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निर्वासितों पर ईरानी शासन का बदलता रुख़ क्या बताता है

शासन ने प्रवासी समुदाय के 100 से अधिक ऐसे लोगों की सूची तैयार की है, जिन्हें ईरान लौटने की अनुमति दी जाएगी।

Shay Khatiri यॉर्कटाउन इंस्टिट्यूट (Yorktown Institute) में वरिष्ठ फ़ेलो और रेनी सेंटर (Rainey Center) में फ़ेलो हैं।

An interior view of Tehran's streets and squares in a file photo.
फ़ाइल तस्वीर में तेहरान की सड़कों और चौराहों का एक दृश्य। · Shutterstock

आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई के बाद के दौर में इस्लामी गणराज्य ईरान बदल रहा है। इसका एक संकेत यह है कि वह कुछ विपक्षी सदस्यों को ईरान लौटने की अनुमति देने को तैयार दिखता है, बशर्ते वे पहलवी शासन के विरोधी रहे हों और ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिका-इसराइल युद्ध के विरोध में रहे हों। इनमें दो सबसे प्रमुख मामले गायक मोहसिन नामजू (Mohsen Namjoo) और BBC फ़ारसी के पूर्व प्रधान संपादक मसूद बेहनूद (Masoud Behnoud) के हैं।

अब ऑनलाइन उपलब्ध न रहे एक इंस्टाग्राम पोस्ट में नामजू ने घोषणा की थी कि वह क़रीब 19 साल बाद ईरान लौट रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह यात्रा इतनी अचानक तय हुई कि इंस्टाग्राम स्टोरी के ज़रिए ही वह अपनी पत्नी को इसकी ख़बर दे रहे हैं; उन्होंने यह नहीं बताया कि यात्रा किसने तय करवाई।

नामजू शासन के आलोचक रहे हैं और शासन से जुड़े मीडिया के निशाने पर आ गए थे। लेकिन पिछले वर्षों में वह विपक्ष के उस धड़े के भी आलोचक बन गए, जिसका नेतृत्व पूर्व युवराज रज़ा पहलवी करते हैं और जो अमेरिकी व इसराइली सरकारों के साथ साझेदारी चाहता था। उन्होंने रज़ा शाह पर हमला करता एक गीत तक रिकॉर्ड किया, जिसमें उन्हें दबंग कहा गया। उन्होंने युद्ध का समर्थन करने वाले ईरानियों पर भी हमला किया और इसके लिए शासन से जुड़े मीडिया में उनकी तारीफ़ भी हुई।

सुधारवादी पत्रकार बेहनूद, जो क़ैद के बाद ईरान छोड़कर विपक्षी पत्रकार बन गए थे, ने भी ऐसी ही राह पकड़ी। ख़ामेनेई की जान लेने वाले संयुक्त हमलों के बाद बेहनूद ने इस हमले की निंदा की और ख़ामेनेई को ग़लत ढंग से “ईरानी जनता का चुना हुआ नेता” बताया, जिसे इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) से जुड़े टेलीग्राम चैनलों में व्यापक कवरेज मिली। 17 सितंबर 2026 को उन्होंने घोषणा की कि कुछ चिकित्सा समस्याओं के समाधान के बाद वह ईरान लौटेंगे।

5 अगस्त 2026 को संस्कृति और इस्लामी मार्गदर्शन मंत्री अब्बास सालेही (Abbas Salehi) ने कहा कि शासन ने प्रवासी समुदाय के 100 से अधिक ऐसे लोगों की सूची तैयार की है, जिन्हें ईरान लौटने की अनुमति दी जाएगी। इनमें धार्मिक बुद्धिजीवी अब्दोलकरीम सोरूश (Abdolkarim Soroush) और ड्यूक यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर मोहसिन कदीवर (Mohsen Kadivar) शामिल हैं। यह कहते हुए कि कई मुद्दों पर उनकी इन लोगों से असहमति है, सालेही ने फिर युद्ध के दौरान विपक्ष के ख़िलाफ़ शासन के पक्ष में खड़े होने के उनके साहस की प्रशंसा की।

पॉप गायक क़ेसर (Qeysar) और इन्फ़्लुएंसर मीना नामदारी (Mina Namdari) जैसी अपेक्षाकृत कम चर्चित हस्तियाँ भी ईरान लौट चुकी हैं। सोशल मीडिया पर खुले कपड़ों के कारण शासन के कोप का शिकार रहीं नामदारी ने लौटने के बाद कहा कि पहले उन्हें डर था कि लौटते ही उन्हें फाँसी दे दी जाएगी।

नामदारी का यह डर जायज़ था, लेकिन युद्ध ने शासन के आकलन को बदल दिया है। युद्ध जनाधार के अभाव का नतीजा था। युद्धविराम के बाद से इस्लामी गणराज्य सामाजिक जीवन पर अपनी पकड़ ढीली करके उस जनाधार को फिर से खड़ा करना चाहता है। सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद का सचिव नियुक्त होने के बाद मोहसिन रज़ाई (Mohsen Rezaei) ने राष्ट्रीय एकता को “एक रणनीतिक अनिवार्यता” बताया।

यह रुख़ प्रवासी समुदाय की कुछ हस्तियों को शासन का पक्षधर बनने के लिए प्रोत्साहित करेगा। जो लोग मातृभूमि को याद करते हैं और लौटना चाहते हैं, उनके पास अब इस्लामी गणराज्य का बचाव करने और पहले जनमत को प्रभावित कर तथा विदेश में बैठे विपक्ष को बदनाम कर अपनी क़ीमत चुकाने की वजह है।

रूहुल्लाह ख़ुमैनी की मृत्यु के बाद शासन मुख्यतः धर्मतंत्र से बदलकर ख़ामेनेई की देखरेख में मुख्यतः सैन्य तानाशाही बन गया। फिर भी उसने यथासंभव अपनी सामाजिक रूढ़िवादिता बनाए रखी। यह खुला सवाल है कि शासन के मौजूदा स्वरूप की कमान किसके हाथ में है, ख़ासकर तब जब सर्वोच्च नेता मोजतबा ख़ामेनेई की हालत के बारे में कुछ पता नहीं है, जिससे उनके पिता के पुराने दुश्मनों और आलोचकों को यह कहने का मौक़ा मिल रहा है कि फ़ैसले मोजतबा ख़ामेनेई नहीं ले रहे। मौजूदा नेतृत्व ख़ामेनेई की तुलना में अधिक सैन्यवादी और कम इस्लामवादी है। यह मानना तर्कसंगत है कि अपनी बढ़ती धर्मनिरपेक्षता की भरपाई के लिए वह और भी आक्रामक विदेश नीति अपनाएगा।

यह दाँव सफल भी हो सकता है, लेकिन इसकी विफलता विनाशकारी होगी। यह विचार इस मान्यता पर टिका है कि पर्याप्त संख्या में ईरानी शासन को माफ़ करने को तैयार हैं, जिससे उस अति-चरमपंथी मूल की भरपाई हो जाएगी, जो काफ़ी हद तक धर्मनिरपेक्ष हो चुके इस्लामी गणराज्य का साथ छोड़ सकता है। शासन के लिए यही सर्वोत्तम स्थिति है। लेकिन यह भी संभव है कि शासन के अपराध ईरानी जनता के माफ़ कर पाने की हद से कहीं आगे हों और यह क़दम नए नेतृत्व को समर्थन की क़ीमत ही चुकाए।

मूल अंग्रेज़ी लेख पढ़ें: What Does the Iranian Regime’s Changing Position on Exiles Suggest?

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