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मक्का रक्षा गठबंधन की कमान पाकिस्तानी आतंकवाद-रोधी जनरल को

नौमान महमूद ने अपने सैन्य करियर का बड़ा हिस्सा असममित युद्ध लड़ने वाले संगठनों से मुक़ाबले में बिताया है।

कसवार क्लासरा इस्लामाबाद स्थित पत्रकार और The Islamabad Telegraph (इस्लामाबाद टेलीग्राफ़) के प्रधान संपादक हैं, जहाँ वे दक्षिण एशिया की सुरक्षा, रक्षा कूटनीति, विदेश नीति और क्षेत्रीय भू-राजनीति पर लिखते हैं।

Pakistan, Saudi Arabia, and Turkey signed the Mecca Joint Defense Agreement on August 7, 2026.
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने 7 अगस्त 2026 को मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। · Shutterstock

पाकिस्तान ने सेवानिवृत्त लेफ़्टिनेंट जनरल नौमान महमूद (Nauman Mahmood) को सऊदी नेतृत्व वाले मक्का रक्षा गठबंधन का पहला महासचिव नियुक्त किया है। इससे आतंकवाद-रोधी अभियानों, ख़ुफ़िया विश्लेषण और सैन्य योजना के अनुभवी अधिकारी को पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की को जोड़ने वाले इस नए सुरक्षा ढाँचे के केंद्र में रखा गया है। यह नियुक्ति अहम है, क्योंकि महमूद का करियर इस बात का संकेत देता है कि गठबंधन किस तरह की सुरक्षा चुनौती से निपटने की तैयारी कर रहा हो सकता है।

पाकिस्तान सरकार ने 23 सितंबर 2026 को घोषणा की कि महमूद—जो पाकिस्तान के दूसरे सर्वोच्च सम्मान हिलाल-ए-इम्तियाज़ (सैन्य) से सम्मानित हैं—रियाद में स्थापित किए जा रहे महासचिवालय का नेतृत्व करेंगे। तीनों देशों ने 7 अगस्त 2026 को मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमले को तीनों पर हमला माना जाएगा। 31 अगस्त को इस्तांबुल में रणनीतिक राजनीतिक और रक्षा समिति की पहली बैठक में देशों ने स्थायी सचिवालय स्थापित करने और पहले 3-वर्षीय महासचिव पद के लिए पाकिस्तान को चुनने पर सहमति जताई।

महमूद का चयन इसलिए उल्लेखनीय है, क्योंकि सऊदी अरब यमन के हूतियों से एक परिष्कृत ख़तरे का सामना कर रहा है। गठबंधन ने हूतियों को अपना मुख्य प्रतिद्वंद्वी घोषित नहीं किया है और उसके सदस्य इस समझौते को रक्षात्मक बताते रहे हैं, फिर भी इसके समय को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है। हूतियों ने छापामार युद्ध को ड्रोन, मिसाइलों और समुद्री हमलों के साथ जोड़ने की क्षमता दिखाई है, जिससे सऊदी भूभाग, ऊर्जा ढाँचे और दुनिया के सबसे अहम जहाज़रानी गलियारों में से एक को ख़तरा पैदा हुआ है।

महमूद ने अपने सैन्य करियर का बड़ा हिस्सा ऐसे संगठनों से मुक़ाबले में बिताया, जो इसी तरह का असममित युद्ध लड़ते हैं। सितंबर 1987 में पाकिस्तान की बलूच रेजिमेंट में कमीशन पाने वाले महमूद ने अप्रैल 2023 में सेवानिवृत्त होने से पहले लगभग 36 वर्ष सेवा दी। उनके करियर में फ़ील्ड कमांड, ख़ुफ़िया कार्य, रणनीतिक विश्लेषण और सैन्य शिक्षा शामिल रहे। उन्होंने क्वेटा के कमांड एंड स्टाफ़ कॉलेज, मिस्र के कमांड एंड स्टाफ़ कॉलेज और इस्लामाबाद की नेशनल डिफ़ेंस यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की, जहाँ उन्होंने युद्ध अध्ययन में स्नातकोत्तर उपाधि हासिल की। उन्होंने कई वर्ष कमांड एंड स्टाफ़ कॉलेज में भी बिताए और अंततः मुख्य प्रशिक्षक के रूप में सेवा दी।

उनके अभियानगत अनुभव में उत्तरी वज़ीरिस्तान में एक पैदल सेना डिवीज़न की कमान शामिल रही, जो अफ़ग़ान सीमा पर सक्रिय चरमपंथी संगठनों के ख़िलाफ़ पाकिस्तान के अभियान का केंद्र था। इसके बाद वे युद्धक्षेत्र की कमान से हटकर ख़ुफ़िया क्षेत्र में आए और इंटर-सर्विसेज़ इंटेलिजेंस में विश्लेषण निदेशालय के महानिदेशक बने। इस पद ने उन्हें रणनीतिक आकलनों, विदेशी ख़ुफ़िया एजेंसियों से संपर्क और उस व्यापक क्षेत्रीय परिवेश से परिचित कराया, जिसमें चरमपंथी संगठन काम करते हैं।

अप्रैल 2019 में उन्हें लेफ़्टिनेंट जनरल के पद पर पदोन्नत किया गया और बाद में उन्होंने सेना मुख्यालय में संचार और सूचना प्रौद्योगिकी के महानिरीक्षक के रूप में सेवा दी। दिसंबर 2019 में उन्होंने पेशावर में XI कोर की कमान संभाली।

यह समय महत्वपूर्ण था। पाकिस्तान का ख़ैबर पख़्तूनख़्वा आतंकवादी समूहों—ख़ासकर अफ़ग़ानिस्तान से जुड़े समूहों—के हमलों के प्रति संवेदनशील बना हुआ था। उसी समय अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान से हटने की तैयारी कर रहा था और तालिबान की वापसी के नतीजे लगातार ज़्यादा स्पष्ट होते जा रहे थे।

महमूद ने नवंबर 2021 में पेशावर की कमान छोड़ी और उसके बाद नेशनल डिफ़ेंस यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष बने, जिस पद पर वे अपनी सेवानिवृत्ति तक रहे। इस तरह उनका करियर उन कई क्षेत्रों से गुज़रा, जिन्हें नए गठबंधन को आपस में जोड़ना होगा: सैन्य अभियान, ख़ुफ़िया कार्य, रणनीतिक योजना और वरिष्ठ अधिकारियों की शिक्षा।

यह पृष्ठभूमि इसलिए मायने रखती है, क्योंकि हूती चुनौती कोई पारंपरिक सैन्य समस्या नहीं है। यमन का भूगोल, हूतियों की अपनी टुकड़ियों को बिखेर देने की क्षमता और अपेक्षाकृत सस्ते ड्रोन तथा मिसाइलों का उनका इस्तेमाल उन्हें सिर्फ़ पारंपरिक ताक़त से हराना कठिन बना देता है। सफल प्रतिक्रिया के लिए ख़ुफ़िया जानकारी, निगरानी, पूर्व चेतावनी, लक्ष्य-निर्धारण, सीमा सुरक्षा, समुद्री निगरानी और उस राजनीतिक तथा क़बायली परिवेश की समझ ज़रूरी है, जिसमें कोई सशस्त्र आंदोलन काम करता है।

पाकिस्तान ने इनमें से कई सबक अपने आतंकवाद-रोधी अभियानों से सीखे हैं, हालाँकि उत्तरी वज़ीरिस्तान यमन नहीं है। फिर भी बुनियादी सिद्धांत प्रासंगिक हैं। दोनों अभियानों का मक़सद सशस्त्र समूहों को पनाहगाह से वंचित करना, आपूर्ति नेटवर्क को बाधित करना, ख़ुफ़िया पैठ बढ़ाना, आबादी वाले केंद्रों की रक्षा करना और सैन्य दबाव को राजनीतिक तथा आर्थिक उपायों के साथ जोड़ना है।

रियाद में यही महमूद के सबसे महत्वपूर्ण योगदानों में से एक बन सकता है।

गठबंधन का पहला काम ऐसा संगठन खड़ा करना होगा, जो सामूहिक रक्षा को व्यवहार में उतार सके। इसके लिए यह तय करना होगा कि ख़ुफ़िया जानकारी कैसे साझा की जाए, ख़तरों का आकलन कैसे हो, आपसी तालमेल कैसा हो, अभ्यास कैसे संचालित हों और किन परिस्थितियों में पारस्परिक रक्षा की शर्त लागू होगी।

किसी पारंपरिक राजनयिक के बजाय एक सेवानिवृत्त पाकिस्तानी जनरल की नियुक्ति सचिवालय को साफ़ तौर पर सुरक्षा-केंद्रित रुख़ देती है।

यह ऐसे समय में भी हो रहा है, जब हूती ख़तरे ने व्यापक रणनीतिक महत्व हासिल कर लिया है। सऊदी अरब पर हमले अब सिर्फ़ यमन-सऊदी समस्या नहीं रह गए हैं।

इसलिए महमूद की नियुक्ति यह बड़ा सवाल खड़ा करती है कि मक्का गठबंधन आगे चलकर क्या रूप लेगा। समझौता रक्षात्मक है। पाकिस्तान ने ज़ोर देकर कहा है कि यह किसी देश के ख़िलाफ़ नहीं है; तुर्की ने कहा है कि यह ढाँचा संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करता है और मौजूदा गठबंधनों का पूरक है। तीनों सदस्यों ने रक्षा-औद्योगिक सहयोग, संयुक्त विकास और उत्पादन तथा सैन्य सहयोग के अन्य रूपों को संस्थागत बनाने पर भी चर्चा की है।

लेकिन रक्षात्मक गठबंधनों का स्वरूप अंततः उन्हीं ख़तरों से तय होता है, जिन्हें उन्हें रोकना है। ईरान हूती आंदोलन को निर्देशित नहीं तो प्रभावित ज़रूर करता है, जिससे खाड़ी के अरब देशों की सुरक्षा के किसी भी आकलन में व्यापक ईरानी भूमिका को शामिल करना ज़रूरी हो जाता है, हालाँकि मक्का गठबंधन के सदस्य ख़ुद को ईरान-विरोधी गठजोड़ नहीं मानते।

फिर भी इसका अर्थ यह है कि गठबंधन को ऐसे क्षेत्रीय परिवेश के लिए तैयार रहना होगा, जिसमें राज्य और ग़ैर-राज्य ख़तरे आपस में गुँथे हुए हैं।

मूल अंग्रेज़ी लेख पढ़ें: Pakistan Puts a Counter-Terrorism General at the Helm of the Mecca Defense Alliance

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