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खाड़ी में हथियारों की होड़ और बदलता सुरक्षा समीकरण

रक्षा सहयोग के बढ़ते दायरे से रक्षा और विकास के बीच का चुनाव और भी भारी पड़ सकता है।

राधिका लक्ष्मीनारायणन शोधकर्ता और इतिहासकार हैं, जिन्होंने 3 दशकों से अधिक समय तक कुवैत और भारत की अग्रणी संस्थाओं के साथ काम किया है। वे Small States Security Dilemma—Kuwait after 1991 की लेखिका हैं।

The Saudi flag flies behind missiles.
मिसाइलों के पीछे लहराता सऊदी झंडा। · Shutterstock

दशकों से खाड़ी के अरब देश अपने पश्चिमी सहयोगियों से सबसे उन्नत सैन्य और रक्षा प्रणालियाँ ख़रीदते रहे हैं। इससे यह इलाक़ा दुनिया के सबसे मुनाफ़ेदार रक्षा बाज़ारों में शामिल हो गया है। लेकिन ये ख़रीदारी उन्हें हाल के हमलों से सुरक्षित नहीं रख सकी। इससे एक बुनियादी दुविधा खड़ी होती है: क्या उन्हें लगातार वे महँगे हथियार और तकनीकें ख़रीदते रहना चाहिए, जिन्हें पश्चिमी हथियार ठेकेदार और आपूर्तिकर्ता आकर्षक सौदों के तौर पर बेचते हैं? मौजूदा युद्ध में इन हथियारों ने उन्हें कितनी सुरक्षा दी है, और भविष्य के संघर्षों में उन्हें किस तरह की रक्षा चाहिए होगी? और आख़िर में, सैन्य-सुरक्षा खर्च को वे अपनी घरेलू आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं की वित्तीय ज़रूरतों के साथ कैसे संतुलित करें?

1990 में इराक़ के कुवैत पर हमले ने क्षेत्रीय सुरक्षा ढाँचे की कमज़ोरियाँ उजागर कर दीं: जनशक्ति की कमी, रणनीतिक गहराई का अभाव, कमान संरचनाओं की कमी, ख़ुफ़िया जानकारी तक पहुँच की दिक़्क़त और पूर्व-चेतावनी क्षमताओं का अभाव। कुवैत की सुरक्षा व्यवस्था जहाँ कुछ ही घंटों में ढह गई, वहीं पूरे खाड़ी अरब क्षेत्र के पास भी सामूहिक प्रतिक्रिया के लिए एकीकृत सैन्य तंत्र नहीं था। अमेरिका के नेतृत्व में कुवैत की मुक्ति ने वायुशक्ति, स्टेल्थ और उन्नत संचार के फ़ायदों को रेखांकित कर दिया।

2003 में अमेरिकी सेना असाधारण तेजी से बग़दाद पर क़ाबिज़ हो गई। इससे खाड़ी के अरब देशों को यक़ीन हो गया कि तकनीकी श्रेष्ठता, सटीक निर्देशित हथियार और ख़ुफ़िया क्षमताओं के ज़रिये सैन्य रूपांतरण उनकी जनसांख्यिकीय और भू-रणनीतिक कमज़ोरियों की भरपाई कर सकता है। नतीजतन अमेरिका, ब्रिटेन और फ़्रांस के साथ अरबों डॉलर के द्विपक्षीय रक्षा समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। हालांकि बाद के दशकों ने यह भी दिखाया कि उच्च तकनीक और महँगे हथियारों में भी ऐसी कमज़ोरियाँ होती हैं, जिनका असममित जवाबी रणनीतियाँ फ़ायदा उठा सकती हैं या उन्हें दरकिनार कर सकती हैं। साथ ही, ये हथियार सुरक्षा की गारंटी देने वालों पर बोझ भी बढ़ाते हैं।

अमेरिका के लिए हथियारों का हस्तांतरण महज़ व्यावसायिक लेन-देन नहीं था। यह राष्ट्रीय सुरक्षा, रणनीतिक हितों, विदेश नीति और आर्थिक सुरक्षा का विस्तार था। एक ओर इससे रक्षा मज़बूत हुई और अमेरिका तथा उसके खाड़ी सहयोगियों के बीच संस्थागत रिश्ते गहरे हुए, तो दूसरी ओर रक्षा ठेकेदारों ने खाड़ी के अरब ग्राहकों को दशकों तक प्रशिक्षण, गोला-बारूद, रखरखाव, अंतर-संचालन और उन्नयन की व्यवस्था में बाँध दिया।

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के आँकड़ों के मुताबिक 2021–25 के दौरान दुनिया भर में प्रमुख हथियारों के आयात में खाड़ी के छह अरब देशों की हिस्सेदारी लगभग 20 प्रतिशत रही। अकेले सऊदी अरब की हिस्सेदारी 6.8 प्रतिशत, क़तर की 6.4 प्रतिशत और कुवैत की 2.8 प्रतिशत थी। सऊदी अरब ने 2025 में अपनी सेना पर $83.2 billion ख़र्च किए, जो उसके सकल घरेलू उत्पाद का 6 प्रतिशत है। इससे वह दुनिया का आठवाँ सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश बन गया। कुवैत ने 2025 में अपनी सेना पर अनुमानित $8.1 billion ख़र्च किए, जो उसके सकल घरेलू उत्पाद का 4.7 प्रतिशत है। इन देशों के सामने ख़तरे हैं, इसलिए वे रक्षा खर्च को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। लेकिन उन पर अपने राष्ट्रीय विज़न एजेंडे को चलाए रखने का वित्तीय दबाव भी है। दोनों के बीच संतुलन बेहद अहम है, ख़ासकर राज्य और शासन की सुरक्षा के लिए।

खाड़ी के अरब देशों का पारंपरिक रक्षा मॉडल अब भी पश्चिम पर निर्भर है। 2021–25 में सऊदी अरब के 77 प्रतिशत, कुवैत के 62 प्रतिशत, क़तर के 48 प्रतिशत और संयुक्त अरब अमीरात के 42 प्रतिशत प्रमुख हथियार आयात अमेरिका से हुए। हालांकि अब खाड़ी के अरब देश व्यापक रक्षा सहयोग तलाश रहे हैं, जिससे रक्षा और विकास के बीच समझौता और भी निर्णायक हो सकता है। इस संदर्भ में यूक्रेन युद्ध ने चेतावनी दी है। सस्ते ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, तेज़ नवाचार और बड़े पैमाने पर उपकरण बदलने की क्षमता के सहारे लड़ा जाने वाला असममित युद्ध सबसे उन्नत हथियारों को भी असुरक्षित बना सकता है। इससे खाड़ी के अरब देशों के लिए रक्षा आपूर्तिकर्ताओं में विविधता लाना ज़्यादा व्यावहारिक विकल्प बन जाता है।

चीन एक रणनीतिक विकल्प के तौर पर उभरता है। वह आर्थिक संबंध बढ़ा रहा है, चुनिंदा सैन्य क्षमताएँ दे रहा है और बुनियादी ढाँचे में सहयोग उपलब्ध करा रहा है, लेकिन फिलहाल वह खाड़ी सहयोग परिषद के देशों के लिए सुरक्षा की गारंटी देने वाला बनने की कोशिश नहीं कर रहा। तुर्की का बढ़ता रक्षा उद्योग और मानवरहित प्रणालियों में उसकी क्षमता तकनीक और ख़रीद के मॉडल तक पहुँच मुहैया कराती है। पाकिस्तान सैन्य प्रशिक्षण, कर्मी और रणनीतिक सहयोग प्रदान करता है। भारत मिसाइलें, वायु रक्षा, रॉकेट, रडार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और नौसैनिक प्रणालियाँ देता है। यूक्रेन तेज़ नवाचार के ज़रिये रणक्षेत्र का अनुभव सामने रखता है, ख़ासकर ड्रोन-रोधी युद्ध, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और बड़े पैमाने पर विस्तार योग्य रक्षा तकनीकों में।

खाड़ी के अरब देशों को ऐसे सुरक्षा ढाँचे की ज़रूरत है, जिसमें अलग-अलग तकनीकें एक साथ काम कर सकें: पूर्व-चेतावनी प्रणालियाँ, ख़ुफ़िया तंत्र, कमान-और-नियंत्रण प्रणालियाँ, अंतर-संचालन और टिकाऊ पुनःपूर्ति तक पहुँच। खाड़ी सहयोग परिषद की अगली सुरक्षा क्रांति इस पर कम निर्भर करेगी कि वे सबसे उन्नत हथियार चुनकर ख़रीदते हैं या नहीं, और इस पर ज़्यादा कि वे अपनी ज़रूरतों और वहनीयता का आकलन कैसे करते हैं।

अमेरिका के लिए फ़ारस की खाड़ी में रणनीतिक प्रभाव बनाए रखना, अपने रक्षा-औद्योगिक आधार की सुरक्षा करना, और चीन, तुर्की या किसी अन्य बाहरी शक्ति को इस क्षेत्र में प्रमुख सुरक्षा भूमिका हासिल करने से रोकना अहम लक्ष्य हैं। लेकिन ईरान के साथ मौजूदा युद्ध ने स्थायी सैन्य तैनाती, सैन्य अड्डों और अमेरिकी तकनीक पर हद से ज़्यादा निर्भरता की सीमाएँ उजागर कर दी हैं। एक अधिक टिकाऊ रणनीति यह होगी कि खाड़ी के अरब देशों को विविध सुरक्षा साझेदारियों और घरेलू रक्षा क्षमताओं के ज़रिये अपनी रक्षा क्षमता विकसित करने में मदद दी जाए। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि वे क्षेत्र में अमेरिकी हितों के साथ रणनीतिक रूप से जुड़े रहें।

वॉशिंगटन की रणनीतिक अनिवार्यता यह होनी चाहिए कि फ़ारस की खाड़ी ऐसी बने जिसे सुरक्षा के लिए अमेरिकी साझेदारी की ज़रूरत हो, लेकिन अपने अस्तित्व के लिए अमेरिकी संरक्षण की नहीं, भले ही खाड़ी के अरब देशों को अपने अधिक हठी पड़ोसियों का सामना करना पड़े।

मूल अंग्रेज़ी लेख पढ़ें: The Persian Gulf Arms Race and the Changing Security Bargain

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