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पूर्वी लीबिया का तुर्की-झुकाव ग़लत, पर टाला जा सकता था: अमेरिकी निष्क्रियता की क़ीमत

बेनग़ाज़ी की अनदेखी कर अमेरिकी विदेश मंत्रालय और यूरोप के कई देशों ने तुर्की के लिए लाभ उठाने का रास्ता खोल दिया।

माइकल रुबिन ईरान, तुर्की और हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका के विशेषज्ञ हैं। उनके करियर में पेंटागन में अधिकारी के तौर पर काम करने का अनुभव शामिल है। इसमें ईरान, यमन और इराक़ में ज़मीनी स्तर के अनुभव के साथ-साथ 9/11 से पहले तालिबान के साथ संपर्क भी रहा है। श्री रुबिन ने सैन्य शिक्षा में भी योगदान दिया है और अमेरिकी नौसेना तथा मरीन इकाइयों को क्षेत्रीय संघर्षों और आतंकवाद के बारे में पढ़ाया है। उनके विद्वतापूर्ण काम में कई अहम प्रकाशन शामिल हैं, जैसे “Dancing with the Devil” और “Eternal Iran।” रुबिन ने येल यूनिवर्सिटी से इतिहास में पीएच.डी. और एम.ए., तथा जीव विज्ञान में बी.एस. की डिग्री हासिल की।

Libyan flags fly over Tripoli, the country's capital city.
त्रिपोली के ऊपर लहराते लीबियाई झंडे। · Shutterstock

27 नवंबर 2019 को तुर्की और त्रिपोली स्थित, लीबिया की चुनिंदा तौर पर खड़ी की गई गवर्नमेंट ऑफ़ नेशनल अकॉर्ड ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसमें तुर्की और लीबिया के बीच समुद्री सीमाओं का निर्धारण किया गया, जबकि ये दोनों देश अपने सबसे नज़दीकी बिंदु पर भी 352 मील दूर हैं। हालांकि, यह रेखा खींचने के लिए रोड्स और कारपाथोस के जलक्षेत्र का उल्लंघन करना और क्रीट के पूर्वी सिरे को दो हिस्सों में बाँटना पड़ता है। यह मिस्र और इटली के बीच किसी काल्पनिक समुद्री सीमा समझौते के समकक्ष था, जो लीबियाई और माल्टीज़ जलक्षेत्र को चीरता हुआ गुज़रता।

यह समझौता एक ओर तुर्की के नए साम्राज्यवाद और दूसरी ओर लीबिया की वास्तविक संप्रभुता के अभाव, दोनों को दर्शाता था। तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन की नज़र में फ़ायज़ अल-सर्राज की त्रिपोली स्थित सरकार का अस्तित्व सिर्फ़ इसलिए था कि वह तुर्की की संसाधन-हड़प पर मुहर लगा दे।

जब त्रिपोली स्थित विदेश मंत्री मोहम्मद ताहिर सियाला ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए, तो दुनिया के बड़े हिस्से ने इसकी निंदा की। यह त्रिपोली स्थित सरकार की अनाड़ीपन का परिचायक था। भूमध्य सागर के अपने नए नक़्शे के साथ तुर्की ने जो मिसाल क़ायम की, वह समुद्री क़ानून के लिए उतनी ही नुक़सानदेह थी, जितने होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर ईरान के दावे और चीन की नाइन-डैश लाइन।

लीबियाई नेता मुअम्मर क़द्दाफ़ी के 2011 में पतन के बाद लीबिया में सत्ता दो हिस्सों में बँट गई। क़द्दाफ़ी-काल के पूर्व फ़ील्ड मार्शल ख़लीफ़ा हफ़्तर, जो लीबियन अरब आर्म्ड फ़ोर्सेज़ के प्रमुख हैं, पूर्वी लीबिया पर हावी रहे हैं। जब इस्लामवादी मिलिशिया—जिनमें से कई को तुर्की, क़तर और अन्य कट्टरपंथी देशों का समर्थन हासिल था—ने अमेरिकी राजदूत क्रिस स्टीवंस की हत्या की, तो हफ़्तर की सेनाओं ने ऑपरेशन डिग्निटी शुरू किया और मिलिशिया को बेनग़ाज़ी से बाहर खदेड़ दिया। आज लीबियन अरब आर्म्ड फ़ोर्सेज़ का देश के 80 प्रतिशत हिस्से पर नियंत्रण है; त्रिपोली में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार, जिसका नेतृत्व बिना चुने गए अब्दुल हमीद दबीबा कर रहे हैं, देश के बाक़ी हिस्से पर ढीला-ढाला नियंत्रण रखती है और बची हुई मिलिशिया को पनाह देती है।

शुरुआत में प्रतिनिधि सभा—यानी वह विधायी निकाय जो लीबियन अरब आर्म्ड फ़ोर्सेज़ के नियंत्रण वाले इलाक़ों की देखरेख करता है—ने लीबिया-तुर्की समझौते को ख़ारिज कर दिया था। यह 20 अक्तूबर 2026 को बदल गया, जब लगातार तुर्की की लॉबिंग के बाद प्रतिनिधि सभा ने अचानक इस समझौते की पुष्टि कर दी।

इस पुष्टि से समुद्री समझौता ज़रा भी अधिक वैध नहीं हो जाता और फ़ील्ड मार्शल तथा उनके बेटे सद्दाम के लिए यह संभवतः एक भूल है: बेनग़ाज़ी स्थित सरकार विकास, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा में त्रिपोली से कहीं अधिक सफल रही है। त्रिपोली द्वारा अंतरराष्ट्रीय क़ानून की अवहेलना और बेनग़ाज़ी द्वारा उसकी पुष्टि—इस तुलना से बेनग़ाज़ी के पक्ष को बड़ा बल मिलता था। धीरे-धीरे यूरोपीय देश इसे पहचान भी रहे थे: इटली और ग्रीस—दोनों ने बेनग़ाज़ी में वाणिज्य दूतावास खोले, और दबीबा के हस्तक्षेप के न होने पर दूसरे देश भी ऐसा करते। अब, जब यूरोपीय संघ एकजुट होकर प्रतिनिधि सभा के इस क़दम की निंदा कर रहा है, तो बेनग़ाज़ी ख़ुद को भाग्यशाली समझे अगर यूरोपीय विदेश मंत्रालय अपने राजनयिकों को वापस न बुलाएँ। हफ़्तर प्रशासन के एक प्रमुख साझेदार मिस्र ने भी इस क़दम की निंदा की।

फिर भी, वॉशिंगटन और पश्चिम को अपनी ग़लतियों पर भी विचार करना चाहिए। तुर्की ने तब लॉबिंग की, जब दूसरे देशों ने बेनग़ाज़ी से जुड़ने से इनकार कर दिया था। किसी भी वस्तुनिष्ठ कसौटी पर, लीबिया पर बेनग़ाज़ी स्थित सरकार का शासन होना चाहिए। उसने शासन का दायित्व निभाया है और ज़बरदस्त विकास किया है, जबकि त्रिपोली की पहचान गबन और ठहराव है। दबीबा एक ऐसे ग्रैंड मुफ़्ती को शरण देते हैं, जिनके विचार अल क़ायदा और इस्लामिक स्टेट (ISIS) के विचारों से मेल खाते हैं। अहम बात यह है कि हफ़्तर परिवार राष्ट्रवादी है। वे अलगाववाद को बढ़ावा नहीं देते। लीबिया के मूल संविधान में त्रिपोली और बेनग़ाज़ी को सह-राजधानियाँ कहा गया था, ठीक वैसी ही व्यवस्था जैसी दक्षिण अफ़्रीका में है।

त्रिपोली को शुरू में अपनाना मनमाना फ़ैसला था। विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन और उनके सहयोगी—भावी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन—ने क़द्दाफ़ी के बाद की लीबियाई व्यवस्था में इस्लामवादियों को तरजीह दी, तब भी जब लीबियाइयों ने उन्हें चुनावों में ख़ारिज कर दिया था। उनका तर्क—और यही यूरोपीय देशों और संयुक्त राष्ट्र का भी तर्क था—यह था कि इस्लामवादियों को हाशिए पर धकेलने से हिंसा और बढ़ेगी; तुष्टीकरण आधिकारिक नीति बन गया।

आज कई राजनयिक इस नीति की उत्पत्ति ही भूल चुके हैं। अमेरिकी विदेश मंत्रालय खास तौर पर आँख मूँदकर काम करता है; वह त्रिपोली में एक ढंग का दूतावास तक चलाने से इनकार करता है और इसके बजाय उसे पड़ोसी ट्यूनीशिया में रखता है। बेनग़ाज़ी में कड़वाहट अब भी बनी हुई है, क्योंकि वाणिज्य दूतावास पर हमले के बाद अमेरिकी विदेश मंत्रालय वहाँ से चला गया और उस स्थानीय परिवार को, जिसने संपत्ति पट्टे पर दी थी, बक़ाया किराया तक नहीं चुकाया, जबकि उस आतंकवादी हमले से उनका कोई लेना-देना नहीं था।

बेनग़ाज़ी की अनदेखी कर अमेरिकी विदेश मंत्रालय और यूरोप के कई देशों ने तुर्की के लिए लाभ उठाने का रास्ता खोल दिया। तुर्की भले ही एक दुर्भावनापूर्ण किरदार हो, लेकिन उसका नेता न तो निष्क्रिय है और न ही आलसी। लगातार की गई लॉबिंग प्रतिरोध को घिस-घिसकर कमज़ोर कर देती है।

अमेरिका और यूरोप भले ही हफ़्तर परिवार से नाराज़ हों, हक़ीक़त यह है कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया है, जो त्रिपोली के अधिकारियों ने—जिन्हें अमेरिकी और यूरोपीय अपनाते हैं—न किया हो। अमेरिकी विदेश मंत्रालय और यूरोपीय विदेश मंत्रालयों को यह बताना चाहिए कि उन्होंने इतने लंबे समय तक उन शक्तियों की उपेक्षा क्यों की, जिन्होंने अपनी नीतियों को लंबे अरसे से यूरोपीय व्याख्याओं और हितों के अनुरूप ढाला था।

बोली लगाने की होड़ भले ही अशोभनीय हो, लेकिन गुंजाइश अब भी है। 20 अक्तूबर के मतदान के साथ प्रतिनिधि सभा ने अपने पहले के इनकार को पलट दिया। अगर वह एक बार अपना रुख़ बदल सकती है, तो वह ऐसा दोबारा भी कर सकती है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय यह रुख़ भी अपना सकता है कि प्रतिनिधि सभा के फ़ैसले—जिसके सदस्यों का कार्यकाल बहुत पहले समाप्त हो चुका है—निरर्थक हैं। संगति बनाए रखने के लिए, अमेरिकी विदेश मंत्रालय और यूरोपीय विदेश मंत्रालयों को दबीबा शासन वाले इस कल्पनालोक को भी छोड़ देना चाहिए।

प्रतिनिधि सभा के फ़ैसले का इस्तेमाल, पूर्वी हिस्से को अलग-थलग करने और ऐसी सरकार के पक्ष में करने के बजाय जो तुर्कों की जेब में और भी गहरे बैठी है, अमेरिका, यूरोप और संयुक्त राष्ट्र का साझा रुख़ यह होना चाहिए कि अभी चुनाव कराए जाएँ और सहायता तथा सहयोग को इससे जोड़ा जाए कि नई विधायिका तुर्की के समुद्री समझौते पर पुनर्विचार कर उसे ख़ारिज करे।

मूल अंग्रेज़ी लेख पढ़ें: Eastern Libya’s Pro-Turkish Tilt Is Wrong but Was Avoidable. U.S. Passivity Has a Cost

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