भारत-इसराइल गठजोड़ में जापान को भी शामिल किया जाए
जापान पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र का आधार है और ईरान तथा उसके बड़े शक्ति-समर्थकों को रोकने व उनका मुक़ाबला करने में मदद कर सकता है।
अभिनव पांड्या उसानास फ़ाउंडेशन (Usanas Foundation) के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं, जो भारत की विदेश नीति और सुरक्षा पर काम करने वाली संस्था है।

जैसे-जैसे ईरान युद्ध और दूसरे संघर्षों के बीच कड़ियाँ ज़्यादा स्पष्ट हो रही हैं, वैसे-वैसे अन्य विरोधियों के संतुलन के लिए गठबंधन बनाने की ज़रूरत भी उभर रही है। ईरान युद्ध अब कहीं अधिक जटिल हो गया है, ख़ासकर चीन और रूस की पर्दे के पीछे बढ़ती संलिप्तता के साथ। तेहरान को चीनी और रूसी ख़ुफ़िया मदद, साज़ो-सामान, रसद, कूटनीतिक, उपकरण और आर्थिक समर्थन इस बात में बहुत कम संदेह छोड़ता है कि ईरान चीन और रूस का प्रॉक्सी है।
कई विश्लेषक 7 अक्तूबर, 2023 को इसराइल पर हुए हमास के हमले को रूस-यूक्रेन युद्ध की पृष्ठभूमि में देखते हैं। यह संभावना कि रूस कई पक्षों को समेटे एक क्षेत्रीय संघर्ष छेड़कर अमेरिकी सैन्य, तकनीकी और वित्तीय संसाधनों को यूक्रेन से हटा सकता था, रणनीतिकारों और ख़ुफ़िया एजेंसियों के बीच अब भी बहस का विषय है। आज, जब नए सिरे से अमेरिकी युद्ध की आशंका मँडरा रही है, चीन और रूस अमेरिका को मध्य पूर्व में उलझाकर और उसकी क्षमताओं को क्षीण करके उसके पतन की रफ़्तार बढ़ाना चाहते हैं।
क्षेत्रीय स्तर पर भी मध्य पूर्व की सुरक्षा संरचना का कायापलट हो रहा है। मक्का समझौता (Mecca Pact) अमेरिकी रणनीतिक मौजूदगी के क्षरण में एक मील का पत्थर है। बीजिंग और मॉस्को के लिए इस क्षेत्र में सुरक्षा प्रदाता के रूप में वॉशिंगटन की विश्वसनीयता का घटना न सिर्फ़ छठी सदी ईसा पूर्व के सेनापति सुन त्ज़ु की रणनीति-कला का प्रकटीकरण है, बल्कि अमेरिकी पतन के लिए उनके रोडमैप का नपा-तुला नतीजा भी है।
भारत-इसराइल-जापान गठबंधन ईरान और उसके बड़े शक्ति-समर्थकों को सीमित करने और उनका मुक़ाबला करने में मदद कर सकता है। जापान पश्चिमी प्रशांत और पहली द्वीप शृंखला (first island chain) का आधार है। टोक्यो दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर में चीनी महत्वाकांक्षाओं पर अंकुश लगा सकता है और इस प्रक्रिया में चीन को अपने सुरक्षा हितों की रक्षा के लिए इसी क्षेत्र में संसाधन और प्रयास केंद्रित करने को मजबूर कर सकता है। इसी तरह, रूस के साथ जापान के ऐतिहासिक क्षेत्रीय विवाद टोक्यो के लिए इस क्षेत्र में मॉस्को से उलझने के वाजिब कारण हैं। भारत की केंद्रीय स्थिति उसे हिंद महासागर में बढ़त देती है, जिसका इस्तेमाल वह मलक्का जलडमरूमध्य के चोकपॉइंट को नियंत्रित करने में कर सकता है। मध्य पूर्व में इसराइल लाल सागर, स्वेज़ नहर और भूमध्य सागर से गुज़रने वाली वैश्विक समुद्री कनेक्टिविटी की रक्षा कर सकता है और होर्मुज़ व बाब अल-मंदेब के चोकपॉइंट सुरक्षित रख सकता है।
चीन और रूस को उनके अपने भूगोल में उलझाने से यूरोपीय और मध्य पूर्वी रंगमंचों में उपद्रव खड़ा करने की उनकी इच्छा और संसाधन, दोनों के घटने की संभावना है। मध्य पूर्व और हिंद-प्रशांत तक फैले इस सहयोग के मुख्य स्तंभ हैं—कूटनीतिक समन्वय, रक्षा और आंतरिक सुरक्षा, दुष्प्रचार का मुक़ाबला, साइबर और अहम बुनियादी ढाँचा, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष, आपूर्ति शृंखलाएँ और रणनीतिक कनेक्टिविटी कॉरिडोर।
ऐसा गठबंधन मक्का समझौते का तोड़ हो सकता है। इसराइल अपनी हाई-टेक रक्षा, कृषि विशेषज्ञता, सीमा प्रबंधन, साइबर, रोबोटिक्स और ख़ुफ़िया क्षमताओं के साथ जापान की वित्तीय, व्यापारिक और तकनीकी ताक़त के साथ जोड़ी बना सकता है; भारत बड़ी जनशक्ति, कुशल पेशेवर और विनिर्माण क्षमता लेकर आता है। लोकतंत्र और मध्यम शक्ति के रूप में साझा पहचान, तथा चीन को लेकर मिलती-जुलती (हालाँकि एक जैसी नहीं) चिंताओं के कारण यह त्रिपक्षीय गठबंधन कहीं अधिक तालमेल और समन्वय वाला हो सकता है।
इनमें से हर देश की अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ रणनीतिक साझेदारी है, जो वैश्विक मुद्दों पर कूटनीतिक समन्वय को आसान बना सकती है। तीनों हितधारकों के बीच मज़बूत रिश्ते रणनीतिक अभिसरण के लिए ढाँचागत प्रोत्साहन भी पैदा करते हैं।
बहुत लंबे समय से वॉशिंगटन अपने विरोधियों को अलग-अलग ख़ानों में बाँटकर देखता रहा है, यह पहचानने के बजाय कि वे आपस में मिलकर काम करते हैं। इससे दुनिया भर में अमेरिकी प्रभाव घटता है, लेकिन अमेरिकी साझेदार भी ख़तरे में पड़ते हैं। हालांकि अगर मध्य पूर्व और एशिया में अमेरिका के शीर्ष लोकतांत्रिक साझेदार एकजुट हो जाएँ, तो उसके फ़ायदे उनके बीच की किसी भी द्विपक्षीय साझेदारी से कहीं बढ़कर होंगे।
मिडिल ईस्ट फ़ोरम के विश्लेषण ईमेल पर पाएँ: न्यूज़लेटर की सदस्यता लें (अंग्रेज़ी में)