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अमेरिका की इस्लामवाद-विरोधी नीति अब किस दिशा में

पूरे अमेरिका में विदेशी चरमपंथी और आतंकी संगठन 501(c) ग़ैर-मुनाफ़ा व्यवस्था के ज़रिए खुलेआम काम कर रहे हैं।

सैम वेस्ट्रॉप मार्च 2017 से Islamist Watch का नेतृत्व कर रहे हैं। वे टेक्सस पब्लिक पॉलिसी फ़ाउंडेशन (Texas Public Policy Foundation) में वरिष्ठ फ़ेलो भी हैं। इससे पहले, वे लंदन स्थित चरमपंथ-विरोधी संगठन स्टैंड फ़ॉर पीस (Stand for Peace) का संचालन करते थे।

Federal anti-terrorism command center, with a big screen and radar surveillance used for reconnaissance on satellite system.
संघीय आतंकवाद-निरोधी कमान केंद्र, जहाँ बड़ी स्क्रीन और उपग्रह प्रणाली पर निगरानी के लिए इस्तेमाल होने वाला रडार लगा है। · Shutterstock

अक्टूबर 2001 में अमेरिका के नेतृत्व में अफ़ग़ानिस्तान पर हमला तब शुरू हुआ, जब ग्राउंड ज़ीरो की आग अब भी धधक रही थी। दक्षिण एशिया के एक आतंकी राष्ट्र पर इस हमले और उसके बाद 20 साल तक खिंची लड़ाई से अमेरिकी नीति-निर्माताओं का परिचय दक्षिण एशियाई इस्लामवाद के सवाल से हो जाना चाहिए था। लेकिन देवबंदवाद, यानी तालिबान की इस्लामवादी विचारधारा, आज भी काफ़ी हद तक अनजानी बनी हुई है। कम से कम अफ़ग़ानिस्तान में तो अमेरिका कभी जान ही नहीं पाया कि वह किससे लड़ रहा है।

नतीजतन घरेलू समस्या और बिगड़ती गई। अमेरिकी अधिकारियों ने पाकिस्तान से आने वाले देवबंदी मदरसा स्नातकों के प्रवाह को रोकने की कोई कोशिश नहीं की; इनमें से कुछ ने अमेरिका के धार्मिक वीज़ा कार्यक्रम का इस्तेमाल किया। देवबंदी सीमा-पार दमन अभियानों के प्रॉक्सी और आतंक से जुड़े देवबंदी तबलीगी आंदोलनों ने 501(c) ग़ैर-मुनाफ़ा व्यवस्था के ज़रिए अमेरिका में अपना संचालन खड़ा कर लिया। पूरे अमेरिका में शरिया वित्त देने वाली संस्थाओं ने शीर्ष देवबंदी विद्वानों को अपने कामकाज का संचालन सौंपा। हाल के वर्षों में शिकागो स्थित देवबंदी व्यक्तियों और संस्थाओं का एक नेटवर्क तालिबान शासन के साथ साझेदारी कर रहा है और उसकी पैरवी कर रहा है।

अमेरिका में बिना निगरानी के चल रही दक्षिण एशियाई इस्लामवादी ताक़त सिर्फ़ देवबंदी नहीं हैं। दावत-ए-इस्लामी, अहल-ए-हदीस, जमात-ए-इस्लामी, तंज़ीम-ए-इस्लामी, तहरीक-ए-जाफ़रिया, कश्मीरी इस्लामवादी और कई अन्य अमेरिका के ग़ैर-मुनाफ़ा ढाँचे के ज़रिए काम कर रहे हैं, सैकड़ों मिलियन डॉलर जुटा रहे हैं और अमेरिकी मुसलमानों की नई पीढ़ियों को कट्टरपंथी बना रहे हैं। अमेरिका में घरेलू स्तर पर उभर रहे नए इमामों का बड़ा हिस्सा उन्हीं नए मदरसों और सेमिनरी का स्नातक है, जिन्हें दक्षिण एशियाई इस्लामवादी नेटवर्कों ने अमेरिकी ज़मीन पर स्थापित किया है।

नीति-निर्माता और पत्रकार ग़लती से यह मानते रहे कि इस्लामवाद का सवाल मुख्य रूप से मध्य पूर्व की समस्या है। नतीजतन 9/11 हमलों के बाद संघीय ध्यान मध्य पूर्वी सलफ़ी-जिहादियों—जैसे अल क़ायदा—ईरानी शासन के प्रॉक्सी—जैसे हिज़्बुल्लाह—और मुस्लिम ब्रदरहुड पर केंद्रित रहा, जिसके विचारक हिंसक और अहिंसक—दोनों तरीक़ों से काम करते हैं।

इस नज़रिए से दो समस्याएँ पैदा हुईं। पहली, जब संघीय अधिकारी इन गिने-चुने इस्लामवादी नेटवर्कों पर ध्यान लगाए रहे, तो अन्य नेटवर्क निगरानी के अभाव में फलते-फूलते रहे। 9/11 हमलों के पच्चीस साल बाद भी अमेरिका के नेता, विचारक और पुलिसकर्मी इस्लामवादी आस्था के पूरे दायरे को पहचानने और उसका मुक़ाबला करने में विफल रहे हैं।

दूसरी, मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे क़ानून के दायरे में रहने वाले इस्लामवादियों के ख़तरे में संघीय दिलचस्पी भी क्षणिक ही रही। 2009 तक संघीय सरकार ने अपना दायरा और सिकोड़ लिया और मुस्लिम ब्रदरहुड तथा हमास के नेटवर्कों के ख़िलाफ़ अभियोजन रोक दिया, यह मानकर कि क़ानूनी इस्लामवाद सलफ़ी-जिहाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में सहयोगी साबित हो सकता है। जाँच के दायरे में रहे कई समूहों को तो बाद में सार्वजनिक धन और साझेदारी तक मिली।

आज अमेरिका भर के मुस्लिम समुदायों में इस्लामवाद, ज़्यादातर बिना किसी चुनौती के, बढ़ रहा है। समुद्र पार पश्चिमी यूरोप के मुरझाते समाजों पर एक नज़र डालना बताता है कि अमेरिकी अधिकारियों को अपने तौर-तरीक़े पर फिर से सोचने की ज़रूरत है। संघीय सरकार को निम्नलिखित सिद्धांत अपनाने चाहिए।

पहला, वॉशिंगटन को इस ख़तरे को समझना और घोषित करना होगा। हर इस्लामवादी नेटवर्क का नाम लेकर और उसका नक़्शा तैयार कर सार्वजनिक संस्थाएँ उनकी संस्थाओं, व्यक्तियों, वित्त और गतिविधियों की शिनाख़्त कर सकती हैं। ख़तरे को स्वीकार करने से कार्रवाई की संभावना भी बनती है। इस्लामवाद को उसके विभिन्न नेटवर्कों में बाँटकर देखने से सरकार को जाँच करने, धन रोकने और मुक़दमा चलाने के लिए ठोस लक्ष्य मिलते हैं।

हालांकि यह तभी काम करेगा जब सरकार में थोड़ी रीढ़ हो। दूसरा, अमेरिकी सरकार को मौजूदा वैधानिक औज़ारों का इस्तेमाल करना चाहिए और क़ानून लागू करना चाहिए। 2008 के बाद से संघीय सरकार घरेलू इस्लामवादी आतंक-वित्तपोषण अभियानों पर मुक़दमा चलाने को तैयार नहीं दिखी—जब तक कि मामला हिज़्बुल्लाह, अल क़ायदा या इस्लामिक स्टेट से जुड़ा न हो। 7 अक्टूबर, 2023 के हमलों के बाद भी, अमेरिका भर में खुलेआम काम कर रही हमास-समर्थक चैरिटी संस्थाओं की पूरी शृंखला को बंद करने के लिए कोई स्पष्ट कार्रवाई होती नहीं दिखी।

पूरे देश में 501(c) मानवीय सहायता चैरिटी संगठन विदेशी चरमपंथी संगठनों और घोषित आतंकी समूहों के प्रॉक्सी या साझेदार के रूप में खुलेआम काम कर रहे हैं। मिसाल के तौर पर, हेल्पिंग हैंड फ़ॉर रिलीफ़ एंड डेवलपमेंट (Helping Hand for Relief and Development), जो दक्षिण एशियाई इस्लामवादी आंदोलन जमात-ए-इस्लामी की एक शाखा के रूप में काम करता है, ने 2017 में अमेरिका द्वारा घोषित पाकिस्तानी आतंकी समूह लश्कर-ए-तैयबा के साथ साझेदारी की। संघीय सरकार ने न सिर्फ़ आँखें मूँद लीं; बल्कि बाद में इस चैरिटी को करदाताओं का पैसा भी सौंपा।

ईरानी परिवार 501(c) व्यवस्था के ज़रिए चरमपंथी उद्देश्यों को धन देते हुए प्रतिबंध क़ानूनों का उल्लंघन करते दिखते हैं। क़तरी और तुर्क इस्लामवादी नेटवर्क विदेशी एजेंट क़ानूनों का उल्लंघन करते हुए खुलेआम काम कर रहे हैं। और ख़त्म-ए-नुबुव्वत तथा दावत-ए-इस्लामी जैसे हिंसक चरमपंथी, जो ईशनिंदा-विरोधी हिंसा में शामिल हैं, मस्जिदों और स्कूलों के सुनियोजित नेटवर्क की बदौलत 501(c) व्यवस्था के ज़रिए मिलियनों डॉलर जुटा रहे हैं। सरकार के पास जाँच करने और मुक़दमा चलाने के लिए बहुत कुछ है।

तीसरा, संघीय सरकार को एक कारगर कट्टरपंथ-विरोधी कार्यक्रम की स्थापना पर फिर से विचार करना चाहिए, जो इस्लामवादी नेटवर्कों का धन रोकने और उन्हें निष्प्रभावी करने के प्रयासों का मार्गदर्शन करे। पहले के विफल प्रयास—ख़ासकर ओबामा प्रशासन के—जिनमें “कंटरिंग वायलेंट एक्स्ट्रीमिज़्म” (Countering Violent Extremism) कार्यक्रम बनाया गया था, समाज वैज्ञानिकों की इस धारणा पर टिके थे कि विचारधारा वैचारिक हिंसा को प्रेरित नहीं करती। जैसा कि यूरोपीय सरकारें अब समझ चुकी हैं, अहिंसक इस्लामवादी नेटवर्कों का स्कूलों, सेमिनरी, मस्जिदों और चैरिटी संस्थाओं पर नियंत्रण, हिंसक इस्लामवादी नतीजों को खाद-पानी देता है।

पच्चीस साल बाद, इस समस्या को ठीक करने के उपाय साफ़ हैं। लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति अब भी नदारद है।

मूल अंग्रेज़ी लेख पढ़ें: What’s Next for America’s Counter-Islamism Policy?

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