अफ़ग़ान निवेश विवाद ने खोली ईरान की आर्थिक बदहाली
ईरान इस हाल तक कैसे पहुँचा कि तालिबान शासित अफ़ग़ानिस्तान से निवेश की संभावना भी उपलब्धि मानी जाने लगी?
पॉटकिन अज़ारमेहर मूल रूप से ईरान से ताल्लुक़ रखने वाले ब्रिटिश खोजी पत्रकार और वृत्तचित्र निर्माता हैं। उन्होंने विभिन्न मीडिया संस्थानों और नीति अनुसंधान संस्थाओं के लिए योगदान दिया है, जहां उन्होंने मध्य-पूर्व के मामलों और पश्चिम में इस्लामी चरमपंथ का गहन विश्लेषण पेश किया है।

अफ़ग़ानिस्तान को ईरानी ज़मीन आवंटित करने के समझौते की घोषणा पर उठी सार्वजनिक प्रतिक्रिया ने ईरानी अधिकारियों को सफ़ाई देने पर मजबूर कर दिया। इससे न सिर्फ़ जनाक्रोश की तीव्रता उजागर हुई, बल्कि 47 साल के धर्मतांत्रिक शासन के बाद ईरान की आर्थिक गिरावट का दायरा भी सामने आ गया।
8 अक्टूबर 2026 को देश के उत्तर-पूर्व में अफ़ग़ानिस्तान से लगे एक निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले सांसद मोहसिन ज़ंगनेह (Mohsen Zanganeh) ने ईरान के सरकारी प्रसारक इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान ब्रॉडकास्टिंग के हिस्से सहर टीवी पर घोषणा की कि “…हम एक समझौते पर पहुँचे हैं जिसके तहत अफ़ग़ानिस्तान को चाबहार बंदरगाह के मुक्त क्षेत्र के भीतर अपना एक इलाक़ा मिल सकता है।”
अफ़ग़ानिस्तान की हालिया यात्रा के दौरान अपनी उपलब्धियों पर चर्चा करते हुए दिए गए इस बयान पर ईरानियों की नाराज़गी सामने आई।
ईरान में भू-भाग के नुकसान जैसा कम ही कोई मुद्दा इतना गहरा भावनात्मक असर पैदा करता है। ईरानी आज भी 19वीं सदी के आरंभ में क़ाजार राजवंश के शासनकाल में ज़ारशाही रूस को सौंपे गए इलाक़ों का शोक मनाते हैं। यह सुझाव कि ईरान एक और भू-भाग सौंप देगा, वह भी अफ़ग़ानिस्तान को—तालिबान के मध्ययुगीन नज़रिए के साथ—आक्रोश भड़काने के साथ-साथ अपमान का एहसास भी ले आया। ईरानी सोशल मीडिया पर “अफ़ग़ानिस्तान को ईरानी ज़मीन सौंपे जाने” की सुर्ख़ियाँ छा गईं।
प्रतिक्रिया इतनी तीखी थी कि वरिष्ठ अधिकारियों को हस्तक्षेप करना पड़ा। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाग़ाई (Esmail Baghaei) ने एक संवाददाता सम्मेलन में इन ख़बरों को “ग़लतफ़हमी” बताते हुए ख़ारिज कर दिया। उन्होंने कहा, “दरअसल यह संसद के एक सम्मानित सदस्य की टिप्पणियों से उपजी स्पष्ट ग़लतफ़हमी थी।”
इसके बाद उन्होंने स्पष्टीकरण दिया। बाग़ाई के मुताबिक़ ईरानियों और तालिबान के बीच जो चर्चा हुई, वह संप्रभुता के हस्तांतरण की नहीं, बल्कि पट्टे की उस तरह की व्यवस्था की थी, जिसका इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भूमि-बद्ध देशों को बंदरगाहों और खुले पानी तक पहुँच देने के लिए किया जाता है। उनका तर्क था कि ऐसी व्यवस्थाएँ व्यापार को आसान बना सकती हैं और अच्छे संबंधों को मज़बूत कर सकती हैं।
इस खंडन के बाद उन्होंने एक शर्त भी जोड़ी। बाग़ाई ने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान से संबंधित कोई औपचारिक प्रस्ताव पेश नहीं किया गया है। यह विषय महज़ अफ़ग़ानिस्तान की मंत्रिस्तरीय यात्रा के दौरान एक आधिकारिक बैठक के इतर उठाया गया था और ईरान ने उस पर विचार करने पर सहमति जताई थी।
ज़ंगनेह ने भी अपनी टिप्पणियों पर सफ़ाई दी। उन्होंने कहा कि उनका आशय यह था कि ईरान अफ़ग़ान निवेश के लिए चाबहार बंदरगाह के तट पर क़रीब 10 हेक्टेयर और बंदरगाह के मुक्त क्षेत्र में लगभग 100 हेक्टेयर ज़मीन आवंटित करेगा। अफ़ग़ानिस्तान वहाँ बुनियादी ढाँचा विकसित कर सकता है, जैसे कि अंतरराष्ट्रीय जल तक अफ़ग़ानिस्तान की पहुँच बेहतर करने के लिए एक ‘इनलैंड ड्राइ पोर्ट’। ज़ंगनेह ने समझाया, “इस समझ का अर्थ यह है कि अफ़ग़ानिस्तान इस इलाक़े में निवेश करेगा,” और ज़ोर देकर कहा कि ईरान न भू-भाग सौंपेगा और न संप्रभुता।
अधिकारियों द्वारा सांसद की टिप्पणियों को दुरुस्त करने की कोशिशों के बावजूद इस प्रकरण ने उस देश के ज़ख़्मों पर नमक छिड़क दिया है, जो 1979 की उस क्रांति पर आज भी पछता रहा है, जिसने मौलवियों को सत्ता में पहुँचाया। विशाल प्राकृतिक संसाधनों, रणनीतिक भौगोलिक स्थिति, क्षेत्रीय वाणिज्य के लंबे इतिहास और प्रतिभाशाली, शिक्षित व पश्चिम-समर्थक आबादी से संपन्न देश इस हाल तक कैसे पहुँच गया कि तालिबान शासित अफ़ग़ानिस्तान से निवेश की संभावना भी एक उपलब्धि मानी जाने लगे?
दशकों से इस्लामी गणराज्य की नीतियों ने उन विदेशी निवेशकों को दूर रखा है, जिनसे ईरान उन्नत तकनीक, विशेषज्ञता और पर्याप्त पूँजी हासिल कर सकता था। राजनीतिक अलगाव, प्रतिबंध, पश्चिम के प्रति वैचारिक शत्रुता और शक्तिशाली निहित स्वार्थों के वर्चस्व वाली आर्थिक व्यवस्था ने अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों और आधुनिक निवेश तक ईरान की पहुँच सीमित कर दी। वैश्विक अर्थव्यवस्था में एकीकृत होने के बजाय देश ने अलगाव झेला।
विडंबना यह है कि ईरान के पास वे तमाम लाभ हैं, जिनका इस्तेमाल कर दूसरे देशों ने अपनी अर्थव्यवस्थाओं को बदल दिया। इसकी भौगोलिक स्थिति इसे मध्य एशिया, काकेशस, भारतीय उपमहाद्वीप और मध्य पूर्व को जोड़ने वाला प्रमुख पारगमन केंद्र बना सकती थी। इसके ऊर्जा संसाधन, औद्योगिक आधार और प्रशिक्षित कार्यबल समृद्धि ला सकते थे। फिर भी शासन ने दशकों के कुप्रबंधन, वैचारिक टकराव और संस्थागत क्षय के ज़रिए इन लाभों को गँवा दिया।
1979 में ईरान के बराबर खड़े, या उससे कम अनुकूल स्थिति से शुरुआत करने वाले देशों के साथ तुलना बेहद तीखी है। दक्षिण कोरिया एक बड़ी तकनीकी और औद्योगिक शक्ति बन चुका है। फ़ारस की खाड़ी के अरब देश—जिन्हें ईरानी कभी अपने से कमतर समझते थे—अंतरराष्ट्रीय निवेश, व्यापार और सेवाओं के केंद्रों में विकसित हो गए हैं। उनकी आबादी का जीवन स्तर अब ईरानियों से ऊपर है। वहीं ईरान के लोगों को उस व्यवस्था ने पीछे रोके रखा, जो आर्थिक विकास से ऊपर वैचारिक प्राथमिकताओं को और योग्यता से ऊपर शासन के प्रति वफ़ादारी को रखती है।
ईरान की आर्थिक संभावना ख़त्म नहीं हुई है, लेकिन इस्लामी गणराज्य की वैचारिक संस्थाओं और नीतियों ने उसका रास्ता रोक दिया है, क्योंकि शासन एक काकिस्टोक्रेसी (kakistocracy) में बदल चुका है: सबसे कम योग्य और सबसे कम उपयुक्त लोगों का शासन।
मिडिल ईस्ट फ़ोरम के विश्लेषण ईमेल पर पाएँ: न्यूज़लेटर की सदस्यता लें (अंग्रेज़ी में)