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Observer

श्रोडिंगर का तुर्की

एर्दोआन तुर्की की सैन्य क्षमता की परीक्षा नहीं लेंगे, क्योंकि उसकी थलसेना एक खोखला ढाँचा है और नौसेना की हालत उससे भी बदतर है।

माइकल रुबिन ईरान, तुर्की और हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका के विशेषज्ञ हैं। उनके करियर में पेंटागन में अधिकारी के तौर पर काम करने का अनुभव शामिल है। इसमें ईरान, यमन और इराक़ में ज़मीनी स्तर के अनुभव के साथ-साथ 9/11 से पहले तालिबान के साथ संपर्क भी रहा है। श्री रुबिन ने सैन्य शिक्षा में भी योगदान दिया है और अमेरिकी नौसेना तथा मरीन इकाइयों को क्षेत्रीय संघर्षों और आतंकवाद के बारे में पढ़ाया है। उनके विद्वतापूर्ण काम में कई अहम प्रकाशन शामिल हैं, जैसे “Dancing with the Devil” और “Eternal Iran।” रुबिन ने येल यूनिवर्सिटी से इतिहास में पीएच.डी. और एम.ए., तथा जीव विज्ञान में बी.एस. की डिग्री हासिल की।

Turkish President Recep Tayyip Erdoğan in a file photo.
तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन। · Shutterstock

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और मध्य पूर्व के नेता हूती लड़ाकों के मोखा पर क़ब्ज़े का जवाब देने के लिए जद्दोजहद में लगे हैं। मोखा एक छोटा बंदरगाह और क़स्बा है, जो बाब अल-मंदब के मुहाने पर बसा है। यह एक रणनीतिक संकरा जलमार्ग है, जो लाल सागर तक पहुंच को नियंत्रित करता है।

मिस्र भी इस खेल में है। मिस्र को संभालने के लिए अरबों डॉलर ख़र्च करने के बाद सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अब अपने निवेश पर प्रतिफल चाहते हैं। इसका मतलब लाल सागर पर स्थित मुख्य निर्यात टर्मिनल यानबू के पास एक मिस्री सैन्य अड्डा हो सकता है। बेशक, रियाद की उदारता से परे भी क़ाहिरा के लिए बहुत कुछ दांव पर है।

बिन सलमान का मक्का समझौता भी एजेंडे में है। यह सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच पारस्परिक रक्षा करार है, जिसे पिछले ही महीने अंतिम रूप दिया गया। बिन सलमान ने इसके ज़रिए अमेरिका को शर्मिंदा करने और 80 साल पुराने अमेरिकी-सऊदी रक्षा छत्र की प्रधानता के अंत का संकेत देने की कोशिश की, लेकिन यह अब भी साफ़ नहीं है कि पाकिस्तान और तुर्की सऊदी अरब की रक्षा के लिए आगे आएंगे या नहीं।

उत्तरी सऊदी अरब में तुर्की के एक अड्डे को लेकर कुछ चर्चा हुई है, लेकिन इससे हूतियों के ख़िलाफ़ सऊदी अरब को कोई मदद नहीं मिलेगी। बिन सलमान समझते हैं कि तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन को सऊदी अरब की परवाह मक्का और मदीना का अंतरराष्ट्रीयकरण करने तथा इसराइल की घेराबंदी को मज़बूत करने की अपनी इच्छा से आगे ज़्यादा नहीं है।

सऊदी अरब भले ही इस वक्त हूतियों के सीधे निशाने पर हो, लेकिन यह संकट तुर्की की सैन्य ताक़त के मिथक को भी उजागर करता है। काग़ज़ पर तुर्की मज़बूत है। NATO के नेता साइप्रस पर उसके क़ब्ज़े और ईजियन सागर तथा पूर्वी भूमध्य सागर में यूनान के ख़िलाफ़ उसकी उकसावेबाज़ी के लिए तुर्की की जवाबदेही तय करने से कतराते हैं, क्योंकि काग़ज़ पर उसकी सेना NATO में दूसरी सबसे बड़ी है।

थलसेना से आगे बढ़कर एर्दोआन लंबे समय से “ब्लू होमलैंड” का प्रचार करते रहे हैं। यह एक विस्तारवादी समुद्री नीति है, जिसके साथ काला सागर, भूमध्य सागर और ईजियन सागर में तुर्की नौसेना के व्यापक विस्तार को जोड़ा गया है। तुर्की ने अपनी समग्र सैन्य मौजूदगी भी बढ़ाई है—अड्डे बनाए हैं और कुछ मामलों में क़ब्ज़े वाले साइप्रस, सीरिया, क़तर और सोमालिया में विमान तैनात किए हैं। तुर्की का ड्रोन बेड़ा दमदार है।

ख़बरों के मुताबिक़ बिन सलमान ने अमेरिकी मदद मांगी है और हालांकि F-35 जॉइंट स्ट्राइक फ़ाइटर की बिक्री की घोषणा अहम है, लेकिन हूतियों के ख़िलाफ़ इसका कोई मतलब नहीं है, क्योंकि प्रशिक्षण और आपूर्ति में वर्षों लगेंगे—भले ही कांग्रेस इसे न रोके।

विदेश में तुर्की की सबसे बड़ी सैन्य तैनाती अब सोमालिया में है। तुर्की उस देश में एक अंतरिक्ष अड्डा बना रहा है, एक बड़ा नौसैनिक अड्डा चलाता है और मोगादिशु के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को नियंत्रित करता है। पिछले एक दशक में तुर्की ने सोमालिया में हज़ारों विशेष बल कमांडो को प्रशिक्षित किया है।

तो फिर एर्दोआन तुर्की की नौसेना, ड्रोन और विशेष बलों का इस्तेमाल कर बाब अल-मंदब को खुला रखने में मदद देकर बिन सलमान की रक्षा के लिए आगे क्यों नहीं आते? सोलहवीं और उन्नीसवीं सदी के अधिकांश समय में उस्मानी साम्राज्य ने यमन के तिहामा तट पर शासन किया था, जो अब घेरे में है। एर्दोआन सोमालिया में तुर्की की मौजूदगी को जायज़ ठहराने के लिए उस्मानी मिसाल का हवाला देते हैं, लेकिन उन्होंने इतिहास ग़लत समझा: उस्मानी कभी असल सोमालिया तक पहुंचे ही नहीं; इसके बजाय उन्होंने सोमालीलैंड के उत्तर-पश्चिमी अवदल क्षेत्र को उपनिवेश बनाया था।

एर्दोआन के ठोस मदद न देने की संभावित वजह यह है कि तुर्की की ताक़त, उसकी सैन्य दक्षता को लेकर बनी अनिश्चितता में ही निहित है। हां, जब वह निहत्थे कुर्द किसानों पर बमबारी कर रहा होता है तो तुर्की ख़ुद को महाशक्ति कह सकता है, लेकिन अगर तुर्की की सेना वाक़ई ताक़तवर होती, तो वह कुर्दों के साथ 40 साल से अधिक लंबे विद्रोह में गतिरोध के अलावा कुछ और हासिल कर चुकी होती।

राजनीतिक सफ़ाए—जिसमें प्रशिक्षित F-16 पायलटों में से हर पांच में से एक जेल में है और अधिकांश शीर्ष सैन्य अधिकारी बदले जा चुके हैं—का मतलब है कि तुर्की की सेना एक खोखला ढांचा है। एर्दोआन के जनरल मोर की तरह अकड़कर चल सकते हैं, लेकिन ऐसा कोई संकेत नहीं है कि उनमें लड़ने की क्षमता बची है। तुर्की की नौसेना की हालत और भी बदतर है। वह निहत्थे भूकंपीय तेल अन्वेषण जहाज़ों को परेशान कर सकती है, लेकिन लड़ नहीं सकती। तुर्की की ताक़त इसी में है कि वह अपनी सेना के खोखलेपन को उजागर होने से बचा ले जाता है।

जिस तरह एर्विन श्रोडिंगर ने मशहूर विचार-प्रयोग श्रोडिंगर की बिल्ली रचा था—जिसमें एक डिब्बे में बंद बिल्ली न ज़िंदा थी, न मुर्दा, जब तक कोई प्रेक्षक उसकी स्थिति की पुष्टि न कर दे—वैसे ही आज एर्दोआन श्रोडिंगर के तुर्की के मुखिया हैं। उसकी सैन्य दक्षता का दावा इसी पर टिका है कि उस दक्षता की परीक्षा कभी न ली जाए। एर्दोआन तुर्की की सेना को बाब अल-मंदब में तैनात नहीं करेंगे, क्योंकि उन्हें नाकामी का और इस बात की अंतरराष्ट्रीय पहचान का डर है कि उनकी शेख़ी खोखली बयानबाज़ी से ज़्यादा कुछ नहीं।

मूल अंग्रेज़ी लेख पढ़ें: Schrödinger’s Turkey

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