क्या इराक़ के अली अल-ज़ैदी आदिल अब्दुल-महदी की ग़लतियाँ दोहरा रहे हैं
ईरान को घुसपैठ का रास्ता देकर और जनता के बजाय इराक़ के भ्रष्ट पूर्व प्रधानमंत्री को तरजीह देकर अल-ज़ैदी इराक़ियों को निराश कर रहे हैं।
माइकल रुबिन ईरान, तुर्की और हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका के विशेषज्ञ हैं। उनके करियर में पेंटागन में अधिकारी के तौर पर काम करने का अनुभव शामिल है। इसमें ईरान, यमन और इराक़ में ज़मीनी स्तर के अनुभव के साथ-साथ 9/11 से पहले तालिबान के साथ संपर्क भी रहा है। श्री रुबिन ने सैन्य शिक्षा में भी योगदान दिया है और अमेरिकी नौसेना तथा मरीन इकाइयों को क्षेत्रीय संघर्षों और आतंकवाद के बारे में पढ़ाया है। उनके विद्वतापूर्ण काम में कई अहम प्रकाशन शामिल हैं, जैसे “Dancing with the Devil” और “Eternal Iran।” रुबिन ने येल यूनिवर्सिटी से इतिहास में पीएच.डी. और एम.ए., तथा जीव विज्ञान में बी.एस. की डिग्री हासिल की।

इराक़ में चुनाव वाक़ई होते हैं। यह शायद इकलौता अरब देश है जहाँ मतदान के लिए जाते वक़्त किसी को भी—चाहे नेता हों या आम नागरिक—यह अंदाज़ा नहीं होता कि नया प्रधानमंत्री कौन होगा। लेकिन सरकार के मुखिया का चयन एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें इराक़ की राजनीतिक पार्टियों और उनके अक्सर ग़ैर-निर्वाचित वरिष्ठ नेताओं के बीच महीनों तक बातचीत चलती है।
समन्वय ढाँचा (Coordination Framework)—शिया राजनीतिक गठजोड़ और सबसे ज़्यादा वोट पाने वाला समूह—ने, ज़्यादा जाने-पहचाने उम्मीदवारों का समर्थन करने वाले धड़ों के बीच गतिरोध के बाद, अली अल-ज़ैदी को अपना “सर्वसम्मत उम्मीदवार” घोषित किया था; उसे हुए अब क़रीब छह महीने हो चुके हैं। राष्ट्रपति निज़ार अमीदी ने उसी शाम, संवैधानिक समयसीमा से ठीक पहले, उन्हें नामित कर दिया।
जब अमेरिकी सेना ने बग़दाद पर “शॉक एंड ऑ” शुरू किया और सद्दाम हुसैन के चौथाई सदी लंबे शासन का अंत किया, तब अल-ज़ैदी महज़ 16 साल के थे। 52 प्रतिशत इराक़ी सद्दाम के पतन के बाद पैदा हुए और कई अन्य, अल-ज़ैदी की तरह, नई व्यवस्था में ही बड़े हुए। अल-ज़ैदी चतुर थे, उन्होंने राजनीतिक संपर्क बनाए, कुशलता से दाँव चले और संरक्षण की राजनीति का खेल खेला। हालिया सुधारों के बावजूद इराक़ दुनिया के सबसे भ्रष्ट देशों में बना हुआ है।
जैसे कुछ सुन्नी अरब कारोबारी सद्दाम के दौर में मालामाल हुए और कई कुर्द कारोबारियों की रोज़ी-रोटी और ठेके कुर्दिस्तान डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता मसूद बरज़ानी के संरक्षण पर टिके रहे, वैसे ही अल-ज़ैदी शिया नवधनाढ्य वर्ग के सबसे सफल लोगों में थे।
वह अल-ओवैस ग्रुप (Al-Oweis Group) के मालिक और प्रमुख थे, जो 15 कंपनियों का समूह है, और राज्य की राशन कार्ड प्रणाली के लिए खाद्य आपूर्ति तथा इराक़ी सेना को खाद्य सेवाएँ देने के कार्यक्रम के ठेकेदार थे। संसद के कई सदस्यों ने इस समूह पर और 2016 में उनके द्वारा स्थापित अल-जुनूब इस्लामिक बैंक पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। वह 2017 में स्थापित नेशनल होल्डिंग कंपनी अल-वतनिया के अध्यक्ष भी थे, जिसकी कृषि, रियल एस्टेट, बैंकिंग, सूचना प्रौद्योगिकी, मीडिया, लॉजिस्टिक्स और सौर ऊर्जा में हिस्सेदारी है; तआवुन हाइपरमार्केट और तेल सेवाओं में भी उनके हित थे। वह अल-शाब यूनिवर्सिटी और इश्तार मेडिकल इंस्टीट्यूट के बोर्डों के अध्यक्ष रहे।
अल-ज़ैदी की नियुक्ति के पीछे यह धारणा थी कि वह इराक़ी राजनीति में एक नया चेहरा और ज़्यादा व्यावहारिक रुख़ ला सकते हैं। व्हाइट हाउस ने दो वजहों से उनका समर्थन किया: पहली, वह नूरी अल-मालिकी नहीं थे—भ्रष्ट और सांप्रदायिक पूर्व प्रधानमंत्री—जिन्होंने बार-बार निजी मुनाफ़े के लिए इराक़ की संप्रभुता ईरान को बेची; और दूसरी, अल-ज़ैदी ने ईरान समर्थित मिलिशिया को निरस्त्र करने को लेकर गंभीर होने का वादा किया था। यह प्रतिबद्धता अल-ज़ैदी ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ व्हाइट हाउस की प्रेस कॉन्फ्रेंस में दोहराई: “किसी भी धड़े की मौजूदगी की कोई ज़रूरत नहीं है। … हम कभी स्वीकार नहीं करेंगे कि कोई भी इकाई राज्य के नियंत्रण से बाहर हथियार रखे।”
यह महज़ ख़याली पुलाव था। हो सकता है कि समन्वय ढाँचे की बैठक में अल-ज़ैदी पूर्व प्रधानमंत्री मोहम्मद शिया अल-सूदानी की पसंद रहे हों, लेकिन अल-ज़ैदी अपने राजनीतिक उभार और अपनी दौलत—दोनों के लिए—मालिकी के ऋणी थे। अपने पूर्ववर्तियों की तरह अल-ज़ैदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति से वही कहा जो वह सुनना चाहते थे, और फिर उसके उलट किया। ईरान के साथ ट्रंप के समझौता ज्ञापन ने भी अल-ज़ैदी पर दबाव घटा दिया और मालिकी तथा हादी अल-आमिरी, क़ैस अल-ख़ज़ाली और क़ुबाद तालाबानी जैसे अन्य ईरान समर्थक प्रॉक्सी नेताओं को यह यक़ीन दिला दिया कि वे अमेरिकी दबाव को झेलकर उससे ज़्यादा देर तक टिक सकते हैं।
अल-ज़ैदी ने न सिर्फ़ बद्र कोर, कताइब हिज़्बुल्लाह और असाइब अहल अल-हक़ पर लगाम लगाने के अपने वादों से मुँह मोड़ा है, बल्कि उनका दफ़्तर लगातार ईरान की नई घुसपैठ में मदद भी करता रहा है।
मसलन, सलाहकार आयोग के अध्यक्ष और इंटरनेट गवर्नेंस फ़ोरम इराक़ में अल-ज़ैदी के प्रतिनिधि यूसुफ़ ख़लफ़ यूसुफ़ ने सुपरसेल, एनकिडु और टेलीकोर को दिए गए ठेके रद्द करने की दिशा में क़दम बढ़ाया है। ये तीनों मिलकर इराक़ का इकलौता ऐसा संचार नेटवर्क बना रहे हैं, जिसमें न तो चीनी कलपुर्ज़े लगे हैं और न ही स्कोपस्काई या अर्थलिंक टेलीकम्युनिकेशंस जैसे ईरानी व्यावसायिक प्रॉक्सियों की दख़लअंदाज़ी है (इसका अमेरिकी कंपनी EarthLink LLC से कोई संबंध नहीं है)।
ख़तरा सिर्फ़ अल-ज़ैदी की नाकामी या जानबूझकर किया गया छल नहीं है, और न ही यह सिर्फ़ बग़दाद में बढ़ता ईरानी प्रभाव है। मालिकी के आगे ख़ुद को गिरवी रख देने की अल-ज़ैदी की तत्परता अब पूरे इराक़ के लिए ख़तरा बन गई है।
2018 की गर्मियों में बसरा में प्रदर्शन भड़क उठे थे, जब दूषित पानी के कारण 100,000 लोग अस्पताल पहुँचे और हज़ारों अन्य बीमार पड़े। जहाँ कई अमेरिकी शियाओं को ईरानी प्रॉक्सी के रूप में चित्रित करते हैं, वहीं कई इराक़ी शिया ईरान से नफ़रत करते हैं। विरोध प्रदर्शनों का अंत ईरानी वाणिज्य दूतावास को जलाए जाने पर हुआ।
अक्टूबर 2018 में, चुनावों के पाँच महीने बाद, आदिल अब्दुल-महदी प्रधानमंत्री बनकर उभरे। अब्दुल-महदी जाना-पहचाना चेहरा थे—वह 76 साल के थे और तेल मंत्री, वित्त मंत्री तथा उपराष्ट्रपति रह चुके थे। चूँकि वह पूरी तरह व्यवस्था के भीतर के आदमी थे, इराक़ियों ने उन्हें ज़्यादा मोहलत नहीं दी।
इराक़ की आबादी शिक्षित है, लेकिन उसके विश्वविद्यालय इतने स्नातक पैदा करते हैं कि राज्य और निजी क्षेत्र उन्हें सार्थक रोज़गार नहीं दे सकते। सितंबर 2019 में बेरोज़गार स्नातकों ने धरने दिए, जिनका सुरक्षा बलों ने वाटर कैनन से जवाब दिया। इसके बाद अब्दुल-महदी ने इस्लामिक स्टेट (ISIS) के ख़िलाफ़ लड़ाई के लोकप्रिय कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल अब्दुल-वहाब अल-सादी को बर्ख़ास्त कर दिया। आक्रोश उबाल पर पहुँच गया और, 1 अक्टूबर को, युवा शियाओं ने बग़दाद तथा दक्षिणी इराक़ भर में “नुरीद वतन” (“हमें एक वतन चाहिए”) के नारे के तहत जुलूस निकाले। इस आंदोलन ने स्थापित शिया धार्मिक पार्टियों को भ्रष्ट और समूची राजनीतिक व्यवस्था को जनता को अधिकारहीन करने वाली बताकर ख़ारिज कर दिया, क्योंकि पार्टी सरदारों की सौदेबाज़ी जनेच्छा पर भारी पड़ रही थी। यह आंदोलन तिश्रीन के नाम से जाना गया, जो इराक़ी और लेवंती अरबी में अक्टूबर का नाम है।
प्रतिक्रिया क्रूर थी। ईरान समर्थक सुरक्षा बलों ने भीड़ पर गोलियाँ चलाईं और अब्दुल-महदी ने इंटरनेट बंद कर दिया। मिलिशिया ने कार्यकर्ताओं का अपहरण किया। ख़बरों के मुताबिक़, ईरान की क़ुद्स फ़ोर्स के प्रमुख क़ासिम सुलेमानी इस दमन के समन्वय में मदद के लिए बग़दाद पहुँचे। प्रदर्शनकारियों ने कर्बला और नजफ़ में ईरानी वाणिज्य दूतावासों पर हमला किया। 28 नवंबर को सुरक्षा बलों ने नासिरिया में कई दर्जन प्रदर्शनकारियों को गोलियों से भून दिया। अगले दिन महान आयतुल्लाह अली अल-सिस्तानी ने अपने जुमे के ख़ुत्बे में संसद से आग्रह किया कि वह सरकार को दिए अपने समर्थन पर पुनर्विचार करे, और अब्दुल-महदी ने इस्तीफ़े की घोषणा कर दी, हालाँकि वह मई 2020 तक पद पर बने रहे, जब नागरिक समाज के पूर्व कार्यकर्ता से ख़ुफ़िया प्रमुख बने मुस्तफ़ा अल-काज़मी ने कार्यभार संभाला।
अल-काज़मी ने कार्यकर्ताओं को निराश किया। उनमें करिश्मा नहीं था, उनका दफ़्तर भ्रष्ट था, और उन्होंने शांति के बदले ईरान को पहुँच दे दी। उनके कार्यकाल में सुधार नाममात्र का हुआ। जनता के बजाय मालिकी को तरजीह देकर अल-ज़ैदी भी इसी तरह इराक़ियों को निराश कर रहे हैं। ख़तरा यह है कि एक बार सुधार का वादा स्वीकार कर चुके इराक़ी प्रदर्शनकारी दोबारा नहीं ठगे जाएँगे। अगर नया तिश्रीन आंदोलन भड़कता है, तो प्रदर्शनकारी पूरी व्यवस्था को निशाना बनाएँगे, जिससे इराक़ के ढह जाने और पड़ोसी देशों के हस्तक्षेप का ख़तरा पैदा हो सकता है।
मूलतः यह एक आग का तूफ़ान होगा। अब सवाल यह है कि क्या ट्रंप हाथ पर हाथ धरे बैठेंगे, जबकि अल-ज़ैदी उनसे झूठ बोलते हैं और आगज़नी करने वालों को पेट्रोल बेचकर मुनाफ़ा कमाते हैं।
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