‘न युद्ध, न शांति’ से निकलने की कोशिश में ईरान, घरेलू गतिरोध
एक और जनविद्रोह की आशंका से घिरे ईरानी नीति-निर्धारक अब तक तय नहीं कर पाए हैं कि शासन इस संकट से कैसे बाहर निकले।
Shay Khatiri यॉर्कटाउन इंस्टिट्यूट (Yorktown Institute) में वरिष्ठ फ़ेलो और रेनी सेंटर (Rainey Center) में फ़ेलो हैं।

8 सितंबर 2025 को दिवंगत सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनेई ने कहा था कि “न शांति, न युद्ध” की जो स्थिति “दुश्मन ने हम पर थोपी है”, वह देश के लिए ख़तरनाक है। 28 फ़रवरी 2026 को शुरू हुए संयुक्त अमेरिका-इसराइल अभियान के बाद यह वाक्यांश प्रमुखता से सामने आया।
ख़ामेनेई की यह शब्दावली उस हालात की ओर इशारा करती है, जिसमें ईरान एक तरफ़ आर्थिक और सामाजिक दबाव झेलता है और साथ ही युद्ध के ख़तरे का सामना भी करता है। ईरानी पक्ष इसे भौतिक और मनोवैज्ञानिक, दोनों तरह का दबाव मानता है। ख़ामेनेई द्वारा इस शब्द के इस्तेमाल के बाद पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने इस पर विस्तार से लिखा और आत्मनिर्भरता जैसे समाधान सुझाए। हालिया संघर्ष के बाद निचले स्तर के अधिकारियों और पत्रकारों ने एक बार फिर इस शब्दावली पर चर्चा शुरू कर दी। अब सत्ता के सर्वोच्च स्तर पर भी ऐसा ही हो रहा है।
सर्वोच्च नेता मोजतबा ख़ामेनेई ने इस पद पर अपने कार्यकाल का बड़ा हिस्सा सार्वजनिक रूप से अनुपस्थित रहते हुए बिताया है, संभव है कि उन हमलों में, जिनमें उनके पिता मारे गए, वे अपंग हो गए हों, या इससे भी बुरी हालत में हों, या फिर उन्हें यह डर हो कि अमेरिका या इसराइल को उनका ठिकाना पता चलते ही वे उन्हें निशाना बनाएँगे। हाल के हफ़्तों में उन्होंने शासन की ज़्यादा ज़िम्मेदारियाँ संभाली हैं। प्रेस रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने तीनों शाखाओं के प्रमुखों और सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहसेन रेज़ाई (Mohsen Rezaei) से मुलाक़ात की है।
रिपोर्टों के मुताबिक़, मोजतबा ने 28 अक्टूबर को रेज़ाई से कहा कि सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद को “चार उपायों”—यानी “संस्कृति, राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा”—पर असर डालना चाहिए। उन्होंने दोहराया कि ईरान को होर्मुज़ जलडमरूमध्य का संचालन करना चाहिए और पड़ोसी देशों के साथ द्विपक्षीय संबंध रखने चाहिए। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि अधिकारियों को “न शांति, न युद्ध” की स्थिति ख़त्म करने के लिए काम करना चाहिए।
शासन के संभवतः दो सबसे अहम अधिकारी, ख़ामेनेई और रेज़ाई ने इस दुविधा पर चर्चा राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान के उस बयान के सिर्फ़ 5 दिन बाद की, जिसमें उन्होंने कहा था कि “न शांति, न युद्ध की हालत ने बहुत से लोगों को खाना जुटाने के लिए संघर्ष करने पर मजबूर कर दिया है।” उन्होंने ईरान पर नौसैनिक नाकाबंदी की ओर इशारा किया और जोड़ा, “मेरा मानना है कि हमें इस स्थिति से भी बाहर निकलना चाहिए।”
यह खुली चर्चा बताती है कि इस्लामी गणराज्य ईरान किस हद तक दबाव महसूस कर रहा है। औसत ईरानी सोच रहे हैं कि युद्ध कब फिर शुरू होगा। कारोबारी निवेश रोक रहे हैं। महँगाई में थोड़ी गिरावट के बाद ईरान के केंद्रीय बैंक ने पिछले महीने बताया कि ईरानी महीने शहरिवर [23 अगस्त से 22 सितंबर] में वार्षिक आधार पर यह दर फिर 89.8 प्रतिशत के शिखर पर पहुँच रही थी। जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री स्टीव हैंकी (Steve Hanke) का अनुमान है कि ईरान में महँगाई 158 प्रतिशत के क़रीब है। 3 सितंबर की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, युद्ध में हुई तबाही के कारण 290,000 श्रमिकों ने बेरोज़गारी भत्ते के लिए पंजीकरण कराया। असैनिक सरकारी कर्मचारी भी गुज़ारा चलाने के लिए जूझ रहे हैं। सबसे अहम सवाल सुरक्षाकर्मियों की वित्तीय स्थिति को लेकर है।
ईरानी नीति-निर्धारक अब भी इस बात को लेकर असमंजस में हैं कि शासन इस समस्या से कैसे बाहर निकले। नियुक्ति के बाद रेज़ाई ने राष्ट्रीय एकता पर ज़ोर दिया और एक और जनविद्रोह की आशंका का हवाला दिया। पेज़ेश्कियान, जो एक सक्षम राजनेता साबित हुए हैं, समझौता ज्ञापन (Memorandum of Understanding) का बचाव करते रहे हैं। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से किसी कूटनीतिक समझौते की अपील नहीं की है, लेकिन उनके सुधारवादी प्रतिनिधि अमेरिका के साथ एक बड़े समझौते की ज़ोरदार वकालत कर रहे हैं; कुछ तो इससे भी आगे बढ़ते हुए शासन की दिशा पर जनमत संग्रह का सुझाव दे रहे हैं। संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाक़र ग़ालीबाफ़ ने 12 सितंबर को कहा, “हम लड़ेंगे भी और बातचीत भी करेंगे,” जो भी ज़रूरी हो—यह बयान जितना नीति को दर्शाता है, उतना ही राजनीतिक गठजोड़ के प्रबंधन को भी। इस बीच, 25 अक्टूबर को विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने, जो सुरक्षा प्रतिष्ठान की ओर से बोलते हैं, युद्ध की आशंकाओं को ख़ारिज करते हुए कहा कि ईरान किसी भी सूरत में अपनी नीतियाँ नहीं बदलेगा।
अली ख़ामेनेई के दौर में हितधारक आगे बढ़ने के अलग-अलग रास्तों पर बहस करते थे और अगर उनके अधीनस्थ किसी सहमति पर नहीं पहुँचते थे तो सर्वोच्च नेता निर्णायक की भूमिका निभाते थे। उनका बेटा इस परंपरा को आगे बढ़ाएगा या नहीं, यह देखना बाक़ी है, लेकिन सभी इस बात पर सहमत दिखते हैं कि मौजूदा स्थिति टिकाऊ नहीं है।
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