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9/11 की बरसी पर नए ‘अख़वान धुरी’ को लेकर अमेरिकी दुविधा सुरक्षा के लिए ख़तरा

सऊदी सहिष्णुता, तुर्की हथियार, क़तरी पैसा और वॉशिंगटन की आँखमूँदी नीति नए मुस्लिम ब्रदरहुड को ताक़त दे रही है।

माइकल रुबिन ईरान, तुर्की और हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका के विशेषज्ञ हैं। उनके करियर में पेंटागन में अधिकारी के तौर पर काम करने का अनुभव शामिल है। इसमें ईरान, यमन और इराक़ में ज़मीनी स्तर के अनुभव के साथ-साथ 9/11 से पहले तालिबान के साथ संपर्क भी रहा है। श्री रुबिन ने सैन्य शिक्षा में भी योगदान दिया है और अमेरिकी नौसेना तथा मरीन इकाइयों को क्षेत्रीय संघर्षों और आतंकवाद के बारे में पढ़ाया है। उनके विद्वतापूर्ण काम में कई अहम प्रकाशन शामिल हैं, जैसे “Dancing with the Devil” और “Eternal Iran।” रुबिन ने येल यूनिवर्सिटी से इतिहास में पीएच.डी. और एम.ए., तथा जीव विज्ञान में बी.एस. की डिग्री हासिल की।

President Donald Trump Meets with Saudi Crown Prince Mohammed bin Salman in November 2025.
नवंबर 2025 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से मुलाक़ात करते हुए। · Shutterstock

राष्ट्रपति जिमी कार्टर का ईरानी इस्लामवादियों के प्रति भोलापन 1979 की इस्लामी क्रांति और ईरान तथा इस्लामी गणराज्य के बीच दशकों की दुश्मनी का कारण बना, जिसकी क़ीमत हज़ारों अमेरिकी जानों से चुकानी पड़ी। कार्टर ने ख़ुद को मानवाधिकार समुदाय के प्रगतिशील लोगों से घेर रखा था—सबसे चर्चित तौर पर प्रिंसटन के प्रोफ़ेसर रिचर्ड फ़ॉक (Richard Falk), जिन्होंने आयतुल्लाह रूहुल्लाह ख़ुमैनी के उदार मूल्यों के प्रति समर्पण की गवाही दी। बाद में संयुक्त राष्ट्र ने फ़ॉक को एक मलाईदार पद से नवाज़ा।

राष्ट्रपति फ़्रैंकलिन डेलानो रूज़वेल्ट ने सऊदी अरब के साथ अमेरिका का “Security for Oil” वाला रिश्ता क़ायम किया था, लेकिन रोनाल्ड रीगन और जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश—दोनों—ने सऊदी अरब के इस्लामवादी चरमपंथियों को बढ़ते समर्थन और अल क़ायदा के संस्थापक ओसामा बिन लादेन जैसे लोगों को पनाह देने, अगर नहीं तो संरक्षण देने की सऊदी कोशिशों की ओर से आँखें मूँद लीं। सऊदी सुअर पर लिपस्टिक लगाने की ऐसी तत्परता समय की कसौटी पर खरी नहीं उतरी।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब कई मोर्चों पर वही ग़लती दोहरा रहे हैं। अपने पहले कार्यकाल में ट्रंप ने तालिबान को साधा, उन्हें भरोसेमंद साझेदार मानते हुए। ईमानदारी से कहें तो दूत ज़लमय ख़लीलज़ाद, जिन्हें अब तालिबान के साथ मल्टीमिलियन-डॉलर सौदों पर मुहर लगाते हुए दिखाया जाता है, उन्हें ग़लत सलाह देते रहे। राष्ट्रपति जो बाइडन और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन ने अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी वापसी भले ही बिगाड़ दी हो, लेकिन अमेरिकी सहयोगियों और अफ़ग़ान महिलाओं को तालिबानी भेड़ियों के आगे फेंकने वाला समझौता ट्रंप की टीम ने ही किया था—यह जानते हुए कि 1996 में भी तालिबान ने गठबंधन सरकार के लिए बातचीत का नाटक किया था और इसके बजाय काबुल में घुसकर अपने विरोधियों को मार डाला था।

सऊदी अरब एक नई इस्लामवादी धुरी का केंद्र बन गया है। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने घरेलू सुधार तो लागू किए हैं, लेकिन वे सीरियाई राष्ट्रपतियों हाफ़िज़ और बशर अल-असद, और पाकिस्तान की एक के बाद एक आने वाली सरकारों की ग़लतियाँ दोहरा रहे हैं, जिन्होंने घर में जिहादवाद पर शिकंजा कसा, मगर विदेश में उसका समर्थन कर धार्मिक रूढ़िवादियों को मनाया—यह भूलकर कि जो आग वे फैलाते हैं, उसे वे क़ाबू में नहीं रख सकते; पलटवार हमेशा होता है।

दरअसल, यह पहले ही हो चुका है। अहंकार से परे, सऊदी-संयुक्त अरब अमीरात प्रतिस्पर्धा का मुख्य कारण लीबिया, सूडान और यमन में मुस्लिम ब्रदरहुड के प्रति रियाद की सहिष्णुता—अगर नहीं तो—उसे बढ़ावा देना है। यहाँ अबू धाबी सही है और रियाद ग़लत। यमन में अपने मुस्लिम ब्रदरहुड प्रतिनिधियों को आगे बढ़ाने की सऊदी इच्छा ने सऊदी अधिकारियों को दक्षिणी संक्रमणकालीन परिषद (Southern Transitional Council) के प्रमुख ऐदरूस अल-ज़ुबैदी और उनके दक्षिणी बलों पर बमबारी करने और फिर उनके शासन में बाधा डालने के लिए प्रेरित किया। अगर बिन सलमान ने यमन के हूती- और अल क़ायदा-समर्थक इस्लाह प्रतिनिधियों को बढ़ावा न दिया होता, तो हूती संभवतः बाब अल-मंदेब के मुहाने पर स्थित विपक्ष-नियंत्रित शहर मोखा पर क़ब्ज़ा नहीं कर पाते।

बिन सलमान के फ़ैसलों ने हूतियों को उनकी कल्पना से परे मज़बूत किया है। रियाद का यह रवैया कोई अपवाद भी नहीं था। बिन सलमान भले ही सऊदी विज़न 2030 और महिलाओं के सापेक्ष सशक्तीकरण की बात करें, लेकिन सऊदी अरब की डेल्टा इंटरनेशनल 9/11 की बरसी से ठीक कुछ दिन पहले तालिबान के साथ 200 मिलियन डॉलर का सौदा उनकी मंज़ूरी के बिना नहीं कर सकती थी। बिन सलमान का मक्का डिफ़ेंस पैक्ट 80 साल पुराने अमेरिकी-सऊदी रक्षा रिश्ते का निर्णायक खंडन था। यह सच है कि राष्ट्रपति बराक ओबामा और जो बाइडन ने बेवजह सऊदी अरब का अपमान किया, लेकिन रियाद की हरकतें बताती हैं कि उसका लक्ष्य रिश्ता दुरुस्त करना नहीं, बल्कि तोड़ना है।

यही बात तुर्की के मामले में भी सही है। 22 नवंबर 1994 को तत्कालीन मेयर रजब तैयब एर्दोआन ने HBB टेलीविज़न के Ceviz Kabuğu कार्यक्रम में घोषणा की थी, “Thank God, I am a servant of Shari’a,”। जब तुर्की सेना इदलिब में दाख़िल हुई, तो तुर्की समर्थित मिलिशिया ने नारा लगाया, “The Army of Muhammad has arrived।” ऐसी पृष्ठभूमि में उनके हालिया बयान कि “Hamas is not a terror organization,” और इसराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर उनका शाब्दिक प्रहार—“How are you different from Hitler? Is there anything Netanyahu has done that is less than Hitler? No”—हैरान नहीं करने चाहिए। फिर भी ट्रंप और राजदूत टॉम बैरक, जो कारोबार और कूटनीति को गड्डमड्ड करने वाले ख़लीलज़ाद के नज़र आने वाले तरीके को अपनाते हैं, एर्दोआन की छवि पर सफ़ेदी पोतते हैं। लाल रेखाओं और पश्चिमी सभ्यता की रक्षा में विफलता, या लीबिया और ग़ज़ा से लेकर सोमालिया और पाकिस्तान तक आतंक को मिलने वाले समर्थन पर शिकंजा न कसना, व्यवहार में नए “Axis of Ikhwan” के सबसे वैचारिक रूप से आक्रामक सदस्य को हरी झंडी दिखाता है।

इसी पैटर्न के तहत क़तर के अमीर से ट्रंप के निजी रिश्ते उन्हें आँखें मूँदने की ओर ले जाते हैं—एक तरफ़ तब, जब क़तर असर-रसूख़ ख़रीदने और वैचारिक प्रसार के लिए अमेरिकी संस्थानों पर क़ब्ज़ा जमाना चाहता है; दूसरी तरफ़ तब, जब यह गैस-समृद्ध देश दुनिया भर में कट्टरपंथी आंदोलनों को वित्तपोषित करता है। तुर्की के हथियार और क़तरी पैसे ने नए मुस्लिम ब्रदरहुड को आगे बढ़ाया है।

इस बीच, लीबिया और सूडान—दोनों—में ट्रंप के विशेष दूत मसाद बौलोस (Massad Boulos) मध्यस्थता कर रहे हैं, लेकिन वे प्रतिद्वंद्वी नेताओं के मुक़ाबले मुस्लिम ब्रदरहुड वाले पक्ष को तरजीह देते नज़र आते हैं। संभव है कि बौलोस विचारधारा को अपना मार्गदर्शक न बनने दें; वे किसी भी क़ीमत पर एक सौदा चाहते हैं और कारोबार व क्षेत्रीय राजकीय कूटनीति के बीच संतुलन साधने की उम्मीद करते हैं, लेकिन नतीजा वही रहता है: मुस्लिम ब्रदरहुड को जीवनदान, अगर नहीं तो ताक़त।

निजी या कारोबारी रिश्तों के लिए विचारधारा की अनदेखी करने वाले ट्रंप पहले व्यक्ति नहीं हैं। लेकिन जब अमेरिकी 9/11 हमलों की 25th anniversary मना रहे हैं, तब नए Axis of Ikhwan के प्रति उनकी दुविधा के दीर्घकालिक नतीजे उतने ही विनाशकारी हो सकते हैं, जितने ख़ुमैनी को छूट देने की कार्टर की तत्परता के साबित हुए थे।

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