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क्या आर्मेनिया-अज़रबैजान शांति भी टूट जाएगी

अलीयेव का आर्मेनिया को ‘पश्चिमी अज़रबैजान’ बताने वाला बयान दिखाता है कि शांति उनका लक्ष्य नहीं है और वह ट्रंप को बेवक़ूफ़ बना रहे हैं।

माइकल रुबिन ईरान, तुर्की और हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका के विशेषज्ञ हैं। उनके करियर में पेंटागन में अधिकारी के तौर पर काम करने का अनुभव शामिल है। इसमें ईरान, यमन और इराक़ में ज़मीनी स्तर के अनुभव के साथ-साथ 9/11 से पहले तालिबान के साथ संपर्क भी रहा है। श्री रुबिन ने सैन्य शिक्षा में भी योगदान दिया है और अमेरिकी नौसेना तथा मरीन इकाइयों को क्षेत्रीय संघर्षों और आतंकवाद के बारे में पढ़ाया है। उनके विद्वतापूर्ण काम में कई अहम प्रकाशन शामिल हैं, जैसे “Dancing with the Devil” और “Eternal Iran।” रुबिन ने येल यूनिवर्सिटी से इतिहास में पीएच.डी. और एम.ए., तथा जीव विज्ञान में बी.एस. की डिग्री हासिल की।

President Donald Trump hosts Azerbaijani leader Ilham Aliyev and Armenian Prime Minister Nikol Pashinyan at the White House in August 2025.
अगस्त 2025 में व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अज़रबैजानी नेता इल्हाम अलीयेव और आर्मेनियाई प्रधानमंत्री निकोल पशिनयान की मेज़बानी की। · White House photo.

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मानते हैं कि वे नोबेल शांति पुरस्कार के हक़दार हैं। उन्होंने ग़ज़ा और ईरान में दख़ल दिया है और दावा किया कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच “हज़ार साल पुराना विवाद” ख़त्म कर दिया, जबकि भारत का विभाजन 80 साल से भी कम पुराना है। उन्होंने रवांडा और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो के बीच शांति कराने का दावा भी किया। हालांकि ग़ज़ा में हमास अब भी हथियार डालने से इनकार कर रहा है। लेबनान में हिज़्बुल्लाह भी ऐसा ही कर रहा है। ईरान के साथ हुआ समझौता ज्ञापन 10 दिन भी नहीं चला और कांगो के राष्ट्रपति फ़ेलिक्स शिसेकेदी (Félix Tshisekedi) ट्रंप से किए गए अपने वादों का पालन करने और उन आतंकी गुटों पर लगाम कसने के बजाय, असंवैधानिक तीसरे कार्यकाल के बदले अपनी संप्रभुता चीन को बेचने में ज़्यादा दिलचस्पी लेते दिख रहे हैं, जिन्होंने इस क्षेत्र की स्थिरता को धड़ाम से गिरा दिया।

अब ऐसा लगता है कि ट्रंप की शांति-स्थापना का ‘क्राउन ज्वेल’ यानी अज़रबैजान और आर्मेनिया के बीच समझौता, टूटने की कगार पर है। 8 अगस्त 2025 को ट्रंप ने व्हाइट हाउस में अज़रबैजानी नेता इल्हाम अलीयेव और आर्मेनियाई प्रधानमंत्री निकोल पाशिन्यान की मेज़बानी की। दोनों नेताओं ने एक संयुक्त घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर किए, जिसका दावा था कि दशकों की लड़ाई ख़त्म हो गई। ट्रंप ने कहा, “आख़िरकार हम शांति कराने में कामयाब हो गए हैं। आर्मेनिया और अज़रबैजान सारी लड़ाई हमेशा के लिए रोकने, व्यापार, आवाजाही और राजनयिक संबंध खोलने तथा एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने के लिए प्रतिबद्ध हो रहे हैं।”

संघर्षविराम के बाद ट्रंप ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के “कॉरिडोर” प्रस्ताव को अपने पक्ष में कर लिया और उसे Trump Route for International Peace and Prosperity (TRIPP) के तौर पर नए सिरे से पेश किया—एक ऐसा अमेरिकी-प्रशासित परिवहन गलियारा, जो तुर्की और अज़रबैजान के बहिःक्षेत्र नख़चिवान को आर्मेनिया के रास्ते मुख्य अज़रबैजान से जोड़ने के लिए बनाया गया है।

ट्रंप प्रशासन के गलियारे की यह परिकल्पना शुरू से ही दो वजहों से दोषपूर्ण थी। पहली, अगर तुर्की और अज़रबैजान आर्मेनिया पर लगी अपनी नाकेबंदी हटा दें, तो किसी गलियारे की ज़रूरत ही नहीं रहेगी। दूसरी, अज़रबैजान ईरान के साथ साझेदारी मजबूरी में नहीं, बल्कि अपनी मर्ज़ी से करता है; 2022 में उसने ईरानी भूभाग से होकर एक गलियारा शुरू किया था।

पाशिन्यान अज़रबैजान के साथ शांति समझौते पर और ज़ोर दे रहे हैं और तर्क देते हैं कि नागोर्नो-काराबाख़ युद्ध में अज़रबैजान की जीत के बाद आर्मेनिया के पास कोई और विकल्प नहीं है, लेकिन उनके आलोचक हमेशा से अलीयेव की नीयत पर सवाल उठाते रहे हैं। आर्मेनियाई रियायतों के अनुपात में अज़रबैजानी मांगें बढ़ती जाती हैं। ये मांगें लगातार हास्यास्पदता के दायरे में जा रही हैं। आर्मेनियाई नरसंहार से भी पहले से माउंट अरारात आर्मेनिया का प्रतीक रहा है और साफ़ मौसम में यह येरेवान की पृष्ठभूमि बनता है, फिर भी अलीयेव और तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन मांग करते हैं—और पाशिन्यान सहमत हो जाते हैं—कि आर्मेनियाई प्रतीक-चिह्नों में अरारात को मिटा दिया जाए, क्योंकि अब यह तुर्की में है।

अलीयेव संकेत दे रहे हैं कि पाशिन्यान के समझौतों के बावजूद मेल-मिलाप अज़रबैजान के एजेंडे में नहीं है। 2 अक्टूबर 2026 को अपनी राजनीतिक पार्टी के अधिवेशन में बोलते हुए अलीयेव ने घोषणा की, “यह सच है कि आर्मेनिया के पूर्व नेता युद्ध अपराधी हैं और उन्हें अपनी सज़ा भुगतनी चाहिए, लेकिन यह मौजूदा आर्मेनियाई सत्ता ही थी जिसने हमसे क्षेत्रीय मांगें कीं, अनुचित और असभ्य बयानों से अज़रबैजानी जनता की गरिमा का अपमान किया। संक्षेप में, हमें इसे कभी नहीं भूलना चाहिए।”

अलग-अलग प्रशासनों के दौरान सफल शांति-स्थापना के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा यह है कि व्हाइट हाउस और अमेरिकी विदेश मंत्रालय विचारधारा के महत्व को समझ नहीं पाते। राजनयिक इस धारणा में सुकून पाते हैं कि हर संघर्ष की जड़ में सामान्य शिकायतें होती हैं। ऐसे हालात में शांति कराने के लिए रियायतों और लेन-देन का सही ‘जादुई फ़ॉर्मूला’ खोजना होता है। लेकिन जब फ़ैसले विचारधारा से संचालित हों, तो आर्थिक बेहतरी समझौते की प्रेरणा नहीं रह जाती। और जब विचारधारा में धर्म शामिल हो, तो विदेश मंत्रालय ख़ास तौर पर अंधा हो जाता है। चूंकि अमेरिका में चर्च और राज्य अलग हैं, इसलिए बहुत से राजनयिक धर्म को ‘थर्ड रेल’ मानते हैं। कुछ आस्था के महत्व को पहचानते तो हैं, लेकिन जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी जैसे विश्वविद्यालयों में पढ़ाई के चलते उनकी समझ ‘सैनिटाइज़्ड’ हो जाती है, क्योंकि वहां क़तरी चंदा पाठ्यक्रम को आकार देता है।

इतिहास की अनभिज्ञता भी मायने रखती है। जब राजनयिक हर 2 या 3 साल में फ़ाइलों से आते-जाते रहते हैं, तो वे आख़िरकार विवादों की उत्पत्ति या अतीत में किए गए वादों को ओझल कर देते हैं। अलीयेव के सत्ता में आने के बाद से बाकू में 9 अलग-अलग अमेरिकी राजदूत तैनात रहे हैं, और इसमें विभिन्न चार्ज द'अफ़ेयर को गिना भी नहीं गया है, जिनमें से कुछ ने औपचारिक राजदूतों जितने लंबे समय तक काम किया।

नतीजतन, बाइडन और ट्रंप दोनों प्रशासनों के दौरान दक्षिण काकेशस की फ़ाइल संभालने वाले लोग संघर्ष के मूल कारणों को समझने में नाकाम रहते हैं और असली अत्याचारों—मसलन बाकू का नरसंहार—और बड़े पैमाने पर गढ़े गए अत्याचारों, जैसे तथाकथित ख़ोजाली नरसंहार, के बीच फ़र्क़ करने में भी विफल रहते हैं। वे नागोर्नो-काराबाख़ विवाद के केंद्र में मौजूद संवैधानिक मुद्दों को भी ग़लत समझते हैं।

हालांकि अलीयेव के बयान यह दिखाते हैं कि शांति उनका लक्ष्य नहीं है। फ़लस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) के दिवंगत अध्यक्ष यासिर अराफ़ात की तरह अलीयेव बातचीत का इस्तेमाल रियायतें हासिल करने के लिए करेंगे, और फिर मेज़ से उठकर चले जाएंगे ताकि उस इकाई को मिटाने के अपने लक्ष्य को फिर से आगे बढ़ा सकें, जिसका अस्तित्व वे कभी स्वीकार नहीं कर सकते। सच तो यह है कि जहां ट्रंप अज़रबैजान और आर्मेनिया के बीच शांति को ‘आर्ट ऑफ़ द डील’ का उदाहरण बताते हैं, वहीं आर्मेनिया को “पश्चिमी अज़रबैजान” कहने वाली अलीयेव की बयानबाज़ी बताती है कि अलीयेव ट्रंप को सहयोगी नहीं, बल्कि एक बेवक़ूफ़ मानते हैं, जिस पर वे मनमानी कर सकते हैं।

अगर ट्रंप यह मानने से इनकार करते रहे कि उनकी शांति ख़तरे में है और अगर पाशिन्यान उस जुआरी की तरह शासन करते रहे जो मानता है कि बस एक और दांव उनकी कूटनीतिक हार के सिलसिले को मिटा देगा, तो दोनों नेताओं की असली विरासत यही होगी कि वे आर्मेनिया में ईसाइयत के अंत के साक्षी बने।

मूल अंग्रेज़ी लेख पढ़ें: Will the Armenia-Azerbaijan Peace Be the Latest to Come Undone?

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