1969 के तख़्तापलट में ख़त्म हुआ सोमालिया का संघ, फिर वॉशिंगटन उसे क्यों मान्यता दे रहा है
अदन की खाड़ी में, जहाँ हूती हमले जहाज़रानी के लिए ख़तरा बने हुए हैं, अमेरिका को सोमालीलैंड जैसे भरोसेमंद साझेदार की ज़रूरत है।
Siyad Madey नैरोबी स्थित वकील और नीति विश्लेषक हैं। उन्हें पूर्वी अफ़्रीका और हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका में सार्वजनिक और निजी, दोनों क्षेत्रों में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव है। इससे पहले उन्होंने केन्या के नेशनल बैंक में 15 वर्षों से अधिक समय तक काम किया।

21 अक्टूबर 1969 की भोर से पहले सोमाली सैनिकों ने मोगादिशू के रेडियो स्टेशन और सरकारी दफ़्तरों पर क़ब्ज़ा कर लिया। मेजर जनरल मोहम्मद सियाद बर्रे ने प्रधानमंत्री मोहम्मद हाजी इब्राहिम एगल की निर्वाचित सरकार को अपदस्थ कर ‘क्रांति’ की घोषणा कर दी। सोमालीलैंड के लिए इसका मतलब एक ऐसे संवैधानिक समझौते का अंत था, जिसे कभी संतोषजनक ढंग से लागू ही नहीं किया गया।
वॉशिंगटन को पता था कि क्या हुआ। उसके अभिलेखागार आज सोमालिया की ‘क्षेत्रीय अखंडता’ पर दिए जाने वाले बयानों से कहीं अधिक खुलासा करने वाली कहानी कहते हैं।
तख़्तापलट से छह दिन पहले राष्ट्रपति अब्दिराशिद अली शेरमार्के की लास आनोद में हत्या कर दी गई थी। एगल, जो ख़ुद संघ के प्रमुख शिल्पकारों में से एक थे, उत्तराधिकार की खींचतान में फँस गए। 21 अक्टूबर को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर ने राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को जानकारी दी कि सैनिकों ने एगल की निर्वाचित सरकार को हटा दिया है। अमेरिकी अधिकारियों को चिंता थी कि इथियोपिया और केन्या के साथ एगल के मेल-मिलाप का प्रयास ध्वस्त हो जाएगा। वे ग़लत नहीं थे। आठ साल बाद सियाद बर्रे ने इथियोपिया पर हमला कर दिया।
28 अक्टूबर को राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के अधिकारी रॉजर मॉरिस ने सिफ़ारिश की कि सैन्य शासन के साथ चुपचाप सामान्य संबंध बहाल कर लिए जाएँ। जनरलों ने अंतरराष्ट्रीय समझौतों का पालन करने का वादा किया था। मॉरिस को डर था कि नई सरकार को मान्यता न देने से वह और अधिक आक्रामक नीतियों की ओर बढ़ जाएगी। उनकी सिफ़ारिश व्यावहारिक थी और वॉशिंगटन इसमें अकेला नहीं था। लेकिन यह ज्ञापन एक ऐसा सवाल खड़ा करता है, जिससे अमेरिकी नीति-निर्माता तब से बचते रहे हैं: उस राजनीतिक समझौते का क्या हुआ, जिसने सोमालीलैंड को गणराज्य में लाया था?
सोमालीलैंड 26 जून 1960 को ब्रिटेन से स्वतंत्र हुआ। 1 जुलाई को वह पूर्व इतालवी-प्रशासित क्षेत्र के साथ मिलकर सोमाली गणराज्य में शामिल हो गया। सोमाली एकता को लेकर उत्साह वास्तविक था। कई लोगों ने एक बड़े सोमाली राष्ट्र के लिए अभियान चलाया था, जो ब्रिटेन और इटली से विरासत में मिली सीमाओं से आगे तक फैले। लेकिन क़ानूनी काग़ज़ात उतने ठोस नहीं थे। दोनों विधायिकाओं ने संघ के एक समान दस्तावेज़ का अनुमोदन नहीं किया। दक्षिणी विधानसभा ने अपने संस्करण को सिर्फ़ सैद्धांतिक रूप से मंज़ूरी दी; बाद के क़ानूनों में इन अनियमितताओं को दुरुस्त करने की कोशिश की गई। ब्रिटिश न्यायविद यूजीन कोट्रान (Eugene Cotran) ने संस्थापक दस्तावेज़ों की क़ानूनी वैधता पर सवाल उठाए।
जनता का विरोध भी था। 1961 के संवैधानिक जनमत संग्रह में भाग लेने वाले उत्तरी मतदाताओं के बहुमत ने प्रस्तावित संविधान को ख़ारिज कर दिया, हालाँकि राष्ट्रीय स्तर पर वह पारित हो गया। यह नतीजा अपने आप में गणराज्य को भंग नहीं करता था, लेकिन इससे यह ज़रूर सामने आया कि संघ की संवैधानिक शर्तों को वह सहमति हासिल नहीं थी, जिसे उसके पैरोकार मान लेना पसंद करते थे।
इसके बावजूद सोमालीलैंड के नेताओं ने गणराज्य के भीतर रहकर काम किया। एगल 1967 में प्रधानमंत्री बने और पड़ोसियों के साथ बेहतर संबंधों की कोशिश की। संसद ने उन्हें नीतियों पर बहस के ज़रिए चुनौती देने का एक माध्यम दिया। बर्रे ने उस संभावना को ही खत्म कर दिया। सेना ने संविधान निलंबित किया, विधायिका भंग की और एगल को हिरासत में ले लिया। अब उत्तरी भागीदारी उन संवैधानिक व्यवस्थाओं पर नहीं, बल्कि एक सैन्य शासक पर निर्भर थी, जिनके तहत सोमालीलैंड संघ में शामिल हुआ था।
कोई तख़्तापलट अपने आप किसी देश के अंतरराष्ट्रीय क़ानूनी व्यक्तित्व को समाप्त नहीं कर देता। न ही कोई विवादित संस्थापक दस्तावेज़ सोमालीलैंड की मौजूदा स्थिति तय कर देता है। लेकिन 1960 के संघ को स्थायी सहमति की निर्विवाद अभिव्यक्ति मान लेना 1969 में सेना ने जो किया, उसे नज़रअंदाज़ करना है।
इसके बाद हालात और बदतर हुए। 1988 में सरकारी बलों ने उत्तरी विद्रोहियों के ख़िलाफ़ युद्ध के दौरान हरगेइसा और बुराओ पर बमबारी की। आम नागरिक मारे गए और पूरे मोहल्ले तबाह हो गए; सैकड़ों हज़ार लोग भाग निकले। ह्यूमन राइट्स वॉच ने चश्मदीदों की गवाही का सार पेश किया। जिस राज्य की ओर से उत्तर से वफ़ादारी माँगी जा रही थी, उसी ने उत्तरी समुदायों के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ दिया। साझेदारी के मूल वादे का जो कुछ बचा था, वह अब ध्वस्त घरों, बड़े पैमाने पर विस्थापन और उन स्मृतियों के नीचे दब चुका था, जिन्हें मोगादिशू की कोई भी बाद की सरकार महज़ क़ानून बनाकर मिटा नहीं सकती थी।
जब सियाद बर्रे का पतन हुआ तो बुराओ में जुटे प्रतिनिधियों ने 18 मई 1991 को सोमालीलैंड की स्वतंत्रता की पुनर्बहाली की घोषणा की। उन्होंने जून 1960 में थोड़े समय के लिए इस्तेमाल की गई संप्रभुता का हवाला दिया। इसके बाद उनकी उपलब्धि कम नाटकीय, लेकिन अधिक अहम रही: बोरामा में सुलह, 2001 में स्वीकृत संविधान, और ऐसे चुनाव जिनमें सत्तारूढ़ नेता हार भी सकते थे। 2024 में राष्ट्रपति मूसे बिही अब्दी ने हार स्वीकार की और पद छोड़ दिया—यह सत्ता हस्तांतरण अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने दर्ज किया।
सोमालीलैंड ने हर समस्या का समाधान नहीं किया है। लास आनोद को लेकर हुए संघर्ष ने सूल में असंतोष को उजागर किया और पत्रकारों की कभी-कभार होने वाली गिरफ़्तारियाँ लोकतांत्रिक दावों को कमज़ोर करती हैं। ये नाकामियाँ इसलिए मायने रखती हैं क्योंकि हरगेइसा चाहता है कि उसका आकलन उन संस्थाओं के आधार पर किया जाए, जो उसने खड़ी की हैं। मान्यता का मतलब कभी भी जाँच-पड़ताल से छूट नहीं होना चाहिए। कसौटी यह है कि क्या राजनीतिक संस्थाएँ असहमति को उन तरीक़ों का सहारा लिए बिना समेट सकती हैं, जिन्होंने मूल संघ को इतने सारे उत्तरवासियों के लिए असहनीय बना दिया था।
उधर मोगादिशू संवैधानिक अधिकार के सवाल पर बँटा हुआ है। राष्ट्रपति और संसद के कार्यकाल बढ़ाने वाले हालिया संशोधनों ने विपक्षी नेताओं और संघीय सदस्य राज्यों के साथ विवाद को और तीखा कर दिया है। अफ़्रीकी संघ लगातार सोमालिया की क्षेत्रीय अखंडता का बचाव करता रहा है, हालाँकि उसके 2005 के तथ्यान्वेषी मिशन ने सोमालीलैंड के कूटनीतिक अलगाव के नुक़सानदेह नतीजों को स्वीकार किया था।
रणनीतिक हक़ीक़तें भी बदल चुकी हैं। बरबेरा अदन की खाड़ी पर स्थित है, उन जहाज़रानी मार्गों के नज़दीक जिन्हें हूती हमलों से ख़तरा है। इसराइल ने दिसंबर 2025 में सोमालीलैंड को मान्यता दी। इनमें से कोई भी घटनाक्रम क़ानूनी सवाल का फ़ैसला नहीं करता, लेकिन दोनों मिलकर मोगादिशू के आगे झुकने की वॉशिंगटन की आदत का बचाव करना और मुश्किल बना देते हैं।
कांग्रेस को अमेरिकी विदेश मंत्रालय से वह सवाल पूछना चाहिए, जिसे उसके अपने अभिलेखागार अनिवार्य बना देते हैं: अब किस क़ानूनी और राजनीतिक आधार पर वह संघ टिका है, जिसके संस्थापक दस्तावेज़ों पर पक्षों में विवाद था, जिसके संविधान को सैनिकों ने एक तरफ़ कर दिया, और जिसका उत्तरी साझेदार 1991 से अलग होकर ख़ुद अपना शासन चला रहा है? मंत्रालय के रिकॉर्ड पुष्टि करते हैं कि सोमालीलैंड जून 1960 में स्वतंत्र था और उसे अमेरिकी बधाइयाँ मिली थीं, हालाँकि वॉशिंगटन ने औपचारिक मान्यता नहीं दी थी।
यह सवाल अब सोमालिया से आगे भी असर डालता है। अमेरिका को अदन की खाड़ी के किनारे भरोसेमंद साझेदार चाहिए, जहाँ हूती हमले जहाज़रानी के लिए ख़तरा हैं और प्रतिद्वंद्वी शक्तियाँ प्रभाव जमाना चाहती हैं। कांग्रेस को प्रशासन पर दबाव डालना चाहिए कि वह सोमालीलैंड के दावे का उसके क़ानूनी और ऐतिहासिक गुण-दोष के आधार पर आकलन करे, हरगेइसा के साथ सीधे सुरक्षा सहयोग की जाँच करे और दोनों पर मोगादिशू के व्यावहारिक वीटो पर पुनर्विचार करे। वॉशिंगटन कुछ ही दिनों में समझ गया था कि सियाद बर्रे ने क्या नष्ट किया। शीत युद्ध के दौर में लिया गया एक फ़ैसला 57 साल बाद लाल सागर को लेकर अमेरिका के विकल्प तय नहीं करना चाहिए।
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