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सोमालीलैंड के बाद इसराइल दक्षिण यमन को मान्यता दे

इसराइल और अमेरिका को दोनों देशों को केवल मान्यता ही नहीं देनी चाहिए, बल्कि उनके साथ पूर्ण राजनयिक संबंध भी स्थापित करने चाहिए।

माइकल रुबिन ईरान, तुर्की और हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका के विशेषज्ञ हैं। उनके करियर में पेंटागन में अधिकारी के तौर पर काम करने का अनुभव शामिल है। इसमें ईरान, यमन और इराक़ में ज़मीनी स्तर के अनुभव के साथ-साथ 9/11 से पहले तालिबान के साथ संपर्क भी रहा है। श्री रुबिन ने सैन्य शिक्षा में भी योगदान दिया है और अमेरिकी नौसेना तथा मरीन इकाइयों को क्षेत्रीय संघर्षों और आतंकवाद के बारे में पढ़ाया है। उनके विद्वतापूर्ण काम में कई अहम प्रकाशन शामिल हैं, जैसे “Dancing with the Devil” और “Eternal Iran।” रुबिन ने येल यूनिवर्सिटी से इतिहास में पीएच.डी. और एम.ए., तथा जीव विज्ञान में बी.एस. की डिग्री हासिल की।

A water canal in the city of Mukalla, southern Yemen.
दक्षिणी यमन के मुकल्ला शहर में एक जल नहर। · Shutterstock

इसराइल द्वारा 26 दिसंबर 2025 को सोमालीलैंड की स्वतंत्रता को दी गई मान्यता विवाद का विषय नहीं होनी चाहिए। सोमालीलैंड कई ऐसी कसौटियों पर खरा उतरता है, जिन पर स्वतंत्रता के अन्य दावेदार नहीं उतरते। सनाग और सूल को लेकर गढ़े गए संकट को छोड़ दें तो उसकी सीमाएँ उन्नीसवीं सदी में ब्रिटिश संरक्षित क्षेत्र के दौर से तय हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी पाँच स्थायी सदस्यों ने 26 जून 1960 को ब्रिटेन से सोमालीलैंड की स्वतंत्रता को मान्यता दी थी। यह स्वतंत्रता अल्पकालिक रही, क्योंकि उसके नेतृत्व ने एक संयुक्त सोमाली गणराज्य बनाने के लिए पूर्व इतालवी सोमालीलैंड के साथ विलय पर सहमति जता दी। यह ऐसा गठबंधन था जो चल नहीं सका। 1991 में सोमालीलैंड ने अपनी स्वतंत्रता की पुनर्बहाली की घोषणा कर दी, जबकि बाक़ी सोमालिया अराजकता में डूब गया।

औपचारिक रूप से अमान्यता और संयुक्त राष्ट्र तथा अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग प्रणाली, दोनों से बाहर रखे जाने के बावजूद सोमालीलैंड फला-फूला है। वहाँ कई बार एक व्यक्ति, एक वोट के आधार पर चुनाव हुए हैं। यह एक ऐसा सरल काम है, जिसे सोमालिया ख़ुद इसी मक़सद के लिए निर्धारित अरबों डॉलर के बावजूद नहीं कर पाया। दरअसल, मतदान में धांधली रोकने के लिए बायोमेट्रिक आइरिस स्कैनिंग का इस्तेमाल करने वाला सोमालीलैंड दुनिया का पहला देश बना। उसने ऐसा कारोबारी माहौल बनाया, जिसमें निवेशक फल-फूल सकें। अंतरराष्ट्रीय विमान कंपनियों ने हरगेसा के लिए उड़ानें शुरू कीं। टेलीसोम के मुख्यालय में दाख़िल होना नासा के ऑपरेशंस रूम में क़दम रखने जैसा है। विश्व बैंक का कंटेनर पोर्ट परफ़ॉर्मेंस इंडेक्स बरबरा के गहरे पानी वाले बंदरगाह को उप-सहारा अफ़्रीका के शीर्ष बंदरगाहों में रखता है।

अंतरराष्ट्रीय पैमाने पर बरबरा शंघाई और हैम्बर्ग से बेहतर प्रदर्शन करता है। बरबरा हवाई अड्डा क्षेत्रीय और मध्य पूर्वी विमान कंपनियों के केंद्र के रूप में काम करने के लिए पूरी तरह तैयार है। जहाँ 2005 में इसराइल द्वारा सौंपे गए ग्रीनहाउस और अन्य आर्थिक ढाँचे को ग़ज़ा के लोगों ने, जैसा कि मशहूर है, नष्ट कर दिया था, वहीं सोमालीलैंड ने अपना ढाँचा शून्य से खड़ा किया और अब वहाँ अफ़्रीका का दूसरा सबसे बड़ा कोका-कोला बॉटलिंग संयंत्र तथा कई अरब डॉलर की मोबाइल मनी कंपनियाँ हैं। सोमालीलैंड के लोगों के पास अपने पासपोर्ट हैं, जिन्हें कई अफ़्रीकी पड़ोसी और खाड़ी सहयोग परिषद के देश स्वीकार करते हैं; सोमालीलैंड की अपनी मुद्रा है और अपना झंडा भी। सोमालीलैंड के 80 प्रतिशत लोग सोमालिया से अलगाव के बाद बड़े हुए हैं और उन्हें स्वायत्त अस्तित्व के अलावा कुछ याद नहीं। शिक्षा के क्षेत्र में भी सोमालीलैंड आगे बढ़ रहा है। उसके अबार्सो नेटवर्क के स्नातकों को मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी, येल विश्वविद्यालय, हार्वर्ड और ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में छात्रवृत्तियाँ मिली हैं; उनमें से अधिकतर फिर सोमालीलैंड लौटकर अपना देश बनाते हैं, न कि अमेरिकी सामाजिक सुरक्षा तंत्र पर बोझ डालते हैं।

जहाँ कई अरब देश और फ़लस्तीनी इसराइल के इस क़दम पर चर्चा के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपात बैठक की माँग कर रहे हैं, वहीं येरूशलम द्वारा हरगेसा को दी गई मान्यता नैतिक रूप से भी सही है और रणनीतिक रूप से भी समझदारी भरी।

सोमालीलैंड के रणनीतिक कदम शब्दों से ज़्यादा बोलते हैं। जहाँ पड़ोसी सोमाली संघीय राज्य पुंटलैंड ने कभी समुद्री डाकुओं को पनाह दी, वहीं सोमालीलैंड ने अपनी ज़मीन समुद्री डाकुओं या नौवहन की स्वतंत्रता के लिए किसी भी ख़तरे के इस्तेमाल में नहीं आने दी। जहाँ यमन के हूती सूडान, इरिट्रिया, जिबूती और स्वयं सोमालिया से हथियारों की तस्करी करते हैं, वहीं वे सोमालीलैंड से फासला बनाए रखते हैं। यह संयोग नहीं है। सोमालीलैंड का तटरक्षक बल बेहद सीमित साधनों वाला है, लेकिन निडर है। संयुक्त अरब अमीरात जैसे मित्र देशों से आने वाले वन्यजीव तस्कर तक, जो चीते और बाज़ के अवैध व्यापार में शामिल हैं, समझ चुके हैं कि वे सोमालीलैंड के क़ानूनों और संरक्षणों को रौंद नहीं सकते। जब सोमालीलैंड बहुत कम पैसे में अपनी 528 मील लंबी तटरेखा सुरक्षित कर लेता है, तो यह इस धारणा को झुठला देता है कि जिबूती, सूडान या सोमालिया ऐसा नहीं कर सकते; ये देश केवल ऐसा न करना चुनते हैं। जहाँ राष्ट्रपति जो बाइडन ने अमेरिकी विमानवाहक पोत स्ट्राइक ग्रुपों के साथ लाल सागर में गश्त पर सैकड़ों मिलियन डॉलर खर्च किए, वहीं इसराइल और संयुक्त अरब अमीरात, अगर अमेरिका नहीं भी, तो बरबरा से छोटी नौकाओं और विमानों के ज़रिए बाब अल-मंदेब में गश्त कर सकते हैं। सीधे शब्दों में कहें तो सोमालीलैंड को मान्यता देना येरूशलम या वॉशिंगटन—दोनों के लिए बिल्कुल सहज फ़ैसला है।

अगर लक्ष्य आतंक को हराना, स्थिरता लाना और ईरान की अस्थिरता निर्यात करने की क्षमता को रोकना है, तो येरूशलम को—और सैद्धांतिक रूप से वॉशिंगटन को भी—सोमालीलैंड पर नहीं रुकना चाहिए। जहाँ फ़लस्तीनियों और कुर्दों को विश्व मंच पर ज़्यादा ध्यान मिलता है, वहीं दक्षिण यमन का मामला, सोमालीलैंड की तरह, हर कसौटी पर कहीं बेहतर है।

सोमालीलैंड की तरह दक्षिण यमन का भी स्पष्ट रूप से परिभाषित सीमाओं के साथ स्वतंत्रता का इतिहास है और, सोमालीलैंड की तरह, उसकी राजनीतिक संस्कृति अपने पड़ोसियों की तुलना में कहीं अधिक उदार है। दक्षिण यमन अपनी ज़मीन हथियार तस्करों को नहीं देता और उसने ईरान समर्थित हूतियों तथा सऊदी समर्थित मुस्लिम ब्रदरहुड आतंकवादियों की गोलाबारी के बीच भी एक कामकाजी राज्य खड़ा किया है। सदर्न ट्रांज़िशनल काउंसिल (Southern Transitional Council) ने एक कामकाजी सरकार स्थापित की है, भले ही वह अंतरराष्ट्रीय मान्यता के अभाव से अपंग हो। जहाँ वास्तविक रूप से उत्तरी नियंत्रण वाली यमनी एकता का अर्थ यह हो सकता है कि ईरान या उसके राजनयिक सहयोगी पाकिस्तानी सीमा से बाब अल-मंदेब तक 3,700 मील लंबी तटरेखा पर नियंत्रण कर लें, वहीं दक्षिण यमन को मान्यता देने से 1,200 मील सुरक्षित हो जाएँगे। अब्राहम समझौते वाले देश अगर अदन या मुकल्ला में अपनी सेनाएँ तैनात करें तो ईरान के लिए समुद्री और थल—दोनों—तस्करी मार्ग बंद हो जाएँगे।

जिस तरह अमेरिकी और यूरोपीय राजनयिकों ने, अमेरिकी हितों के लिए इसके स्पष्ट रूप से नुकसानदेह होने के बावजूद, सोमाली एकता का मंत्र जपा, उसी तरह उन्होंने आँख मूँदकर यमनी एकता का समर्थन भी किया है। जबकि हूती उपस्थिति न भी हो, तो भी इससे ईरान, मुस्लिम ब्रदरहुड और अन्य प्रतिगामी आंदोलनों को ही बढ़त मिलती है। अरब खाड़ी देशों, सऊदी अरब के जेद्दा और इराक़ के बसरा की तरह, दक्षिण यमन की व्यापार परंपरा और तट के साथ लोगों के स्वाभाविक मेलजोल ने उसे भीतरी यमन के उन क़बीलों की तुलना में कहीं अधिक विश्वजनीन संस्कृति दी है, जिन्होंने एकीकृत यमन की राजनीति पर प्रभुत्व जमाया है।

और न ही एकीकृत यमन कभी अंतरराष्ट्रीय लक्ष्य था। 1967 में दक्षिणी यमन में कम्युनिस्टों के सत्ता पर क़ब्ज़े तक ब्रिटिश योजना विभिन्न अमीरातों से मिलकर बने फ़ेडरेशन ऑफ़ साउथ अरेबिया के गठन की थी, जो आगे चलकर संयुक्त अरब अमीरात बना—उससे बहुत अलग नहीं।

चीन, सोमालिया, फ़लस्तीनी प्राधिकरण और नाकाम अरब देश इसराइल की कार्रवाइयों पर संयुक्त राष्ट्र में रोना-धोना कर सकते हैं। इसराइल को उन्हें नज़रअंदाज़ करना चाहिए। इसके बजाय येरूशलम, वॉशिंगटन, अबू धाबी और अब्राहम समझौते वाले अन्य देशों को तुरंत यही कदम दोहराना चाहिए और अदन को एक स्वतंत्र दक्षिण यमन या दक्षिण अरब की राजधानी के रूप में मान्यता देनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में शायद ही कभी ऐसा मास्टरस्ट्रोक सामने आता है, जो बहुत कम क़ीमत पर इसराइल, अमेरिका और उदार अरब देशों को सिर्फ़ लाभ पहुँचाए। इससे भी दुर्लभ है एक ही सप्ताह में ऐसी जीत दो बार हासिल करने का अवसर। अब समय है कि न केवल सोमालीलैंड, बल्कि दक्षिण यमन की स्वतंत्रता को भी मान्यता दी जाए और इसराइल तथा अमेरिका दोनों को दोनों के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित करने चाहिए।

मूल अंग्रेज़ी लेख पढ़ें: After Somaliland, Israel Should Recognize South Yemen

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