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खाड़ी देशों का श्रम सुधार कितना असली

काग़ज़ों पर औपचारिक अधिकार मिल जाने का यह मतलब नहीं कि प्रवासी मज़दूरों के जीवन में सार्थक बदलाव आया है।

राधिका लक्ष्मीनारायणन शोधकर्ता और इतिहासकार हैं, जिन्होंने 3 दशकों से अधिक समय तक कुवैत और भारत की अग्रणी संस्थाओं के साथ काम किया है। वे Small States Security Dilemma—Kuwait after 1991 की लेखिका हैं।

Migrant workers perform maintenance on an underground water drainage system in Al-Ahsa, Saudi Arabia.
सऊदी अरब के अल-अहसा में भूमिगत जल निकासी प्रणाली की मरम्मत करते प्रवासी मज़दूर। · Shutterstock

खाड़ी के अरब देश आर्थिक विविधीकरण, बुनियादी ढाँचे और वैश्विक निवेश में अरबों डॉलर लगा रहे हैं। फिर भी, इस बदलाव का बड़ा हिस्सा उन प्रवासी मज़दूरों पर निर्भर है, जो इसकी शारीरिक, वित्तीय और सामाजिक क़ीमत का असमान रूप से बड़ा बोझ उठाते हैं। खाड़ी सहयोग परिषद के हर देश ने कफ़ाला व्यवस्था में सुधार किए हैं, जो किसी विदेशी मज़दूर की क़ानूनी हैसियत को स्थानीय प्रायोजक से जोड़ देती है, लेकिन प्रवासियों के सामने मौजूद समस्याएँ इससे कहीं गहरी हैं। प्रवासी अर्थव्यवस्था अक्सर भर्ती का क़र्ज़, आवास की लागत और प्रशासनिक ख़र्च उन्हीं मज़दूरों पर डाल देती है, जो पहले से परिवार से अलगाव, स्वास्थ्य जोखिम और रोज़गार की अनिश्चितता झेल रहे होते हैं, जबकि विकास का लाभ संभ्रांत वर्ग तक पहुँचता है।

पिछले एक दशक में इन देशों ने श्रम सुधार लागू किए हैं, जिनमें वेतन-सुरक्षा व्यवस्थाएँ, काम के घंटों पर पाबंदियाँ, पेशागत सुरक्षा के प्रावधान, और नौकरी बदलने या देश छोड़ने के क़ानूनी तंत्र शामिल हैं। हालांकि, क़ानूनों का होना यह नहीं बताता कि वे हमेशा प्रभावी भी हों। सवाल ये हैं: जब कम वेतन पाने वाले प्रवासी मज़दूर अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं, तब क्या होता है? क्या वे बक़ाया वेतन जल्दी हासिल कर पाते हैं? क्या वे क़ानूनी हैसियत या आमदनी खोए बिना किसी शोषणकारी नियोक्ता को छोड़ सकते हैं? क्या वे नए प्रशासनिक ख़र्च उठाए बिना नौकरी बदल सकते हैं? अगर नियोक्ता की दी हुई रिहाइश छिन जाए, तो क्या वे वैकल्पिक आवास का ख़र्च उठा सकते हैं? और जब कोई मज़दूर वर्षों तक पेशागत जोखिम झेलने के बाद बीमार या विकलांग हो जाता है, तब क्या होता है—ख़ासकर तब, जब जटिलताएँ रोज़गार ख़त्म होने के बाद सामने आती हैं?

कई प्रवासी मज़दूरों को शुरुआत में ही ख़र्च उठाना पड़ता है। भर्ती एजेंट बड़ी रक़में वसूल सकते हैं, जिससे कुछ मज़दूर पहली तनख़्वाह मिलने से पहले ही क़र्ज़ में डूब जाते हैं। क़ानून भले मज़दूरों से भर्ती शुल्क लेने पर रोक लगाते हों, लेकिन मज़दूरों के पास ग़ैर-क़ानूनी वसूली को चुनौती देने लायक़ सौदेबाज़ी की ताक़त या जानकारी नहीं होती। गंतव्य देश पहुँचने पर वीज़ा, रिहाइश से जुड़े दस्तावेज़, चिकित्सा जाँच, परिवहन, आवास और दूसरी ज़रूरतें मज़दूरों के लिए ख़र्च पैदा कर सकती हैं, ख़ासकर तब जब नियोक्ता ऑनबोर्डिंग की लागत मज़दूर पर डाल देते हैं। हो सकता है कि किसी मज़दूर की तनख़्वाह काग़ज़ पर अच्छी दिखे, लेकिन प्रवास से जुड़ी लागत, क़र्ज़ की अदायगी, और घर भेजी जाने वाली रक़म के बाद उसके पास काफ़ी कम बचे।

आवास एक अनदेखा पहलू है। खाड़ी अरब देशों का विकास आलीशान टावरों और सुनियोजित शहरों में दिखता है, लेकिन मज़दूरों की रिहाइश भीड़भाड़ वाली, अस्वच्छ और दूर-दराज़ बनी रह सकती है। नियोक्ता की दी हुई रिहाइश निर्भरता पैदा करती है; नौकरी जाने का मतलब आमदनी और रहने की जगह, दोनों का चले जाना होगा।

एक और मुद्दा, जो औपचारिक क़ानूनी संरक्षण और व्यावहारिक स्वायत्तता के बीच का फ़र्क़ दिखाता है, वह है नियोक्ताओं द्वारा मज़दूरों के पासपोर्ट अपने पास रख लेना। खाड़ी सहयोग परिषद के सभी देशों में नियोक्ताओं द्वारा मज़दूरों के पासपोर्ट अपने पास रखने पर क़ानूनी पाबंदियाँ मौजूद हैं, हालांकि नियम और उनका अमल देश और मज़दूरों की श्रेणी के हिसाब से बहुत अलग-अलग हैं।

लाखों प्रवासी मज़दूर अपने परिवारों का भरण-पोषण करते हैं। कम वेतन पाने वाले मज़दूरों को लगभग हमेशा अपने परिवार पीछे छोड़कर आना पड़ता है। बच्चे माता-पिता से अलग बड़े होते हैं, और काम के हालात बिगड़ने पर भी पैसे भेजते रहने का दबाव तनाव बढ़ा देता है। अनैतिक बर्ताव करने वाले नियोक्ता को चुनौती देने का मतलब सिर्फ़ नौकरी गँवाना नहीं, बल्कि मज़दूर के परिवार के आर्थिक भविष्य को ख़तरे में डालना भी हो सकता है।

निर्माण और महापरियोजनाओं में ये जोखिम ख़ासतौर पर गंभीर हो जाते हैं। सरकारी वित्त वाली परियोजनाएँ ठेकेदारों और उप-ठेकेदारों की कई परतों से होकर गुज़रती हैं। जब ईरान युद्ध जैसी घटनाओं के चलते सरकारें परियोजनाएँ टाल देती हैं, उनका आकार घटा देती हैं या छोड़ देती हैं, तो आर्थिक नुक़सान रिसकर उन मज़दूरों तक पहुँचता है, जिनके पास वेतन न मिलने या रोज़गार और रिहाइश छिन जाने पर कोई सहारा नहीं होता।

बीमारी एक समस्या बनी हुई है। नियोक्ता गर्मियों में काम के घंटों पर लगी पाबंदियों का हमेशा पालन नहीं करते। जो मुआवज़ा कार्यस्थल पर हुई पहचानी जा सकने वाली दुर्घटनाओं के लिए बनाया गया है, वह उन संचयी बीमारियों या विकलांगताओं को नहीं पहचानता, जो रोज़गार ख़त्म होने के बाद सामने आती हैं।

सिर्फ़ काग़ज़ पर औपचारिक अधिकारों का होना इस बात की गारंटी नहीं कि वे सार्थक सुधार में बदल जाएँगे। 2025–26 में खाड़ी सहयोग परिषद के देशों में श्रम अधिकारों का उल्लंघन जारी रहा। सऊदी अरब में दम्माम की एक कंपनी ने 53 नेपाली मज़दूरों को बिना काम, बिना वेतन और बिना खाने के छोड़ दिया। एक और मामले में फ़िलिपीनी घरेलू महिला कामगारों को हद से ज़्यादा काम, शोषण और यौन दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा। कुवैत में कई घरेलू कामगारों को घर के भीतर क़ैद रखे जाने, वेतन भुगतान में देरी और दूसरे दुर्व्यवहारों का सामना करना पड़ता है।

जैसे-जैसे अमेरिकी वित्तीय संस्थान और निवेशक खाड़ी अरब पूँजी और सॉवरेन वेल्थ फ़ंड के साथ बढ़ते पैमाने पर जुड़ रहे हैं, संदिग्ध श्रम व्यवहार व्यावसायिक और साख से जुड़े जोखिम बढ़ाते हैं, और आपूर्ति शृंखला की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े करते हैं। अमेरिकी राजनयिकों को इस पर रिपोर्ट देने और नियामकों को यह सुनिश्चित करने के काम पर लगाना कि काग़ज़ी सुधार हक़ीक़त में बदलें, अल्पकाल में दख़लंदाज़ी या महँगा लग सकता है, लेकिन ऐसे नियमन की अनदेखी आगे चलकर कहीं बड़ी समस्याएँ पैदा कर सकती है—न सिर्फ़ प्रवासी मज़दूरों के लिए, बल्कि उन निवेशकों के लिए भी जो उनका श्रम चाहते हैं।

मूल अंग्रेज़ी लेख पढ़ें: Is Gulf Arab Labor Reform Real?

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