एक इंटरव्यू में इरिट्रिया के विदेश मंत्री ओसमान सालेह ने हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका में संयुक्त अरब अमीरात, इसराइल और इथियोपिया के बीच उभरते मेल-जोल को लेकर चेतावनी दी। हालांकि इन देशों के आपसी रिश्ते, उनकी उत्पत्ति और प्रेरणाओं—दोनों लिहाज़ से—सालेह की पेशकश के मुकाबले कहीं ज़्यादा अलग-अलग और परतदार हैं।

सालेह की यह दलील तीन दशक पहले इरिट्रिया के अलगाव संघर्ष के दौरान गढ़े गए एक तर्क की याद दिलाती है: इथियोपिया का इसराइल से रिश्ता लाल सागर पर चल रही व्यापक अरब-इसराइली होड़ का हिस्सा था। इसी ढांचे में इरिट्रियाई राष्ट्रवादियों ने अरब सरकारों के सामने इरिट्रिया को महज़ इथियोपियाई शासन के ख़िलाफ़ अलगाववादी संघर्ष के तौर पर नहीं, बल्कि एक ऐसे मक़सद के तौर पर पेश किया जिसकी कामयाबी व्यापक क्षेत्रीय हितों को भी साध सकती थी। इसका राजनीतिक तर्क स्पष्ट था: इथियोपिया लाल सागर में इसराइली और पश्चिमी रणनीतिक मौजूदगी के बड़े फ्रेम में स्थित है, जबकि इरिट्रियाई स्वतंत्रता उस मौजूदगी के ख़िलाफ़ एक क्षेत्रीय संघर्ष का हिस्सा होगी।

1960 और 1970 के दशक में इस ढांचे को काफ़ी समर्थन मिला। इसराइल ने इथियोपिया में पहले साम्राज्यवादी शासन और फिर कुछ वर्षों तक मार्क्सवादी-लेनिनवादी सैन्य शासन—दोनों—के साथ सुरक्षा संबंध बनाए रखे और ओगादेन तथा इरिट्रिया में विद्रोहों से लड़ने में इथियोपिया की मदद के लिए सैन्य प्रशिक्षण के साथ-साथ विद्रोह-रोधी सहायता भी मुहैया कराई। दूसरी ओर, अरब देशों और संगठनों ने इरिट्रियाई विद्रोहियों को राजनीतिक, वित्तीय और सैन्य समर्थन दिया।

इथियोपिया, इसराइल और व्यापक अरब-इसराइली संघर्ष के बीच संबंध की झलक इरिट्रियाई विद्रोह पर उस दौर के आकलनों में पहले ही दिखती है। मसलन, मई 1970 के एक अमेरिकी राष्ट्रीय ख़ुफ़िया आकलन, The Situation in Eritrea, में बताया गया कि दमिश्क से होने वाले इरिट्रियन लिबरेशन फ़्रंट (Eritrean Liberation Front) के प्रसारण इस संघर्ष को लगातार ज़्यादा साफ़ तौर पर साम्राज्यवाद-विरोधी और ज़ायनवाद-विरोधी नज़रिये से पेश कर रहे थे और अमेरिका को “Zionist Israel and feudal Ethiopia” से जोड़ रहे थे। आकलन में आगे यह भी कहा गया कि क्षेत्र के मुस्लिम देशों के साथ इथियोपिया के बिगड़ते रिश्ते अरब-इसराइली संघर्ष से पैदा हुए व्यापक तनावों को दर्शाते हैं।

इस दस्तावेज़ का महत्व सिर्फ़ इरिट्रियन लिबरेशन फ़्रंट/इरिट्रियन पीपुल्स लिबरेशन फ़्रंट (Eritrean People’s Liberation Front) के प्रचार के वर्णन में नहीं, बल्कि इस बात की पहचान में है कि इरिट्रियाई विद्रोह को इथियोपिया, इसराइल, अरब देशों और लाल सागर को समेटती एक व्यापक भू-राजनीतिक होड़ के भीतर रखकर देखा जा रहा था। सालेह की मौजूदा दलील इरिट्रियाई मक़सद के अंतरराष्ट्रीयकरण के इसी पुराने तरीक़े से काफ़ी मिलती-जुलती है।

हालांकि, आज का मध्य पूर्व उस मध्य पूर्व से अलग है जिसका हवाला इरिट्रियाई शासन देता है। संयुक्त अरब अमीरात के, कई अन्य अरब देशों की तरह, इसराइल के साथ राजनयिक संबंध हैं और उसके बाद उसने इसराइल के साथ व्यापक द्विपक्षीय सहयोग विकसित किया है।

इथियोपिया, अपने हिस्से में, रणनीतिक गणनाएँ ख़ुद करता है और इसराइल के साथ उसका रिश्ता कहीं लंबा-चौड़ा और पुराना है। वास्तव में, इसराइल के साथ इथियोपिया का रिश्ता मौजूदा क्षेत्रीय व्यवस्था से भी पहले का है और इथियोपिया की राजनीतिक व्यवस्था तथा विदेश-नीति के रुख़ में आए बदलावों के बावजूद टिके रहने में कामयाब रहा है। यह ऐतिहासिक निरंतरता मौजूदा रिश्तों की उस व्याख्या को जटिल बना देती है जो इन्हें किसी भी देश के ख़िलाफ़—चाहे वह हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका में हो या मध्य पूर्व और उत्तरी अफ़्रीका में—नए सिरे से गठित किसी इसराइली-इथियोपियाई परियोजना का सबूत बताती है।

सालेह की यह रूपरेखा ख़ुद इथियोपिया में आए परिवर्तन के साथ भी सहज नहीं बैठती। इथियोपिया अब न तो वह ईसाई साम्राज्यवादी राजतंत्र है जिसने 1960 के दशक में इरिट्रियाई अलगाववाद का सामना किया था, और न ही 1970 और 1980 के दशक का समाजवादी डेर्ग शासन—जिसका वैचारिक रुझान और इसराइल के साथ बदलता रिश्ता शीत युद्ध तथा अरब-इसराइली संघर्ष की भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विताओं के हिसाब से ढलता रहा। आज का इथियोपिया एक गणराज्य है, जो अधिक व्यावहारिक, लेन-देन पर आधारित और बहु-दिशात्मक विदेश नीति अपना रहा है; इसमें मध्य पूर्व और खाड़ी के अरब देशों के साथ रिश्ते व्यापार, निवेश, बुनियादी ढांचे, खाद्य सुरक्षा और सुरक्षा से जुड़े बढ़ते साझा हितों पर टिक रहे हैं। खाड़ी के अरब देशों के लिए इथियोपिया अब लाल सागर के पश्चिमी हिस्से पर महज़ एक रणनीतिक ठिकाना भर नहीं है। उसकी बड़ी आबादी और उपभोक्ता बाज़ार, कृषि संभावनाएँ, बुनियादी ढांचे की ज़रूरतें और बढ़ता आर्थिक महत्व उसे अपने आप में एक ठोस साझेदार बनाते हैं।

इस विविधीकरण ने एक ऐसी क्षेत्रीय व्यवस्था बनाई है जिसमें खाड़ी के अरब देश इसराइल से रिश्ते बनाए रखते हुए साथ-साथ इथियोपिया में निवेश कर सकते हैं, इरिट्रिया से जुड़ाव रख सकते हैं, मिस्र के साथ सहयोग कर सकते हैं और हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका के अन्य रिश्ते भी विकसित कर सकते हैं। ऐसी कूटनीति को शीत युद्ध के अपेक्षाकृत द्विध्रुवीय भू-राजनीतिक ढांचों की पुनरावृत्ति के बजाय बहु-दिशात्मक के रूप में समझना ज़्यादा उपयुक्त होगा। यही सालेह की दलील की केंद्रीय सीमा है। वह रिश्तों के एक वास्तविक जाल की पहचान तो करते हैं, लेकिन उसकी व्याख्या एक पुराने पड़ चुके खांचे के ज़रिये करते हैं। उनकी ऐतिहासिक उपमा में कुछ प्रासंगिकता हो सकती है, लेकिन इरिट्रिया के दशकों लंबे ठहराव से परे बीते दशकों में हुए विकास के प्रति उनका अंधापन यह सुनिश्चित करता है कि उनका रणनीतिक निष्कर्ष प्रासंगिक नहीं है।

मूल अंग्रेज़ी लेख पढ़ें: Eritrea’s Old Red Sea Narrative Meets a New Middle East

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