खाड़ी देशों में नागरिक रोज़गार से नौकरियाँ बढ़ीं, प्रवासी श्रम पर निर्भरता नहीं घटी
राष्ट्रीयकरण नीतियों के बावजूद कई खाड़ी अरब देशों में अर्थव्यवस्था को चलाने वाले अधिकांश काम प्रवासी ही करते हैं।
राधिका लक्ष्मीनारायणन शोधकर्ता और इतिहासकार हैं, जिन्होंने 3 दशकों से अधिक समय तक कुवैत और भारत की अग्रणी संस्थाओं के साथ काम किया है। वे Small States Security Dilemma—Kuwait after 1991 की लेखिका हैं।

पिछले एक चौथाई सदी से भी ज़्यादा समय से खाड़ी अरब देश प्रवासी श्रम पर निर्भरता घटाने और अर्थव्यवस्था में विविधीकरण लाने के लिए राष्ट्रीयकरण नीतियाँ अपनाते रहे हैं। इन अभियानों से नागरिकों का रोज़गार बढ़ा है, लेकिन प्रवासी श्रम की माँग समाप्त नहीं हुई। खाड़ी अरब देशों में श्रम बाज़ार दो हिस्सों में बँटा है: नागरिकों के लिए अपेक्षाकृत संरक्षित बाज़ार, और प्रवासियों के लिए ज़्यादा लचीला व कम लागत वाला बाज़ार, जहाँ अर्थव्यवस्था को थामे रखने वाले अधिकांश काम होते हैं।
सऊदी अरब में 2025 की चौथी तिमाही में कुल रोज़गार में नागरिकों की हिस्सेदारी लगभग 22 प्रतिशत थी, हालाँकि कार्यबल में अब भी प्रवासियों का वर्चस्व है। रियाद बड़ी संख्या में नागरिकों को निजी क्षेत्र में लाने में सफल रहा है।
कुवैत में 2025 के अंत तक कार्यबल में नागरिकों की हिस्सेदारी लगभग 19 प्रतिशत थी, जिनमें से लगभग 80 प्रतिशत सरकार में काम करते थे और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों में केवल लगभग 3.7 प्रतिशत ही कुवैती नागरिक थे। क़तर में 2024 में रोज़गार में नागरिकों की हिस्सेदारी लगभग 6 प्रतिशत थी, जबकि 82 प्रतिशत क़तरी सार्वजनिक क्षेत्र में काम करते हैं। संयुक्त अरब अमीरात में अमीरातीकरण ने निजी क्षेत्र में अमीरातियों की भागीदारी में उल्लेखनीय विस्तार किया है, लेकिन निजी क्षेत्र के श्रम बाज़ार पर प्रवासियों का दबदबा अब भी बना हुआ है। ओमान में काम करने वाले श्रमिकों में प्रवासियों की हिस्सेदारी 68 प्रतिशत है और निजी क्षेत्र की 86 प्रतिशत नौकरियाँ प्रवासियों के पास हैं। बहरीन में निजी क्षेत्र के अधिकांश रोज़गार में प्रवासी हैं, जबकि बहरीनी सरकारी क्षेत्र में कहीं ज़्यादा अनुपात में मौजूद हैं।
खाड़ी सहयोग परिषद में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का आकलन है कि निजी क्षेत्र के रोज़गार में प्रवासियों की हिस्सेदारी तीन-चौथाई से लेकर 99 प्रतिशत के बीच है, जो श्रम-बाज़ार के इस विभाजन के टिके रहने को रेखांकित करता है। ये रुझान बताते हैं कि राष्ट्रीयकरण ने सार्वजनिक और निजी रोज़गार में नागरिकों की भागीदारी बढ़ाई है, लेकिन प्रवासी श्रम की माँग को समाप्त नहीं किया है।
इस विभाजन का एक बड़ा कारण यह है कि परंपरागत रूप से सार्वजनिक क्षेत्र में नागरिकों को ऊँचा वेतन, उल्लेखनीय सरकारी लाभ, कम काम के घंटे और नौकरी की अधिक सुरक्षा मिलती रही है। वेतन का अंतर नागरिकों को सरकारी नौकरी की ओर ले जाता है, जबकि निजी नियोक्ता अक्सर कम वेतन पर प्रवासी श्रमिकों को रखना पसंद करते हैं, खासकर कम और मध्यम कौशल वाले कामों में। जब एक ही काम करने के लिए किसी नागरिक पर होने वाला खर्च किसी प्रवासी की तुलना में काफ़ी अधिक हो, तो कोटा दोनों को आर्थिक रूप से एक-दूसरे का विकल्प नहीं बना पाता। इसके जवाब में नियोक्ता कीमतें बढ़ा सकते हैं, नौकरियों का पुनर्गठन कर सकते हैं, स्वचालन में निवेश कर सकते हैं, कम मार्जिन स्वीकार कर सकते हैं या ऐसे क्षेत्रों में प्रवासी श्रमिकों को बनाए रख सकते हैं, जिन पर राष्ट्रीयकरण नियमों का असर अपेक्षाकृत कम होता है।
नागरिकों को निजी क्षेत्र में आने के लिए प्रोत्साहित करने और वेतन व लाभों का अंतर घटाने के लिए सरकारें निजी क्षेत्र में रोज़गार पर लगातार बढ़ती हुई सब्सिडी दे रही हैं। सऊदी अरब ह्यूमन रिसोर्स डेवलपमेंट फ़ंड के जरिए पात्र सऊदी कर्मचारियों के वेतन का एक हिस्सा अधिकतम दो साल तक वहन करता है, जबकि ओमान निजी क्षेत्र में नए ओमानी कर्मचारियों को प्रति माह लगभग 200 ओमानी रियाल [$520] देता है। नफ़ीस (Nafis) संयुक्त अरब अमीरात का एक संघीय कार्यक्रम है, जो वेतन सहायता, पेंशन, बाल भत्तों और प्रशिक्षण लाभों के माध्यम से निजी क्षेत्र में अमीरातियों के रोज़गार और लंबे समय तक उनकी निरंतरता बढ़ाना चाहता है। कुवैत भी दाम अल-अमाला (Da’am al-Amala) कार्यक्रम के जरिए निजी क्षेत्र में काम करने वाले नागरिकों के वेतन में पूरक सहायता देता है। ऐसे कदम नागरिकों की नियुक्ति में तेज़ी तो लाते हैं, लेकिन लगातार सब्सिडी से राजकोषीय लागत बढ़ती है, कंपनियों को कोटा का ‘अनुकूलन’ करने के लिए प्रेरणा मिलती है और निजी क्षेत्र का रोज़गार राज्य के सहारे पर निर्भर हो जाता है।
खाड़ी अरब देशों में दो समानांतर श्रम बाज़ार काम कर रहे हैं। पहला है नागरिक श्रम बाज़ार, जिसे कोटा, वेतन सब्सिडी, कौशल विकास, प्रशिक्षण कार्यक्रमों, सरकारी रोज़गार और चुनिंदा पेशों तक प्राथमिक पहुँच के सहारे चलाया जाता है। दूसरा है प्रवासी श्रम बाज़ार, जिसकी पहचान अधिक लचीलापन और कम श्रम लागत है। अक्सर, तय अनुपात से अधिक प्रवासी रोज़गार होने पर कंपनियाँ सरकार को अतिरिक्त शुल्क देती हैं, ताकि उन्हें उन प्रवासी श्रमिकों तक पहुँच मिलती रहे, जिनकी उन्हें अब भी ज़रूरत होती है।
मूल समस्या यह है कि नागरिकों की आंतरिक नियुक्ति केवल संख्याओं का अभ्यास बनकर रह जाती है। असली पैमाने होने चाहिए: प्रति कर्मचारी उत्पादकता; राष्ट्रीयता के बजाय कौशल और विशेषज्ञता से जुड़ा वेतन; सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की नौकरियों के बीच प्रतिस्पर्धात्मकता, तकनीक में निवेश; और प्रशिक्षण व वास्तविक करियर प्रगति। रोज़गार कोटा अपने आप में लक्ष्य नहीं हो सकता। सरकारों को नागरिक रोज़गार को बाज़ार-आधारित और प्रतिस्पर्धी बनाना चाहिए, प्रवासियों के लिए श्रम गतिशीलता में सुधार करना चाहिए और शोषणकारी तौर-तरीक़ों के विरुद्ध प्रवासी संरक्षण सुनिश्चित करना चाहिए। राष्ट्रीयकरण नीतियाँ यह तय करने के नियम बदल रही हैं कि रोज़गार तक किसकी पहुँच होगी, लेकिन वे अब तक बुनियादी रूप से यह नहीं बदल पाई हैं कि काम कौन करता है और कैसे करता है।
खाड़ी अरब देश अमेरिका का बड़ा निवेश आकर्षित करते हैं और ऊर्जा व लॉजिस्टिक्स के प्रमुख केंद्र हैं। निर्माण, आतिथ्य, परिवहन, विनिर्माण, खुदरा, स्वास्थ्य सेवा और घरेलू सेवाओं में मिलियनों श्रमिक काम करते हैं। जब श्रम बाज़ार विकृत हो जाते हैं, तो उसका असर उत्पादकता, प्रतिस्पर्धात्मकता, निवेश लागत, महँगाई और आर्थिक लचीलेपन पर पड़ता है। यह खास तौर पर उस क्षेत्र में अहम है जो ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक तेल बाज़ारों, आपूर्ति-शृंखला की स्थिरता, वित्तीय स्थिरता और व्यापक अमेरिकी हितों के लिए निर्णायक माना जाता है।
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