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यमन के मैदान में सीरिया के जिहादी

सीरियाई सलाफ़ी सोशल मीडिया प्रभावकों ने असद शासन और ईरान समर्थित अत्याचारों की यादों को हथियार बना लिया है।

अली अलमरेयाती ऑपरेशन इराक़ी फ़्रीडम के दौरान अमेरिकी सशस्त्र बलों के लिए युद्धक्षेत्र दुभाषिया रह चुके हैं। बाद में उन्होंने इराक़ी संसद में वरिष्ठ सुरक्षा सलाहकार के रूप में काम किया; इस दौरान उन्होंने 2016 में अमेरिकी बंधकों के बचाव और इस्लामिक स्टेट (ISIS) के ख़िलाफ़ लड़ाई में योगदान दिया, और अमेरिकी सरकारी एजेंसियों के लिए आतंकवाद-रोधी ख़ुफ़िया स्रोत के तौर पर भी काम किया। उन्होंने इराक़ और तुर्की में राजनयिक के रूप में सेवाएँ दीं; इस दौरान उनका ध्यान अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा, उग्रवाद, हाइब्रिड युद्ध और भू-राजनीतिक मामलों पर रहा।

Fighter of the Southern Giants Brigades on a mountain overlooking frontline positions against the Houthis, Dhale province.
दाली प्रांत में हूतियों के ख़िलाफ़ अग्रिम मोर्चों को देखती पहाड़ी पर खड़ा सदर्न जायंट्स ब्रिगेड्स का एक लड़ाका। · Photo: Michael Rubin

सीरियाई सलाफ़ी प्रभावक यमन में हूती-विरोधी अभियान के साथ महज़ एकजुटता ही नहीं जता रहे; वे सीरिया के युद्धकालीन ज़ख़्मों को यमन के सलाफ़ी नेटवर्कों के लिए लामबंदी के आख्यान में बदल रहे हैं। अगर क्षेत्रीय देश इस प्रवृत्ति का फ़ायदा उठाते हुए सीरियाई लड़ाकों को यमन में तैनात करते हैं, तो वे सीमापार जिहादी नेटवर्कों को फिर सक्रिय करने और आतंकवाद के ख़िलाफ़ तथा स्थिरीकरण के लिए अमेरिका के तीन दशकों के प्रयासों को कमज़ोर करने का जोखिम उठाएंगे।

सीरियाई सलाफ़ी सोशल मीडिया प्रभावक 2011–2023 के सीरियाई गृहयुद्ध के दौरान असद शासन और ईरान समर्थित अत्याचारों की यादों को हथियार बना रहे हैं। वे नरसंहार, यातना और विस्थापन का हवाला देकर यमन के गुटों, ख़ासकर सलाफ़ी-प्रभुत्व वाली सदर्न जायंट्स ब्रिगेड्स (Southern Giants Brigades) के साथ वैचारिक एकरूपता गढ़ते हैं।

भौगोलिक और राजनीतिक सीमाओं को समेटकर सलाफ़ी प्रभावक यमन को दमिश्क और अलेप्पो का विस्तार बना देते हैं। वे हूतियों को यमन का कोई स्थानीय धड़ा नहीं, बल्कि उस व्यापक सांप्रदायिक युद्ध के सहभागी के रूप में पेश करते हैं जिसने सीरियाई समुदायों को तहस-नहस कर दिया। असद, ईरान के प्रॉक्सी नेटवर्क और हूतियों को एक ही दुश्मन में समेटकर वे उन राजनीतिक और ऐतिहासिक भेदों को मिटा देते हैं जो सीरियाई और यमनी रणक्षेत्रों को अलग करते हैं। संदेश सीधा है: जिस दुश्मन से सीरियाई सीरिया में लड़े, वही अब यमन में है।

यह फ्रेमिंग दर्शकों के लिए यमन के जटिल राजनीतिक इतिहास को समझने की ज़रूरत ही ख़त्म कर देती है। जिस सीरियाई को हूतियों, सदर्न ट्रांज़िशनल काउंसिल (Southern Transitional Council), या यमन की क़बायली संरचनाओं और क्षेत्रीय राजनीति के बारे में कम जानकारी है, उसे यह सब सीखने की ज़रूरत नहीं। उसे बस दुश्मन पहचानना है: अरब प्रायद्वीप के आर-पार फैला ईरान का हाथ।

प्रभावक यमन में भागीदारी को धार्मिक कर्तव्य के स्तर तक उठा देते हैं। वे इसे भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि जिहाद और शहादत के रूप में पेश करते हैं। वे यमनी सलाफ़ी सशस्त्र गुटों के समर्थन को एक इस्लामी संघर्ष में “ग़लत पक्ष” के ख़िलाफ़ रक्षात्मक युद्ध बताते हैं। इस्लाम की रक्षा के आह्वान भागीदारी को वैकल्पिक चीज़ से बदलकर नैतिक रूप से अनिवार्य बना देते हैं।

यहीं ऑनलाइन प्रचार रणनीतिक रूप से निर्णायक बन सकता है। यह बयानबाज़ी भर्ती के मनोवैज्ञानिक और वैचारिक अवरोधों को कम करती है, ख़ासकर उन सीरियाइयों के बीच जिनकी राजनीतिक और धार्मिक पहचान सीरियाई संघर्ष ने गढ़ी है। जब प्रभावक यमन जाने की तत्परता दिखाते हैं या दूसरों को ऐसा करने के लिए उकसाते हैं, तो वे पहले से मौजूद सीमापार ढांचे को सक्रिय कर देते हैं। सीरियाई और यमनी सलाफ़ी-जिहादी नेटवर्कों के बीच ऐतिहासिक संबंध—जो आंशिक रूप से साझा अल-क़ायदा वंशक्रम में निहित हैं—वह संगठनात्मक ढांचा देते हैं जो ऑनलाइन लामबंदी को समन्वित सैन्य गतिविधि में बदल देता है। ये नेटवर्क वह देते हैं जो अकेला प्रचार पैदा नहीं कर सकता: रिश्ते, मिसालें, साझा पहचान और वे माध्यम जिनके ज़रिए लोग ऑनलाइन आस्था से संगठित गतिविधि तक पहुंच सकते हैं।

साथ ही, इस सलाफ़ी-जिहादी बयानबाज़ी के कुछ हिस्सों में एक व्यापक राजनीतिक लक्ष्य भी उभरता है। सीरिया में अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-शरा (Ahmed al-Sharaa) से जुड़े शासन-ढांचों की तर्ज़ पर इस्लामी शासन के आह्वान से लगता है कि कुछ पक्ष हूतियों की हार को अंतिम लक्ष्य नहीं, बल्कि यमन में अपनी पसंद की इस्लामवादी राजनीतिक व्यवस्था दोहराने के अवसर के रूप में देखते हैं। हूतियों की हार और सलाफ़ी शासन की स्थापना को एक-दूसरे का पर्याय मानने से यह जोखिम है कि एक चरमपंथी ख़तरे को हराते हुए दूसरे के लिए ज़मीन तैयार हो जाए।

सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच मक्का संयुक्त रक्षा समझौते (Mecca Joint Defense Agreement) से जुड़ी संस्थागत जड़ता इस अप्रत्यक्ष भागीदारी के मॉडल को आकर्षक बना सकती है: सीरियाई लड़ाके जनशक्ति दे सकते हैं, जबकि राज्य प्रायोजक राजनीतिक, वित्तीय और साजो-सामान संबंधी सहयोग मुहैया कराएं। ऐसी व्यवस्था क्षेत्रीय शक्तियों को ईरान और हूतियों के ख़िलाफ़ अपनी सेनाएं सीधे झोंके बिना ताक़त दिखाने का मौक़ा देगी। तुर्की लीबिया और नागोर्नो-कराबाख़ में यह तरीक़ा पहले ही दिखा चुका है। उस मिसाल का यह अर्थ नहीं कि यमन में भी वही मॉडल अपनाया जाएगा—लेकिन इससे यह संभावना रणनीतिक रूप से प्रासंगिक ज़रूर हो जाती है। तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन को ऐसा तरीक़ा आकर्षक लगेगा। सऊदी नेतृत्व इसे किफ़ायती तरीक़े से बोझ दूसरों पर डालने के रूप में देख सकता है। तंत्र साफ़ दिखता है: मौजूदा नेटवर्कों और शिकायतों को लामबंद करो, उन्हें यमन की ओर मोड़ो, और जो काम पारंपरिक सेनाएं नहीं कर सकतीं, उसे जिहादी जोश से करवा लो।

ख़तरा यह है कि बाब-अल-मंदेब गलियारे को स्थिर करने के सऊदी नेतृत्व वाले प्रयास ऐसा माहौल बना सकते हैं, जो जिहादी विचारधारा का सैन्यीकरण कर दे। यमन का संघर्ष एक व्यापक जिहादी लामबंदी तंत्र को फिर से सक्रिय करने का उत्प्रेरक बन सकता है, जिसमें सीरिया के युद्धकालीन ज़ख़्म, यमनी सलाफ़ी नेटवर्क, ईरान-विरोधी सांप्रदायिकता और क्षेत्रीय शक्ति प्रतिस्पर्धा एक-दूसरे को मज़बूत करें। ऐसी लामबंदी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को तेज़ कर सकती है और इराक़ी तथा अन्य ईरान-समर्थक सशस्त्र गुटों की प्रतिक्रिया को भड़का सकती है।

अमेरिकी नीति-निर्माताओं के लिए अहम सवाल यह है कि कहीं हूती आक्रामकता का मुक़ाबला करने की कोशिशें अनजाने में सीमापार जिहादी नेटवर्कों को फिर से खड़ा न कर दें और उस व्यापक प्रॉक्सी युद्ध को हवा न दे दें, जिसे काबू में रखने की कोशिश अमेरिका तीन दशकों से आतंकवाद-निरोध के ज़रिए करता रहा है। नीति-निर्माताओं को यह ढांचा जम जाने से पहले कार्रवाई करनी चाहिए।

मूल अंग्रेज़ी लेख पढ़ें: Syria’s Jihadists in Yemen’s Battlefield

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