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तालाबानी परिवार को अब निर्वासन के बारे में सोचना चाहिए

आज के कुर्दों के लिए पेशमर्गा राष्ट्रीय आंदोलन का अगुआ दस्ता नहीं, बल्कि पार्टी की सरपरस्ती पाने वाले कारोबारी हैं।

माइकल रुबिन ईरान, तुर्की और हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका के विशेषज्ञ हैं। उनके करियर में पेंटागन में अधिकारी के तौर पर काम करने का अनुभव शामिल है। इसमें ईरान, यमन और इराक़ में ज़मीनी स्तर के अनुभव के साथ-साथ 9/11 से पहले तालिबान के साथ संपर्क भी रहा है। श्री रुबिन ने सैन्य शिक्षा में भी योगदान दिया है और अमेरिकी नौसेना तथा मरीन इकाइयों को क्षेत्रीय संघर्षों और आतंकवाद के बारे में पढ़ाया है। उनके विद्वतापूर्ण काम में कई अहम प्रकाशन शामिल हैं, जैसे “Dancing with the Devil” और “Eternal Iran।” रुबिन ने येल यूनिवर्सिटी से इतिहास में पीएच.डी. और एम.ए., तथा जीव विज्ञान में बी.एस. की डिग्री हासिल की।

A view of Salim street in Sulaymani, Iraqi Kurdistan.
इराक़ी कुर्दिस्तान के सुलेमानी में सलीम स्ट्रीट का एक दृश्य। · Shutterstock

अमेरिकी सैनिक इराक़ से निकलने की तैयारी कर रहे हैं और ट्रंप प्रशासन इराक़ी कुर्द पेशमर्गा को मिलने वाली दशकों पुरानी सब्सिडी बंद करने की योजना पर आगे बढ़ रहा है। ऐसे में सवाल है कि क्या इराक़ी कुर्दिस्तान में 35 साल से चला आ रहा यथास्थिति अब खत्म होने वाली है?

1975 में विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने कुर्द विद्रोह के पैरों तले से ज़मीन खींच ली। इसके बाद, मुल्ला मुस्तफ़ा बरज़ानी के उपनेता जलाल तालाबानी ने सीरियाई समर्थन के साथ कुर्दिस्तान डेमोक्रेटिक पार्टी से अलग होकर पैट्रियोटिक यूनियन ऑफ़ कुर्दिस्तान (Patriotic Union of Kurdistan) बनाने का फ़ैसला किया। यह कुर्दिस्तान डेमोक्रेटिक पार्टी में पहली फूट नहीं थी, लेकिन सबसे दूरगामी साबित हुई।

तालाबानी की शिकायतें जायज़ थीं। मुल्ला मुस्तफ़ा बरज़ानी एक क़बाइली नेता थे और उन्होंने कुर्दिस्तान डेमोक्रेटिक पार्टी को क़बाइली आंदोलन बना दिया। 1979 में पिता की मौत के बाद मुल्ला मुस्तफ़ा के बेटे मसूद ने कमान संभाली और उसी क़बाइली दृष्टि को बनाए रखा। तालाबानी परिवार अलग था—आंशिक रूप से सोच के कारण और आंशिक रूप से इसलिए कि जलाल के पास वैसी क़बाइली वंशावली नहीं थी।

मुल्ला महमूद तालाबानी ने 19वीं सदी की शुरुआत में क़ादरी सूफ़ीवाद को पुनर्जीवित किया था, और उनके उत्तराधिकारी किरकुक स्थित तालाबानी तकिया से काम करते थे। लेकिन जलाल तालाबानी उनके प्रत्यक्ष वंशज नहीं थे; ज़्यादा से ज़्यादा वे दूर के चचेरे भाई थे। धार्मिक अधिकार शेख़ रिज़ा तालाबानी की वंश-परंपरा से होकर गुज़रता रहा, जबकि जलाल की वैधता का दावा ज़्यादा राजनीतिक था। जलाल ने इसके बजाय कुर्द आंदोलन के लिए एक अधिक वैचारिक, प्रगतिशील और आधुनिक दृष्टि को आगे बढ़ाने की कोशिश की।

मिसाल के तौर पर, पैट्रियोटिक यूनियन ऑफ़ कुर्दिस्तान सोशलिस्ट इंटरनेशनल संगठन में शामिल हुई। स्थापना के बाद कई दशकों तक पैट्रियोटिक यूनियन ऑफ़ कुर्दिस्तान की मुख्य भर्ती-दलील यही रही कि वह भाई-भतीजावाद के बजाय एक दृष्टि पर टिकी है। ख़ुद इराक़ी कुर्दिस्तान के भीतर सत्ता-साझेदारी योजना के तहत साथ रहने की एक अल्पकालिक कोशिश—जिसमें एक पार्टी के हर प्रमुख का उपनेता दूसरी पार्टी से होता था—सीमा शुल्क राजस्व के विवादों की पृष्ठभूमि में ढह गई। 1994–1997 के गृहयुद्ध में 5,000 से ज़्यादा कुर्द पेशमर्गा मारे गए, और कुर्द पार्टियों ने दसियों हज़ार और लोगों को विस्थापन के लिए मजबूर किया, क्योंकि बरज़ानी खेमे ने तालाबानी समर्थकों को खदेड़ा और इसके उलट तालाबानी खेमे ने बरज़ानी समर्थकों को।

कुर्द अक्सर आगंतुकों को पेशमर्गा की बहादुरी और सद्दाम हुसैन के शासन के ख़िलाफ़ उनकी लड़ाई की मिथकीय कथाएँ सुनाते हैं, लेकिन कुर्द लड़ाके अब राजनीतिक मिलिशिया से ज़्यादा कुछ नहीं रह गए हैं—हश्द अल-शाबी की शिया मिलिशिया से बस पंथ और नेतृत्व के मामले में अलग। आज कुर्द अपने पेशमर्गा को किसी राष्ट्रीय आंदोलन के अगुआ दस्ते की तरह नहीं, बल्कि कारोबारियों और पार्टी संरक्षण पाने वालों के रूप में ज़्यादा जानते हैं।

हाल के दशकों में तालाबानी की दृष्टि की शुद्धता क्षीण होती गई। इराक़ पर अमेरिकी हमले की आहट के साथ ही तालाबानी ने अपने बेटों को आगे बढ़ाना शुरू किया—पहले चोरी-छिपे, फिर खुलकर। इस भाई-भतीजावादी मोड़ ने तालाबानी की अपनी पार्टी को भी तोड़ दिया। तालाबानी के पूर्व उपनेता नौशिरवान मुस्तफ़ा ने एक अधिक वैचारिक राजनीतिक विकल्प बचाए रखने के लिए अलग होकर गोर्रान आंदोलन बनाया, हालांकि जीवन के अंत में उन्होंने भी इससे विश्वासघात किया।

दिसंबर 2012 में तालाबानी को भारी स्ट्रोक पड़ा और इसके क़रीब पाँच साल से कुछ कम समय बाद उनका निधन हो गया। इस अक्षमता के दौर में उनकी पत्नी हीरो इब्राहिम अहमद ने अपने दोनों बेटों को लगातार अधिक ताक़तवर पदों तक पहुँचाने के लिए क़दम बढ़ाए, जबकि उनके चचेरे भाई लाहुर भी पायदान चढ़ते गए। 2020 में पैट्रियोटिक यूनियन ऑफ़ कुर्दिस्तान ने सह-अध्यक्षता की व्यवस्था लागू की, जिसमें लाहुर और जलाल के सबसे बड़े बेटे बाफ़िल ने कमान संभाली। दूसरे बेटे क़ुबाद परदे के पीछे काम करते रहे—कुर्दिस्तान डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता मसूद बरज़ानी के सबसे बड़े बेटे मसरूर के मुक़ाबले पैट्रियोटिक यूनियन ऑफ़ कुर्दिस्तान के उपनेता के तौर पर।

जनवरी 2022 में बाफ़िल ने व्यवहार में एक आंतरिक तख़्तापलट किया, लाहुर को बाहर कर दिया और पार्टी की कमान अपने हाथ में ले ली, हालांकि क़ुबाद उनके साथ प्रभावी द्वि-शासन में शासन करते रहे। जब लाहुर ने निर्वासन में जाने के संकेतों को ठुकरा दिया, तो बाफ़िल ने उन्हें गिरफ़्तार करने के लिए अमेरिका-प्रशिक्षित बल भेजे। इसी दौरान बाफ़िल ने उनके कई अंगरक्षकों को मार डाला और प्रक्रिया में उनका परिसर जला दिया।

इधर बरज़ानी खेमे में भी इसी तरह के पीढ़ीगत बदलाव और अंदरूनी खींचतान हुई, ख़ासकर तब, जब मसूद बरज़ानी ने रोज़मर्रा के नियंत्रण से खुद को पीछे खींच लिया। पहले, उनके सबसे बड़े बेटे मसरूर ने सत्ता के लिए पहले चचेरे भाई नेचिरवान से प्रतिस्पर्धा की। हाल के समय में मसरूर ने अपने ही भाइयों को किनारे कर दिया है, ताकि अपने सबसे बड़े बेटे और मुल्ला मुस्तफ़ा के परपोते आरीन के लिए रास्ता बनाया जा सके।

भौगोलिक कारणों से बरज़ानी परिवार अपेक्षाकृत अधिक समृद्ध रहा है। कुर्दिस्तान डेमोक्रेटिक पार्टी के नियंत्रण में इराक़ी कुर्दिस्तान की तुर्की के साथ पूरी सीमा है, और ईरान तथा सीरिया की ओर जाने वाली अहम सीमा-चौकियाँ भी। तालाबानी परिवार का नियंत्रण सिर्फ़ ईरानी सीमा के आसपास के क्षेत्र तक सीमित है। इसके अलावा, मंत्रालयों पर अपने नियंत्रण के ज़रिए बरज़ानी परिवार अधिक धन निकाल पाने में सक्षम रहा है। हालांकि दोनों कुर्द पार्टियाँ बग़दाद से होने वाले धन-हस्तांतरण की रफ़्तार और रक़म को लेकर शिकायत करती हैं, लेकिन ज़्यादा पैसा कुर्दिस्तान डेमोक्रेटिक पार्टी से होकर गुज़रा।

तुर्की के साथ कुर्दिस्तान डेमोक्रेटिक पार्टी के करीबी रिश्ते भी बरज़ानी परिवार को तालाबानी परिवार की तुलना में कहीं ज़्यादा कूटनीतिक सहारा देते हैं। ईरान से तेल की तस्करी करने की तालाबानी परिवार की क्षमता भले उनके बैंक खातों को भर दे, लेकिन पश्चिम में इससे उन्हें कोई कूटनीतिक फ़ायदा नहीं मिलता।

दोनों पार्टियों के पेशमर्गा ने अमेरिका को दी गई अपनी मदद को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया, ख़ासकर इस्लामिक स्टेट (ISIS) के उभार के बाद। बरज़ानी के कुछ पेशमर्गा की कायरता ने इस्लामिक स्टेट को पूरे-के-पूरे यज़ीदी समुदायों पर क़ब्ज़ा करने में मदद की। पेंटागन ने आनन-फ़ानन में इरबिल तक रसद पहुँचाई, लेकिन मसूद ने उन्हें मोर्चे पर इस्तेमाल करने के बजाय अधिकांश सामग्री गोदामों में ही रख दी। आख़िरकार हश्द अल-शाबी ने इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ लड़ाई का रुख़ पलटा, जबकि पेशमर्गा ज़्यादातर रक्षात्मक भूमिका में रहे। कई कुर्दों के लिए इस्लामिक स्टेट अब धुंधली याद भर है, लेकिन बरज़ानी की गुणात्मक और संख्यात्मक सैन्य बढ़त अब भी बनी हुई है।

अमेरिकी बलों की वापसी और पेशमर्गा के वेतन पर दी जाने वाली अमेरिकी सब्सिडी का अंत ऐसी शृंखला प्रतिक्रिया शुरू करेगा, जो पैट्रियोटिक यूनियन ऑफ़ कुर्दिस्तान को ढहने तक पहुँचा सकती है। वेतन के बिना पार्टियाँ संरक्षण नहीं बाँट सकतीं, और इससे घटते संसाधनों तथा घटती सैन्य ताक़त का चक्र बनता है। पैट्रियोटिक यूनियन ऑफ़ कुर्दिस्तान और कुर्दिस्तान डेमोक्रेटिक पार्टी—दोनों को नुकसान होगा, लेकिन पैट्रियोटिक यूनियन ऑफ़ कुर्दिस्तान का ख़ज़ाना पहले खाली होगा। अगर बरज़ानी परिवार मंदी झेलता भी है, तो उनके तुर्क सहयोगी संभवतः उन्हें जीवन-रेखा देंगे—ठीक वैसे ही, जैसे वे सोमालिया में राष्ट्रपति हसन शेख़ महमूद को देते हैं। तालाबानी परिवार दो वजहों से ईरान से वैसा समर्थन नहीं पा सकेगा: पहली, ईरानी खुद दिवालिया हैं; और दूसरी, जो भी संसाधन वे ख़र्च कर सकते हैं, वे उन्हें हश्द अल-शाबी को देना ज़्यादा पसंद करेंगे।

तालाबानी परिवार इसके बजाय अपनी उम्मीदें बग़दाद पर टिका सकता है—दरअसल उन्होंने इराक़ी राजनीति का खेल हमेशा बेहतर खेला है—लेकिन संभव है कि यह भी पर्याप्त न हो, ख़ासकर अगर मसूद, मसरूर और आरीन बरज़ानी को निर्णायक प्रहार का मौक़ा दिखे।

त्रासदी यह है कि तालाबानी परिवार को जन-समर्थन पर भी भरोसा नहीं रहेगा। पिछले वसंत में क़ुबाद ने वॉशिंगटन में एक अहम सम्मेलन के बजाय कान (Cannes) की यात्रा चुनी। उधर द्वि-शासन की हरकतों और भ्रष्टाचार से खिन्न युवा पीढ़ी के चलते उनके अपने गढ़ सुलैमानी के बहुत-से लोग तालाबानी भाइयों को मुरझाते देखने पर खुश होंगे। लोगों को जलाल पसंद थे, लेकिन वफ़ादारी पीढ़ियों के पार नहीं गई।

जैसा लाहुर के साथ हुआ, सत्ता का अंत आने पर वह तेज़ और हिंसक हो सकता है। बाफ़िल और क़ुबाद उस समय-रेखा पर अब लगातार कम नियंत्रण रखते हैं; यह मसूद और मसरूर बरज़ानी और तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन के हाथ में है।

आगे क्या हो सकता है? बाफ़िल और क़ुबाद, दोनों छुट्टियाँ मनाने जाते हैं। पूरी संभावना है कि वे निकल जाएँ और फिर लौट न सकें। तुर्की पहले भी सुलैमानी का हवाई क्षेत्र बंद कर चुका है, और बग़दाद तथा इरबिल भी वैसा कर सकते हैं। तेहरान परंपरागत रूप से तालाबानी परिवार को एक बफ़र के तौर पर समर्थन देता रहा है, लेकिन ईरानी नेतृत्व के नेचिरवान बरज़ानी से मज़बूत रिश्ते हैं और कुछ साझा कारोबारी हितों के चलते मसरूर से भी रिश्ते लगातार अधिक सौहार्दपूर्ण होते जा रहे हैं। क़ुबाद की पत्नी अमेरिकी हैं और दोनों की वॉशिंगटन के उपनगर में संपत्ति है; क़ुबाद और बाफ़िल दोनों का ठिकाना इसी तरह लंदन में भी हो सकता है।

इस बीच, सुलैमानी के लिए आगे क्या होता है, यह भी उतना ही अहम होगा। पैट्रियोटिक यूनियन ऑफ़ कुर्दिस्तान और बाद में गोर्रान को लेकर निराशा की जड़ सुलैमानी की संस्कृति में है। इरबिल बेहद रूढ़िवादी है; सुलैमानी कहीं अधिक प्रगतिशील और सहिष्णु। कुर्दिस्तान की विडंबना हमेशा यही रही है कि बरज़ानी परिवार जहां अपने इलाके को नया दुबई बनाने की बातें करता रहा, वहीं दुबई वाली मानसिकता सुलैमानी को कहीं अधिक आसानी से रास आती है।

अगर तालाबानी परिवार चला जाता है, तो कुर्दों को उम्मीद करनी चाहिए कि मसरूर और आरीन यह समझें कि सुलैमानी को बंदूक़ की नोक पर नया इरबिल बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। उन्हें सुलैमानी के इस अपवाद को पहचानना, उसे संवारना और यहां तक कि उसकी हिफ़ाज़त भी करनी होगी, वरना वे सुलैमानी में असंतोष की एक नई पीढ़ी बो देंगे, जिसकी आँच इरबिल तक भी पहुँच सकती है। सुलैमानी को नरम हाथ चाहिए और ऐसे राजनेता चाहिए, जो उसके नागरिकों की क्षमता का गला घोंटने के बजाय उसे पनपने दें।

मूल अंग्रेज़ी लेख पढ़ें: The Talabanis Should Start Thinking About Exile

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