MEF Menu
Middle East ForumSupport MEF
मिडिल ईस्ट फ़ोरम · Middle East Forum
Observer

साइप्रस पर क़ब्ज़ा रहते कोई तुर्क संयुक्त राष्ट्र या किसी अंतरराष्ट्रीय संगठन का प्रमुख न बने

किसी तुर्क को इस पद के लिए आगे बढ़ाकर एर्दोआन अपनी नीति की पहुँच बढ़ाना और अपना वैचारिक एजेंडा लागू करना चाहते हैं।

माइकल रुबिन ईरान, तुर्की और हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका के विशेषज्ञ हैं। उनके करियर में पेंटागन में अधिकारी के तौर पर काम करने का अनुभव शामिल है। इसमें ईरान, यमन और इराक़ में ज़मीनी स्तर के अनुभव के साथ-साथ 9/11 से पहले तालिबान के साथ संपर्क भी रहा है। श्री रुबिन ने सैन्य शिक्षा में भी योगदान दिया है और अमेरिकी नौसेना तथा मरीन इकाइयों को क्षेत्रीय संघर्षों और आतंकवाद के बारे में पढ़ाया है। उनके विद्वतापूर्ण काम में कई अहम प्रकाशन शामिल हैं, जैसे “Dancing with the Devil” और “Eternal Iran।” रुबिन ने येल यूनिवर्सिटी से इतिहास में पीएच.डी. और एम.ए., तथा जीव विज्ञान में बी.एस. की डिग्री हासिल की।

Outside the United Nations headquarters in New York.
न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर। · Shutterstock

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेस का दूसरा कार्यकाल 31 दिसंबर 2026 को समाप्त होगा, लेकिन उनकी जगह लेने के लिए अब तक कोई साफ़ उम्मीदवार सामने नहीं आया है। शुरुआत में लैटिन अमेरिकी देशों को उम्मीद थी कि यह ज़िम्मेदारी मध्य अमेरिका, दक्षिण अमेरिका या कैरेबियाई क्षेत्र के किसी व्यक्ति को मिलेगी, लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने स्पष्ट कर दिया कि घोषित उम्मीदवारों में से कोई भी सुधार के उनके मानकों पर खरा नहीं उतरता, और अमेरिका ख़ुद को संयुक्त राष्ट्र के दिखावटी प्रतिनिधित्व के पालन से बाँधकर नहीं रखेगा।

जल्द ही कई अन्य उम्मीदवार सामने आए, जिनमें सबसे प्रमुख अमीराती अधिकारी लाना नुसैबा (Lana Nusseibah), हंगरी के पूर्व प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बान और कज़ाख़िस्तान के राष्ट्रपति कासिम-जोमार्त तोकायेव हैं। परदे के पीछे, तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि कमान किसी तुर्क के हाथ आए और वे अपने पुराने वफ़ादार फ़ेरिदुन सिनिरलिओग्लू (Feridun Sinirlioğlu) को आगे बढ़ा रहे हैं, जो पहले अंतरिम विदेश मंत्री रह चुके हैं और इस समय यूरोप में सुरक्षा और सहयोग संगठन (OSCE) के महासचिव हैं। एर्दोआन और उनके सहयोगियों ने चुपचाप दूसरे नेताओं से, ख़ासकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्यों के बीच, समर्थन टटोला है और निजी बातचीत में कहते हैं कि फ़्रांस के अलावा किसी को कोई आपत्ति नहीं है। हालांकि एर्दोआन का मानना है कि रिश्वत या दबाव, किसी भी तरीक़े से, वे इमैनुएल मैक्रों की सहमति हासिल कर सकते हैं।

एर्दोआन किसी तुर्क को महज़ राष्ट्रीय गौरव के लिए आगे नहीं बढ़ा रहे हैं; वे नियमित रूप से अंतरराष्ट्रीय आयोजनों की मेज़बानी हासिल करने या नेतृत्व पदों पर तुर्कों को बैठाने की कोशिश करते हैं, ताकि अपनी नीति की पहुँच बढ़ा सकें और अपना वैचारिक कार्यक्रम लागू कर सकें। 2011 में उन्होंने ओलंपिक की मेज़बानी के लिए इस्तांबुल की दावेदारी की घोषणा की। तुर्क अधिकारियों ने खुलकर अपनी दावेदारी को धर्म के चश्मे से पेश किया। एर्दोआन के क़रीबी विश्वासपात्र और धन-प्रबंधक एगेमेन बाग़िश (Egemen Bağış) ने कहा था कि तुर्की को खेल देने से अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के सदस्य यह साबित कर सकेंगे कि वे “किसी आस्था समूह के ख़िलाफ़” पक्षपाती नहीं हैं। वहीं तुर्की के प्रस्तावित लोगो में मस्जिदें और अर्धचंद्र शामिल थे। तुर्की ने 2036 खेलों की मेज़बानी के लिए फिर आवेदन किया है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति का इसे चुनना, चाहे कितनी ही तुर्क रिश्वतें क्यों न दी जाएँ, शर्मनाक होगा, क्योंकि इस दावेदारी की घोषणा इस्तांबुल के मेयर एक्रेम इमामोग्लू ने अपनी गिरफ़्तारी से पहले की थी, और उन्हें इस “अपराध” में गिरफ़्तार कर लिया गया कि वे ज़रूरत से ज़्यादा लोकप्रिय हैं और एर्दोआन के लिए राजनीतिक चुनौती खड़ी कर रहे हैं।

एर्दोआन ने जनवरी 2005 में एकमेलेद्दीन इहसानोग्लू (Ekmeleddin İhsanoğlu) को इस्लामिक सहयोग संगठन की कमान दिलाने के लिए खुलकर ज़ोर लगाया था। तुर्क अधिकारियों ने इहसानोग्लू की नियुक्ति को इस्लामी देशों के बीच तुर्की की बढ़ती प्रतिष्ठा का संकेत बताया। अफ़ग़ानिस्तान में NATO के पहले वरिष्ठ असैन्य प्रतिनिधि रहे तुर्क हिक्मत चेतिन (Hikmet Çetin) ने तालिबान के प्रति नरम रुख़ अपनाया; काबुल में जगह-जगह ऐसे होर्डिंग लगे, जो तुर्की के NATO सदस्य होने के बजाय तुर्की-अफ़ग़ानिस्तान की इस्लामी एकजुटता का प्रचार कर रहे थे। एर्दोआन ने 2013 से 2018 तक रासायनिक हथियार निषेध संगठन की अध्यक्षता के लिए अहमत उज़ुमजू (Ahmet Üzümcü) को भी कूटनीतिक जोड़-तोड़ के ज़रिए बिठाया। फ़ातिह बिरोल (Fatih Birol) अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का नेतृत्व करते हैं और लगातार एर्दोआन की तेल व गैस परियोजनाओं की पैरवी करते रहे हैं, तथा सुरक्षित ग्रीक, साइप्रियोट और इसराइली विकल्पों के मुक़ाबले तुर्की से होकर जाने वाली पाइपलाइन को तरजीह देते हैं।

सिनिरलिओग्लू में उतना ही करिश्मा है जितना केटामीन की दोहरी ख़ुराक के बाद माइकल डुकाकिस में होता। यूरोप में सुरक्षा और सहयोग संगठन में उनका कार्यकाल अधिक से अधिक कहें तो फीका रहा है; उन्होंने कोई सुधार नहीं किया और ऐसा लगता है कि वे एक ‘द्वारपाल’ की भूमिका निभाते हैं, जो संगठन को ऐसा कोई बयान देने या कोई अहम क़दम उठाने से रोकते हैं, जिससे एर्दोआन के कूटनीतिक या वित्तीय हितों को चोट पहुँचे। उनके लिए संयुक्त राष्ट्र का ख़ज़ाना खोलना, संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफ़ी अन्नान के तेल-के-बदले-भोजन कार्यक्रम जैसे भ्रष्टाचार घोटाले को न्योता देना होगा।

सिनिरलिओग्लू एर्दोआन के आदमी हैं। अहमत दावुतोग्लू के विदेश मंत्री रहते वे उपसचिव थे। इसके बाद उन्होंने सात साल तक संयुक्त राष्ट्र में एर्दोआन की वफ़ादारी से सेवा की। जब तुर्क सेनाओं ने सीरिया के कुर्द-प्रशासित इलाक़ों पर हमला कर उनका जातीय सफ़ाया किया, तो सिनिरलिओग्लू ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से कहा कि वे “अपने आतंकवाद-विरोधी अभियान को हमले या आक्रमण के रूप में पेश करने वाले किसी भी चित्रण को सिरे से ख़ारिज करते हैं और उसकी कड़ी निंदा करते हैं।” जुलाई 2016 के विफल “राइख़्स्टाग अग्निकांड” जैसे तख़्तापलट के बाद हज़ारों तुर्कों की सफ़ाई का बचाव करते हुए उन्होंने घोषणा की, “हम इस नीचता को कभी नहीं भूलेंगे।” चार साल बाद उन्होंने सीरियाई कुर्दों से संपर्क रखने वाले देशों को चेतावनी दी कि “आपके लाल कालीन जल्दी ही ख़ून से सन सकते हैं।” सिनिरलिओग्लू, इसी दौरान, इस्लामिक स्टेट (ISIS) को तुर्की द्वारा दी गई पनाह और हमास के समर्थन व सहयोग पर चुप रहे। इमामोग्लू की गिरफ़्तारी पर भी वे उसी तरह चुप रहे, जबकि यूरोप में सुरक्षा और सहयोग संगठन के दूसरे अधिकारियों ने आवाज़ उठाई।

जुलाई 2026 में रूसी शरारती फ़ोनबाज़ों ने सिनिरलिओग्लू को फ़ोन किया, जिनमें से एक ने ख़ुद को आर्मेनिया के प्रधानमंत्री निकोल पाशिनयान बताया। उस शरारती ने आर्मेनियाई चर्च के प्रमुख कारेकिन द्वितीय पर आरोप लगाए और उन्हें हटाने में मदद के लिए सिनिरलिओग्लू से सहयोग माँगा। सिनिरलिओग्लू ने जवाब दिया, “ठीक है, मैं पूरी कोशिश करूँगा; मैं प्रयास करूँगा।” यह टिप्पणी बताती है कि सिनिरलिओग्लू धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े हेलसिंकी सिद्धांत VII को हिकारत से देखते हैं।

एर्दोआन के शासन में तुर्की दुनिया के सबसे भ्रष्ट देशों में से एक बन गया है, बेलारूस और मिस्र के बराबर। इसकी वजह केवल तुर्क नेता नहीं, बल्कि सिनिरलिओग्लू जैसे लोगों की चुप्पी, कायरता और मिलीभगत भी है।

यह सब सिनिरलिओग्लू को एक व्यक्ति के रूप में अयोग्य ठहराने के लिए काफ़ी है, लेकिन यह विचार कि कोई भी तुर्क संयुक्त राष्ट्र या किसी अन्य संगठन का नेतृत्व करे, दूसरे कारणों से भी शुरू से ही ख़ारिज हो जाना चाहिए। तुर्की आधी सदी से भी ज़्यादा समय से साइप्रस पर क़ब्ज़ा किए हुए है। यह धारणा कि साइप्रस के मुस्लिम अल्पसंख्यकों की रक्षा की इच्छा ने तुर्की के हमले को प्रेरित किया और उसे उचित ठहराया, बकवास है: हमले का बड़ा हिस्सा साइप्रस संकट बीत जाने के बाद हुआ, जब दोनों पक्ष जिनेवा में शांति वार्ता कर रहे थे। सीधे शब्दों में, तुर्की यूरोपीय संघ के क्षेत्र पर क़ब्ज़ा किए बैठा है, और जब तक ऐसा है, किसी भी तुर्क को संयुक्त राष्ट्र या किसी भी अंतरराष्ट्रीय संगठन में कोई नेतृत्व पद नहीं मिलना चाहिए, न ही तुर्की को संयुक्त राष्ट्र की मेज़बानी के लिए किसी तरह के विचार में रखा जाना चाहिए।

मूल अंग्रेज़ी लेख पढ़ें: No Turk Should Lead the U.N. or Any International Organization Until Cyprus Occupation Ends

मिडिल ईस्ट फ़ोरम के विश्लेषण ईमेल पर पाएँ: न्यूज़लेटर की सदस्यता लें (अंग्रेज़ी में)