क्या सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का दौर ख़त्म
बिन सलमान ने रणनीतिक स्थिरता से ऊपर संयुक्त अरब अमीरात के साथ अपनी निजी प्रतिद्वंद्विता को तरजीह दी है।
माइकल रुबिन ईरान, तुर्की और हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका के विशेषज्ञ हैं। उनके करियर में पेंटागन में अधिकारी के तौर पर काम करने का अनुभव शामिल है। इसमें ईरान, यमन और इराक़ में ज़मीनी स्तर के अनुभव के साथ-साथ 9/11 से पहले तालिबान के साथ संपर्क भी रहा है। श्री रुबिन ने सैन्य शिक्षा में भी योगदान दिया है और अमेरिकी नौसेना तथा मरीन इकाइयों को क्षेत्रीय संघर्षों और आतंकवाद के बारे में पढ़ाया है। उनके विद्वतापूर्ण काम में कई अहम प्रकाशन शामिल हैं, जैसे “Dancing with the Devil” और “Eternal Iran।” रुबिन ने येल यूनिवर्सिटी से इतिहास में पीएच.डी. और एम.ए., तथा जीव विज्ञान में बी.एस. की डिग्री हासिल की।

यमन हमेशा से सऊदी महत्वाकांक्षाओं की क़ब्रगाह रहा है। सऊदी अरब के लिए प्रिंस ख़ालिद बिन सुल्तान ऑपरेशन डेज़र्ट स्टॉर्म के नायक थे। कुवैत की 100 घंटे में हुई आज़ादी के बाद सऊदी लोग दबी ज़ुबान में यह तक कहने लगे थे कि किंग अब्दुलअज़ीज़ के पोते ख़ालिद आगे चलकर रक्षा मंत्री, और शायद बादशाह भी बन सकते हैं। यह 2009 में बदल गया, जब ख़ालिद ने यमन में सऊदी हस्तक्षेप, ऑपरेशन स्कॉर्च्ड अर्थ का नेतृत्व किया। यह जल्द ही दलदल बन गया और इसका अंत अपमानजनक सऊदी वापसी के रूप में हुआ। सऊदी अरब ने कुछ सौ सैनिक गँवाए, जिनमें से कुछ कार्रवाई के दौरान लापता हो गए। सऊदी कभी ग़लतियाँ नहीं मानते, लेकिन ख़ालिद का गुमनामी में चले जाना बताता है कि किंग अब्दुल्लाह ने इसका दोष उन्हीं पर डाला था।
किंग सलमान ने 29 अप्रैल 2015 को मोहम्मद बिन नायेफ़ को क्राउन प्रिंस नियुक्त किया। बिन नायेफ़ गृह मंत्री थे और यमन में सऊदी हस्तक्षेप के पक्षधर थे। बिन नायेफ़ की तरक़्क़ी से उन्हें हूती-विरोधी अभियान का बेहतर समन्वय करने में मदद मिली। अमेरिकी ख़ुफ़िया सहयोग और हवा में ईंधन भरने की सुविधा के बावजूद सऊदी बमबारी एक आपदा साबित हुई और जहाँ अमीराती बलों ने दक्षिणी यमन पर अल-क़ायदा इन द अरेबियन पेनिनसुला के नियंत्रण को ख़त्म करने का अपना मिशन पूरा कर लिया, वहीं सऊदी सेनाएँ फँसकर रह गईं। रियाद ने कभी यह स्वीकार नहीं किया कि उसकी सशस्त्र सेनाएँ कितनी बदहाल हैं, लेकिन हाशिये पर डाला जाना बादशाह की सोच को दर्शाता है। 2017 में उन्होंने बिन नायेफ़ की जगह अपने बेटे मोहम्मद बिन सलमान को बिठा दिया। बिन सलमान तेज़ी से चर्चा में आए, उन्होंने अपने समकक्षों से दौलत छीनी और महत्वाकांक्षी सऊदी विज़न 2030 योजना शुरू की।
बिन सलमान ने हूतियों के साथ अलग राह अपनाई। वे इस नतीजे पर पहुँचे कि सऊदी अरब अमेरिका पर भरोसा नहीं कर सकता। सऊदी अरब के अहम नागरिक और सैन्य ढाँचों पर सैकड़ों हूती मिसाइल और ड्रोन हमलों के बाद बिन सलमान ने हूतियों के साथ चुपचाप समझौते की राह तलाश की। सऊदी अधिकारी यमन पर अपने हमले सीमित रखेंगे और बदले में हूती अपनी मार कहीं और मोड़ देंगे। रियाद ने 2018 के स्टॉकहोम समझौते का भी समर्थन किया, जो तनाव घटाने के नाम पर हूती हितों के आगे एक अंतरराष्ट्रीय आत्मसमर्पण था।
वैचारिक दुश्मनों को ख़ुश करने की नीति कभी काम नहीं करती। यह तब भी काम नहीं आई, जब सऊदी अधिकारियों ने अल-क़ायदा को ख़ुश किया और इस संगठन को निजी दानदाताओं से उदार मदद लेने दी, भले ही आधिकारिक समर्थन न रहा हो, बशर्ते वह सऊदी अरब के भीतर हमला न करे। हूतियों के साथ भी यह कारगर नहीं रही।
पिछले एक साल में बिन सलमान की यमन नीति ख़ास तौर पर विनाशकारी रही है। 30 दिसंबर 2025 तक दक्षिणी यमन काफ़ी हद तक स्थिर था। एदरूस ज़ुबैदी (Aidarous Zubaidi) की सदर्न ट्रांज़िशनल काउंसिल (Southern Transitional Council) व्यापक रूप से, भले ही सर्वमान्य न हो, लोकप्रिय थी। संसाधनों की कमी के बावजूद उसने प्रभावी शासन चलाया और उत्तरी व दक्षिणी यमन के बीच पुरानी सीमा के आर-पार बाब अल-मन्देब के तट पर मोख़ा में तारिक़ सालेह (Tareq Saleh) की नेशनल रेज़िस्टेंस जैसे गुटों के साथ सहयोग किया। हालाँकि सदर्न ट्रांज़िशनल काउंसिल को संयुक्त अरब अमीरात ने प्रशिक्षित किया था, लेकिन इस गुट की स्थिरता के चलते गिने-चुने अमीराती सलाहकारों को छोड़कर बाक़ी सब वापस लौट सके। धीरे-धीरे दक्षिणी बल नियंत्रण मज़बूत कर रहे थे और हदरमौत के रास्ते हूतियों तक ईरानी हथियारों की ओमान तथा यमनी मुस्लिम ब्रदरहुड की मुनाफ़ाख़ोर तस्करी रोक रहे थे।
बिन सलमान ने रणनीतिक स्थिरता से ऊपर संयुक्त अरब अमीरात के साथ अपनी निजी प्रतिद्वंद्विता को तरजीह दी और यमनी मुस्लिम ब्रदरहुड, इस्लाह में अपने सहयोगियों को आगे बढ़ाने की कोशिश की, भले ही इसका मतलब हूतियों को रोक सकने वाली इकलौती ताक़त के पाँव उखाड़ना हो। उन्होंने सऊदी जेट विमानों को सदर्न ट्रांज़िशनल काउंसिल पर बमबारी का आदेश दिया और फिर दक्षिणी नेताओं को हिरासत में लेने का हुक्म दिया। बिन सलमान के प्रतिनिधि गुट मुकल्ला और अदन में दाख़िल हो गए, लेकिन स्थानीय लोगों ने उन्हें वैध शासक के बजाय क़ाबिज़ ताक़त के रूप में देखा। किसी में भी शासन चलाने की क्षमता नहीं थी और दक्षिणी सुरक्षा ढह गई। इस बीच मोख़ा अलग-थलग पड़ता गया, क्योंकि सालेह अब अदन से समर्थन पर भरोसा नहीं कर सकते थे।
यही वजह है कि 10 सितंबर 2026 को, महज़ एक हफ़्ते से कुछ ज़्यादा समय में, हूती मोख़ा पर क़ब्ज़ा करने वाले थे। व्हाइट हाउस भले ही यमन को कमतर आँके और 9/11 के आतंकी हमलों की 25वीं बरसी इस ख़बर पर भारी पड़ जाए, लेकिन यह तथ्य छिपाया नहीं जा सकता: मोख़ा का हाथ से निकलना वर्षों में हूतियों की सबसे बड़ी जीत है।
इसकी क़ीमत अंतरराष्ट्रीय समुदाय चुकाएगा। जहाँ पहले हूती तिहामा तट से भीतर की ओर पहाड़ों से बाब अल-मन्देब में जहाज़रानी पर हमला कर सकते थे, अब वे इस रणनीतिक अवरोध-बिंदु पर आ बैठे हैं और ज़्यादा आसानी से बारूदी सुरंगें बिछा सकते हैं, तथा जहाज़ों पर पनडुब्बी और कम दूरी के दृष्टि-रेखा ड्रोन दाग़ सकते हैं। संक्षेप में, मोख़ा पर हूती क़ब्ज़े ने ईरान समर्थित बलों को बाब अल-मन्देब को बाधित करने की वही क्षमता दे दी है जो इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) के पास होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर है।
बिन सलमान ने दूसरे नीतिगत फ़ैसलों से इस आपदा को और बढ़ाया है: उन्होंने सोमालीलैंड को कमज़ोर करने का काम किया है और सूडान के गृहयुद्ध में सूडानी सशस्त्र बलों के जनरल अब्देल फ़तह अल-बुरहान को आगे बढ़ाने की कोशिश की है। सऊदी नीति को आकार देने वाला साझा तत्व यही रहा है कि बिन सलमान वही करना चाहते हैं जो अबू धाबी के उलट हो। लेकिन सोमालीलैंड को अलग-थलग करके बिन सलमान उस इकलौते ठिकाने को अलग-थलग कर रहे हैं जहाँ से बाब अल-मन्देब को खुला रखा जा सकता है। उधर बुरहान सऊदी पैसा और हथियार लेने में ख़ुश हैं, लेकिन उन्होंने हूतियों को पोर्ट सूडान से काम करने की भी छूट दे रखी है, जिससे सऊदी अरब के लाल सागर बंदरगाह यानबू से तेल के प्रवाह पर ख़तरा मंडरा रहा है।
बिन सलमान किसी और को दोष नहीं दे सकते। उनके पिता मनोभ्रंश से पीड़ित हैं और उन्होंने सऊदी मानकों से भी अभूतपूर्व नियंत्रण हासिल करने की कोशिश की है। यमन पर बिन सलमान के हर फ़ैसले को अहंकार और अज्ञानता ने गढ़ा है, और इसकी क़ीमत सभी सऊदी चुकाएँगे। पिता के गुज़र जाने पर बिन सलमान शायद बादशाह बन ही जाएँ, लेकिन यमन में उनके रिकॉर्ड ने उनकी वैधता को रसातल में पहुँचा दिया है। फिर भी छुरे बाहर निकल चुके हैं और जल्द ही महल के भीतर तख़्तापलट हो सकता है।
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