पाकिस्तान-सीरिया सैन्य नज़दीकी के क्या मायने
सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की का ऐसा गठजोड़ जिसमें सीरिया भी शामिल हो, वॉशिंगटन की रणनीतिक गणनाओं को उलझा सकता है।
इमरान ख़ुर्शीद, पीएचडी, भारत के नई दिल्ली स्थित इंटरनेशनल सेंटर फ़ॉर पीस स्टडीज़ (International Centre for Peace Studies) में एसोसिएट रिसर्च फ़ेलो हैं।

स्वतंत्र लेबनानी समाचार पोर्टल अल-मुदुन (Al-Modon) में 10 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, सीरियाई राष्ट्रपति अहमद अल-शरा (Ahmed al-Sharaa) ने सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से कहा कि वे पाकिस्तान को सीरिया के लिए हथियारों की आपूर्ति तेज़ करने और दमिश्क को इस्लामाबाद से सीधे हथियार हासिल करने की सुविधा देने के लिए प्रोत्साहित करें। सीरियाई विश्लेषकों के मुताबिक, दमिश्क की संक्रमणकालीन सरकार पाकिस्तान को एक अहम “संप्रभु बफ़र” के तौर पर देखती है। रूसी हथियार प्रणालियों या ईरानी अर्धसैनिक बलों पर सीरिया की ऐतिहासिक निर्भरता से ख़रीद प्रक्रिया को हटाकर, सीरिया पाकिस्तान की बेहद मॉड्यूलर और कम लागत वाली स्वदेशी हथियार प्रणालियाँ हासिल करना चाहता है और सीरियाई सेना के पुनर्निर्माण व आधुनिकीकरण के दौरान पश्चिमी प्रतिबंधों से बचना चाहता है।
ये घटनाक्रम उच्चस्तरीय बैठकों-संपर्कों की एक शृंखला के बाद सामने आए हैं, जो पाकिस्तान में सीरिया की बढ़ती दिलचस्पी की ओर इशारा करती है। 19–20 अगस्त 2026 को विदेश मंत्री असद अल-शैबानी (Asaad al-Shaibani) ने इस्लामाबाद का दौरा किया—19 साल में किसी सीरियाई विदेश मंत्री की पाकिस्तान की यह पहली यात्रा थी—जिसमें रक्षा सहयोग, सुरक्षा, व्यापार और निवेश पर चर्चा हुई। पाकिस्तान ने सीरिया की संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और गोलन हाइट्स पर उसके रुख़ के प्रति अपना समर्थन दोहराया।
यह दौरा सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की द्वारा मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने के कुछ ही समय बाद हुआ। पाकिस्तान ने सीरिया के अबू अल-दुहूर एयरबेस पर इसराइली हवाई हमलों की भी निंदा की, जिनके बारे में इसराइल का कहना था कि उनका मक़सद तुर्की की संभावित सैन्य तैनाती को रोकना था। सीरिया की आधिकारिक सीरियन अरब न्यूज़ एजेंसी ने पाकिस्तान के बयानों को प्रमुखता से उभारा और पाकिस्तान के इसराइल-विरोधी रुख़ को एक प्रभावी भू-राजनीतिक ढाल के रूप में पेश किया।
इस बीच, पाकिस्तानी मीडिया अब पाकिस्तान-सीरिया रिश्तों को इस रूप में प्रचारित कर रहा है कि ये संघर्ष के बाद के अरब देशों को प्रशिक्षण, सिद्धांत और सुरक्षा के निर्यात में पाकिस्तानी सेना की “संस्थागत प्रतिष्ठा” को दर्शाते हैं।
सीरिया की ओर पाकिस्तान की इस पहल के पीछे अपने सैन्य बाज़ारों का विस्तार करने की व्यावसायिक चाह भी है। इस्लामाबाद अपनी स्वदेशी एयरोस्पेस और ड्रोन-रोधी प्रणालियों—जैसे JF-17 थंडर लड़ाकू प्लेटफ़ॉर्म और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स—को उन देशों के लिए आदर्श संसाधन के तौर पर पेश कर रहा है, जो पश्चिमी या रूसी अंतिम-उपयोग संबंधी पाबंदियों से स्वतंत्र रक्षा नेटवर्क खड़ा करना चाहते हैं। चूँकि पाकिस्तान चीन के साथ घनिष्ठ रक्षा संबंध रखता है और यह तर्क दिया जाता है कि वह कई बार चीनी प्रॉक्सी की तरह काम करता है, इसलिए सीरिया को पाकिस्तानी सैन्य आपूर्ति व्यावहारिक रूप से चीनी बाज़ारों का भी विस्तार कर सकती है।
पाकिस्तान में इस बात पर बहस चल रही है कि ऐसे समय में, जब देश महँगाई, आर्थिक अस्थिरता और अपनी ही सीमाओं पर सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है, मक्का समझौते में शामिल होना या सीरिया जैसी जगहों पर दूसरी विदेशी प्रतिबद्धताएँ लेना कितना समझदारी भरा है।
इस समीकरण में तुर्की एक अहम कारक बना हुआ है। अंकारा के सीरिया में रणनीतिक हित हैं और वह देश की नई राजनीतिक और सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित करना चाहता है। पाकिस्तान के साथ तुर्की का घनिष्ठ समन्वय एक वैकल्पिक रास्ता मुहैया करा सकता है, जिसके ज़रिए सीरिया अपनी सैन्य क्षमताओं का पुनर्निर्माण कर सके। पाकिस्तानी रक्षा विश्लेषक इस त्रिपक्षीय परिदृश्य को एक कथित “भारत-इसराइल क्षेत्रीय गठजोड़” को तोड़ने के साधन के रूप में देखते हैं। लेवांत में साजो-सामान की एक ठोस मौजूदगी बनाकर इस्लामाबाद इसराइल के भीतर भारत की गहराती तकनीकी और ख़ुफ़िया साझेदारियों के मुक़ाबले सीधा प्रतिसंतुलन खड़ा करता है।
सऊदी-पाकिस्तान-तुर्की का ऐसा रिश्ता, जिसमें सीरिया भी शामिल हो, वॉशिंगटन की दीर्घकालिक रणनीतिक गणनाओं को उलझा सकता है। अगर ये देश सीरिया के साथ अपने सैन्य संबंध और गहरे करते हैं, तो उनका सामूहिक प्रभाव इसराइल की कार्रवाई की आज़ादी को सीमित कर सकता है और अमेरिकी क्षेत्रीय नीति के लिए नई चुनौतियाँ खड़ी कर सकता है।
मुख्य मुद्दा सिर्फ़ यह नहीं है कि सीरिया अपनी सैन्य क्षमताओं का पुनर्निर्माण करने की कोशिश कर रहा है, बल्कि यह है कि उस प्रक्रिया में पाकिस्तान क्या भूमिका निभा सकता है। ये उभरते संपर्क किसी अधिक समन्वित सुरक्षा व्यवस्था का रूप लेंगे या नहीं, यह अनिश्चित है। फिर भी, सीरिया के साथ पाकिस्तान की बढ़ती संलग्नता क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन में एक संभावित खटके का काम करती है।
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