मध्य पूर्व में ईंधन संकट का सबसे बड़ा ख़तरा किन देशों पर
भारी मात्रा में तेल निर्यात करने वाले देश भी जीवाश्म ईंधन के लिए विदेशी आयात पर निर्भर हो सकते हैं।
उमुद शोकरी वॉशिंगटन, डी.सी. में स्थित ऊर्जा रणनीतिकार और विदेश नीति सलाहकार हैं। उन्हें ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु नीति और वैश्विक ऊर्जा संक्रमण के क्षेत्र में दो दशक से अधिक का अनुभव है।

मध्य पूर्व में ईंधन संकट का ख़तरा सिर्फ़ कच्चे तेल के उत्पादन तक सीमित नहीं है। अगर किसी देश के पास रिफ़ाइनिंग क्षमता, भंडारण, सुरक्षित आपूर्ति मार्ग या आपातकालीन आयात के लिए धन जुटाने के वित्तीय संसाधन नहीं हैं, तो वह दिन में मिलियन बैरल तेल निकालकर भी ख़ाली पेट्रोल पंपों के साथ खड़ा रह सकता है।
क्षेत्र की सरकारों के सामने दो तरह के ख़तरे हैं। आयात, महँगाई और सब्सिडी—तीनों की लागत बढ़ती है। भौतिक क़िल्लत का मतलब है ख़ाली पेट्रोल पंप, राशनिंग और परिवहन, बिजली उत्पादन, कृषि व उद्योग में व्यवधान। हालांकि जिन देशों के पास सबसे कम तेल है, ज़रूरी नहीं कि वे ही सबसे ज़्यादा असुरक्षित हों। असल में असुरक्षित वे देश हैं, जो खोई हुई आपूर्ति की जगह आसानी से वैकल्पिक आपूर्ति नहीं जुटा सकते।
लेबनान, सीरिया और यमन पर सबसे तात्कालिक ख़तरा है। लेबनान परिवहन, बैकअप बिजली उत्पादन और आवश्यक सेवाओं के लिए आयातित रिफ़ाइंड पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भर है। देश का वित्तीय संकट, मुद्रा की कमज़ोरी और राजनीतिक गतिरोध आयातकों और सार्वजनिक संस्थानों के लिए यह मुश्किल बना देते हैं कि अंतरराष्ट्रीय क़ीमतें बढ़ने या जहाज़रानी महँगी होने पर वे बड़ी आपातकालीन खेप हासिल कर सकें। समुद्री आपूर्ति पर लेबनान की निर्भरता उसे पूर्वी भूमध्यसागर में किसी भी व्यवधान के प्रति भी असुरक्षित बनाती है। ईंधन बाज़ार के हालिया आकलन दिखाते हैं कि वैश्विक तेल क़ीमतों में बढ़ोतरी कितनी जल्दी लेबनानी उपभोक्ताओं और कारोबारों तक पहुँच जाती है।
सीरिया में क्षतिग्रस्त ढांचा, कमज़ोर सार्वजनिक वित्त और बाहरी ईंधन आपूर्ति पर निर्भरता—तीनों एक साथ हैं। वर्षों के संघर्ष ने तेल उत्पादन, रिफ़ाइनिंग, बिजली उत्पादन और वितरण नेटवर्क की विश्वसनीयता घटा दी। विश्व बैंक ने ईंधन क़ीमतों में बार-बार हुई बढ़ोतरी और सब्सिडी जारी रखने की सरकार की घटती क्षमता का दस्तावेज़ीकरण किया है। ये दबाव सीरिया को आयातित कच्चे तेल, रिफ़ाइंड उत्पादों या परिवहन मार्गों में किसी भी व्यवधान के प्रति संवेदनशील बनाते हैं।
यमन और भी अधिक असुरक्षित है। संघर्ष ने देश के संस्थानों को बिखेर दिया है, उसकी मुद्रा को कमज़ोर किया है और बंदरगाहों, सड़कों तथा ऊर्जा ढांचे को नुक़सान पहुँचाया है। विश्व बैंक चेतावनी देता है कि राजकोषीय तनाव, नक़दी की कमी और ईंधन व्यवधान यमन की आर्थिक असुरक्षा को लगातार गहरा कर रहे हैं। लाल सागर के बंदरगाहों या जहाज़रानी मार्गों को प्रभावित करने वाला कोई भी अवरोध तेज़ी से क़िल्लत पैदा कर सकता है, ख़ासकर उन इलाक़ों में जहां कोई कारगर विकल्प नहीं है।
ईरान की असुरक्षा का स्वरूप अलग है। वह बड़ी मात्रा में कच्चा तेल पैदा करता है और उसके पास उल्लेखनीय रिफ़ाइनिंग क्षमता है, लेकिन प्रतिबंध वित्त, तकनीक, उपकरण और कल-पुर्ज़ों तक पहुंच सीमित कर देते हैं। अधिक घरेलू खपत, सब्सिडी वाली क़ीमतें, अक्षम वितरण और ईंधन की तस्करी इस व्यवस्था की सहनशक्ति को और घटाते हैं। ईरान छोटे व्यवधान को लेबनान या यमन से बेहतर झेल सकता है, लेकिन लंबा संकट कच्चे तेल के उत्पादन और पेट्रोल, डीज़ल तथा अन्य रिफ़ाइंड उत्पादों की भरोसेमंद आपूर्ति के बीच की गंभीर कमज़ोरियों को उजागर कर सकता है।
तुर्की, जॉर्डन, मिस्र और इराक़ बीच की स्थिति में हैं। तुर्की आयातित तेल और गैस पर निर्भर है, जिससे वह अंतरराष्ट्रीय क़ीमतों में बढ़ोतरी के प्रति खुला रहता है। हालांकि उसकी बड़ी अर्थव्यवस्था, स्थापित रिफ़ाइनिंग क्षेत्र, आधुनिक बंदरगाह और भूमध्यसागर व काला सागर के बाज़ारों तक पहुंच उसे क्षेत्र के कई आयातकों की तुलना में अधिक लचीलापन देते हैं। देश कई आपूर्तिकर्ताओं और परिवहन गलियारों का सहारा ले सकता है, हालांकि लंबे समय तक ऊंची क़ीमतें फिर भी महँगाई बढ़ाएँगी और चालू खाते पर दबाव डालेंगी। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी तुर्की को ऐसा देश बताती है, जिसमें ऊर्जा का काफ़ी विविधीकरण है, लेकिन आयातित जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता बनी हुई है।
जॉर्डन आयातित ऊर्जा पर निर्भर है, लेकिन उसे अक़ाबा बंदरगाह और अपेक्षाकृत स्थिर बाहरी साझेदारियों का लाभ मिलता है। क्षेत्रीय जहाज़रानी मार्ग असुरक्षित हो जाएँ या आयात का वित्तपोषण कमज़ोर पड़े, तो उसका जोखिम बढ़ जाएगा। मिस्र के पास स्वेज़ नहर और स्वेज़-भूमध्यसागर पाइपलाइन प्रणाली समेत अधिक रिफ़ाइनिंग, भंडारण और परिवहन क्षमता है। फिर भी ऊंची घरेलू मांग, राजकोषीय दबाव और अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों पर निर्भरता किसी लंबे उत्पाद संकट को महँगा बना देगी।
इराक़ दिखाता है कि कच्चे तेल के उत्पादन से सुरक्षा मापने की सीमाएँ क्या हैं। इराक़ भारी मात्रा में तेल निर्यात करता है, फिर भी वह अपनी सहायक गैस को इकट्ठा करने और घरेलू बिजली मांग पूरी करने में संघर्ष करता है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की रिपोर्ट है कि इराक़ आयातित ईरानी गैस पर निर्भर है और उस आपूर्ति में कमी आने पर उसे लगातार बिजली की क़िल्लत झेलनी पड़ती है। रिफ़ाइनिंग में सुधार से कुछ उत्पादों की कमी घट सकती है, लेकिन कमज़ोर बिजली नेटवर्क, गर्मियों की ऊंची मांग और दक्षिणी निर्यात ढांचे पर निर्भरता इराक़ को घरेलू और समुद्री—दोनों तरह के व्यवधानों के प्रति असुरक्षित रखती है।
सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के पास सबसे मज़बूत तात्कालिक सुरक्षा-कवच हैं। दोनों के पास बड़ी उत्पादन और रिफ़ाइनिंग प्रणालियाँ, मज़बूत राजकोषीय क्षमता और कच्चे तेल के निर्यात के ऐसे वैकल्पिक मार्ग हैं, जो होर्मुज़ जलडमरूमध्य को बायपास करते हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का अनुमान है कि सऊदी और संयुक्त अरब अमीरात की पाइपलाइनें मिलकर लगभग 3.5–5.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन की संभावित बायपास क्षमता देती हैं। यह क्षमता होर्मुज़ से होने वाले पूरे प्रवाह की जगह नहीं ले सकती, लेकिन यह दोनों देशों को कुवैत, क़तर, बहरीन या इराक़ की तुलना में अधिक लचीलापन देती है।
कुवैत, क़तर, ओमान और बहरीन को भी घरेलू उत्पादन, रिफ़ाइनिंग परिसंपत्तियों और वित्तीय भंडार का लाभ है, लेकिन इनमें से ज़्यादातर होर्मुज़ के रास्ते समुद्री पहुंच पर कहीं अधिक निर्भर हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने कहा कि 2025 में इस जलडमरूमध्य से क़रीब 20 मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल और लगभग 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन पेट्रोलियम उत्पाद गुज़रे। उसका यह भी कहना है कि क़तर के तरलीकृत प्राकृतिक गैस निर्यात का लगभग 93 प्रतिशत और संयुक्त अरब अमीरात के तरलीकृत प्राकृतिक गैस निर्यात का 96 प्रतिशत इसी जलमार्ग से गुज़रता है। दो हफ़्ते के व्यवधान में भौतिक क़िल्लत सबसे पहले संभवतः लेबनान, सीरिया और यमन को प्रभावित करेगी। जॉर्डन, मिस्र, इराक़ और तुर्की शुरुआती झटके को आयात, भंडार और वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं के ज़रिये सोख लेंगे, लेकिन डीज़ल और तरलीकृत पेट्रोलियम गैस के बाज़ार तेज़ी से तंग हो सकते हैं।
तीन से छह महीने का संकट राशनिंग, आर्थिक जड़ता और मानवीय दबाव का ख़तरा खड़ा कर देगा। तुर्की और मिस्र को आयात और उत्पादों के लिए अधिक क़ीमत चुकानी होगी, और इराक़ पर ईंधन तथा बिजली—दोनों का एक साथ दबाव रहेगा। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के पास लॉजिस्टिक्स और वित्त के मामले में सबसे अधिक गुंजाइश होगी, लेकिन वे भी होर्मुज़ जलडमरूमध्य के सामान्य प्रवाह की पूरी भरपाई नहीं कर पाएंगे।
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