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सीरिया पर तुर्की के क़ब्ज़े की चर्चा क्यों नहीं

उत्तरी सीरिया के हिस्सों में तुर्की की मौजूदगी अल-शरा की उस कोशिश को उलझा रही है, जिसमें वे ख़ुद को एक स्वतंत्र नेता के रूप में पेश करना चाहते हैं।

Sirwan Kajjo पत्रकार और शोधकर्ता हैं, जिनकी विशेषज्ञता कुर्द राजनीति, इस्लामी उग्रवाद और सीरियाई मामलों में है। उन्होंने सीरिया और कुर्दों पर दो पुस्तक-अध्याय लिखे हैं, जो Indiana University Press और Cambridge University Press से प्रकाशित हुए हैं। सीरियाई और कुर्द मुद्दों पर उनके लेख मिडिल ईस्ट फ़ोरम (Middle East Forum), वॉशिंगटन इंस्टीट्यूट फ़ॉर नियर ईस्ट पॉलिसी (Washington Institute for Near East Policy) तथा अन्य प्रमुख शोध संस्थाओं और प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं। Kajjo सीरिया पर आधारित उपन्यास Nothing But Soot के लेखक भी हैं। उन्होंने George Mason University से सरकार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में BA किया है।

The new flag of Syria flies over the Old City of Damascus.
दमिश्क़ के पुराने शहर पर लहराता सीरिया का नया झंडा। · Shutterstock

17 सितंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में दिए गए भाषण में संयुक्त राष्ट्र में इसराइल के राजदूत डैनी डैनन (Danny Danon) ने उस हक़ीक़त की ओर ध्यान दिलाया, जिस पर बात करने की हिम्मत बहुत कम राजनयिक और विश्व नेता करते हैं: सीरिया में तुर्की की सैन्य मौजूदगी। उनकी यह टिप्पणी दक्षिणी सीरिया के कुछ हिस्सों में इसराइल की अपनी सैन्य मौजूदगी को उचित ठहराने के संदर्भ में आई। डैनन ने कहा कि तुर्की ने उत्तरी सीरिया में ज़मीन के कहीं बड़े हिस्से पर क़ब्ज़ा कर रखा है, जितना इसराइल ने दक्षिण में किया है। वह सही हैं। फिर भी इस हक़ीक़त पर बहुत कम ध्यान दिया गया है।

तुर्की के कुछ पैरोकार यह दलील दे सकते हैं कि सीरिया में तुर्की की मौजूदगी इसराइल से अलग है, क्योंकि तुर्की और सीरिया अब सहयोगी हैं और तुर्की की सैन्य मौजूदगी दमिश्क के निमंत्रण पर है—लेकिन हक़ीक़त ऐसा नहीं है।

तुर्की की सेना इदलिब, अलेप्पो और हसाका प्रांतों में व्यापक मौजूदगी बनाए हुए है, जो 2016, 2018 और 2019 के बड़े सैन्य अभियानों के बाद से है—यानी दमिश्क में मौजूदा तुर्की-समर्थक शासन के सत्ता में आने से बहुत पहले। इनमें से बाद के दो अभियानों का मक़सद खुले तौर पर कुर्द बलों को अफ़रीन और रास अल-ऐन (Serê Kaniyê) जैसे इलाक़ों से बाहर खदेड़ना था, जबकि 2016 में शुरू किया गया पहला अभियान दिखावे के तौर पर इस्लामिक स्टेट (ISIS) से लड़ने के लिए था। मगर हक़ीक़त में तुर्की का हस्तक्षेप इसीलिए था कि कुर्द बल उत्तरी अलेप्पो में इस्लामिक स्टेट के क़ब्ज़े वाले इलाक़े—ख़ासकर अल-बाब और जरब्लस जैसे क़स्बों—पर क़ब्ज़ा न कर सकें।

तुर्की के पास उससे पहले भी इस्लामिक स्टेट का सामना करने के मौक़े थे—यहां तक कि तब भी, जब अमेरिका ने इस आतंकी संगठन से लड़ने के लिए कुर्द बलों के साथ साझेदारी शुरू नहीं की थी। इसके बजाय अंकारा ने अपनी सीमा को इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों, रसद और अवैध व्यापार के लिए रास्ते के तौर पर इस्तेमाल होने दिया। उस दौर में इस्लामिक स्टेट के नियंत्रण वाले इलाक़े से तुर्की में तेल और अन्य सामान की तस्करी का सक्रिय प्रवाह देखा गया।

सीरिया के नए इस्लामवादी नेतृत्व को तुर्की के साथ अपने रिश्ते से फ़ायदा मिलता है, लेकिन अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-शरा (Ahmed al-Sharaa) इस बात से सतर्क हैं कि उन्हें तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन के अधीनस्थ के रूप में न देखा जाए। दिसंबर 2024 में सत्ता पर क़ब्ज़ा करने के बाद से उन्होंने ख़ुद को एक स्वतंत्र सीरियाई नेता के रूप में पेश करने की कोशिश की है। लेकिन उत्तरी सीरिया के हिस्सों में तुर्की की प्रमुख मौजूदगी इस कोशिश को जटिल बना देती है। सीरियाई सरकार सीरियाई ज़मीन पर तुर्की के क़ब्ज़े को चुनौती देने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि उसका राजनीतिक अस्तित्व, आर्थिक पुनर्बहाली और सुरक्षा ढांचा अब भी अंकारा से इतनी नज़दीकी से जुड़ा हुआ है।

हक़ीक़त यह है कि तुर्की सीरिया को अपने रणनीतिक पिछवाड़े के तौर पर देखता है। एर्दोआन ने दूसरी जगहों पर जो किया है—राजनयिक मान्यता और मदद को ऐसी व्यवस्थाओं से जोड़ना, जो तुर्की की मौजूदगी सुनिश्चित करें—वह सीरिया में और भी आसानी से लागू किया जा सकता है। लीबिया इसका एक उपयोगी उदाहरण है। 2019 में तुर्की और लीबिया की राष्ट्रीय सहमति सरकार (Government of National Accord) ने दो अलग-अलग समझौता-ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए: एक पूर्वी भूमध्यसागर में समुद्री अधिकार-क्षेत्र तय करता था और दूसरा सुरक्षा व सैन्य सहयोग का प्रावधान करता था। इन समझौतों ने न सिर्फ़ लीबिया में तुर्की की रणनीतिक और सैन्य भागीदारी को गहरा किया, बल्कि त्रिपोली के अस्तित्व को इस बात से भी जोड़ दिया कि वह तुर्की के रणनीतिक हितों के मुताबिक़ खुद को ढालने को कितना तैयार है।

एर्दोआन के लिए सीरिया सिर्फ़ तुर्की के तात्कालिक सीमा-हितों को सुरक्षित करने भर का सवाल नहीं है। अंकारा ने पिछले एक दशक में सीरिया और इराक़ से लेकर लीबिया और काकेशस तक, अपनी सीमाओं के पार सैन्य ताक़त दिखाने की तत्परता दिखाई है।

सीरिया अब इससे भी ज़्यादा अहम अवसर पेश कर रहा है। एक दशक से ज़्यादा चले युद्ध के बाद देश के संस्थान, सेना और अर्थव्यवस्था तबाह हो चुके हैं, और उसका नया नेतृत्व राज्य को दोबारा खड़ा करने के लिए बाहरी साझेदारों पर निर्भर है। तुर्की सीरियाई युद्ध के दौरान जमा किए गए अपने प्रभाव को दीर्घकालिक क्षेत्रीय मौजूदगी में बदल सकता है। यह उस व्यापक पैटर्न का हिस्सा है, जिसमें अंकारा ने पड़ोसी देशों के पतन या विखंडन का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक और सैन्य पहुँच बढ़ाने के लिए किया है। सीरिया के युद्धोत्तर चरण में पहुंचने के साथ, तुर्की सिर्फ़ उसके भविष्य में अपनी आवाज़ रखने पर नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने पर भी आमादा दिखता है कि सीरिया के पुनर्निर्माण में उसके अपने सुरक्षा और भू-राजनीतिक हित रचे-बसे हों।

सीरियाई ज़मीन छोड़ने के लिए विदेशी सैन्य बलों से कहना तभी जायज़ होगा, जब इसे हर जगह एक-सा लागू किया जाए। ध्यान सिर्फ़ इसराइल पर केंद्रित नहीं होना चाहिए और उत्तरी सीरिया में तुर्की की कहीं बड़ी तथा कहीं पुरानी सैन्य मौजूदगी को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए। एक विश्वसनीय रुख़ को दोहरे मानदंड से बचना होगा: अगर विदेशी सैन्य मौजूदगी को सीरियाई संप्रभुता का उल्लंघन माना जाता है, तो यही मानदंड सीरियाई ज़मीन पर सक्रिय सभी बाहरी ताक़तों पर समान रूप से लागू होना चाहिए।

मूल अंग्रेज़ी लेख पढ़ें: Why Is Nobody Talking About the Turkish Occupation of Syria?

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