कुवैत की ओर भारत की पहल शुरू होते ही विफल
भारत के विरोधियों के साथ कुवैत के रक्षा संबंध दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी को कठिन बनाते हैं।
अभिनव पांड्या उसानास फ़ाउंडेशन (Usanas Foundation) के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं, जो भारत की विदेश नीति और सुरक्षा पर काम करने वाली संस्था है।

28 अगस्त, 2026 को भारत की संयुक्त रक्षा समिति ने द्विपक्षीय रक्षा संबंध मज़बूत करने के लिए भारत आए कुवैत के 5 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल से मुलाक़ात की। कई भारतीय टिप्पणीकारों ने कहा कि यह क़दम मक्का समझौते के मुकाबले संतुलन बनाने के भारत के व्यापक प्रयास की शुरुआत है। मक्का समझौता पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब की ओर से नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन जैसी सामूहिक रक्षा व्यवस्था बनाने की कोशिश है।
ऐसे दावे भारत की नीति के तर्क को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं। संयुक्त रक्षा समिति की पहली बैठक का मक़सद उस सहमति-पत्र (मेमोरेंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग) को लागू करना था, जिस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दिसंबर 2024 की कुवैत यात्रा के दौरान भारत और कुवैत ने हस्ताक्षर किए थे। मक्का समझौते ने भारत को कुवैत की ओर क़दम बढ़ाने पर मजबूर नहीं किया, क्योंकि यह पहल उससे पहले की है। फिर भी, भारत का सुरक्षा और विदेश नीति तंत्र उभरती सुन्नी धुरी को लेकर चिंतित है, क्योंकि इसके दक्षिण एशिया पर व्यापक असर हैं, और संभव है कि भारतीय नौकरशाहों ने कुवैत के साथ बैठकों को तेज़ कर दिया हो।
मक्का समझौते का दायरा कहीं अधिक व्यापक है और मध्य पूर्व की सुरक्षा संरचना को बदलने के अपने लक्ष्य में कहीं अधिक महत्वाकांक्षी है। इसके उलट, भारत-कुवैत रक्षा साझेदारी, भले ही वह सैन्य अभ्यास, प्रशिक्षण, चिकित्सा, रक्षा उद्योग साझेदारी और समुद्री सुरक्षा सहित व्यापक क्षेत्रों तक फैली हो, अपने वज़न और दिशा में सीमित है। भारत के कुवैत संबंधी क़दम में भविष्य में विस्तार के लिए कोई ठोस रोडमैप भी नहीं है। कुवैत ने रक्षा मंत्रालय में एक अधीनस्थ सचिव से मिलने के लिए केवल एक वन-स्टार जनरल भेजा। यह दोनों देशों के लिए इस समझौते की सीमित प्रकृति को दर्शाता है।
दरअसल, भारत के शत्रु तुर्की और पाकिस्तान के साथ कुवैत के रक्षा संबंध भारत के साथ दीर्घकालिक कुवैती रणनीतिक साझेदारी को कठिन बनाते हैं। अगस्त 2026 में कुवैत ने पाकिस्तान के साथ एक रक्षा प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए। इस्लामाबाद के साथ कुवैत का यह समझौता पाकिस्तान की ड्रोन तकनीक, सैन्य कर्मियों और वायु रक्षा प्रणालियों को कुवैती सीमाओं तक ले आएगा। इसके अलावा, 2020 में कुवैत ने तुर्की की रक्षा कंपनियों से दंगा नियंत्रण वाहन और लड़ाकू ड्रोन ख़रीदे थे।
फ़िलहाल, मक्का समझौते वाले देशों के साथ कुवैत के द्विपक्षीय रक्षा संबंधों में सामूहिक रक्षा की कोई शर्त नहीं है। हालांकि, उसकी सुरक्षा संबंधी कमज़ोरियाँ, भू-राजनीतिक संरेखण और सैन्य ख़रीदारी यह संकेत देती है कि वह निकट भविष्य में मक्का समझौते में शामिल हो जाएगा। इससे भारत के साथ उसके संभावित भावी संबंध सीमित हो जाएँगे, क्योंकि मक्का समझौते वाले देश भारत के प्रति उतने ही विरोधी हैं जितने इसराइल के प्रति।
कुवैत ऐतिहासिक रूप से क्षेत्रीय विवादों में तटस्थ रुख़ बनाए रखता आया है और साझा विरोधियों के साथ उसके सौहार्दपूर्ण संबंधों के कारण उसने मध्यस्थता भी की है। 2017 में उसने क़तर और अरब चौकड़ी के बीच संकट के दौरान मध्यस्थता की थी। दुनिया के 7 प्रतिशत तेल भंडार और मध्य पूर्व के सबसे बड़े संप्रभु संपत्ति कोषों में से एक के दम पर उसकी आर्थिक क्षमता उसे ताक़त देती है। हालांकि, ईरान से उसकी भौगोलिक निकटता ने उसे ईरानी हमलों के प्रति संवेदनशील बना दिया है। वह फ़ारस की खाड़ी के पार, ईरानी क्षेत्र से 90 मील से भी कम दूरी पर स्थित है। ईरानी बैलिस्टिक मिसाइल हमलों पर प्रतिक्रिया देने के लिए उसकी वायु रक्षा प्रणालियों के पास क़रीब 60 से 90 सेकंड होते हैं। हालाँकि कुवैत के पास टैंक, युद्धपोत और लड़ाकू विमान हैं, लेकिन 17,500 सैनिकों की उसकी स्थायी सेना ईरान की सशस्त्र सेनाओं का मुक़ाबला नहीं कर सकती, जिनकी संख्या 10 लाख से अधिक है। जुलाई 2026 तक कुवैत ईरान के 1,318 हमले झेल चुका था, जो इस क्षेत्र में सबसे अधिक है। ईरानी मिसाइलों और ड्रोनों ने हवाई अड्डों, जल-विलवणीकरण संयंत्रों और बिजली ग्रिड सहित नागरिक बुनियादी ढाँचे को निशाना बनाया। ऐसी भेद्यता कुवैत को मक्का समझौते वाले देशों की गोद में और गहराई तक धकेलती है।
अंततः, अब्राहम समझौतों पर कुवैत का रुख़ रियाद के साथ मेल खाता है। दोनों में से कोई भी इसराइल के साथ संबंध सामान्य करने का समर्थन नहीं करता। इसलिए, कुवैत संभवतः इसराइल के क़रीब रहने वाले भारत को पाकिस्तान और तुर्की के मुक़ाबले नहीं चुनेगा। दरअसल, अपने शत्रुओं के साथ कुवैत के निकट संबंधों को देखते हुए नई दिल्ली को सतर्क रहना होगा। यह सतर्कता और ज़्यादा ज़रूरी होगी, अगर कुवैत अंतिम-उपयोगकर्ता समझौतों का उल्लंघन करता है और महत्वपूर्ण रक्षा तकनीक भारत के विरोधियों तक पहुँचने देता है।
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