क्या अमेरिका और इसराइल अब भी सहयोगी हैं?
गठबंधन को बचाए रखने के लिए नीति-निर्माताओं को इसका महत्व साबित करना होगा और इसराइल के बारे में फैलाए जा रहे सरासर झूठे आरोपों का जवाब देना होगा।
जिम हैनसन मिडिल ईस्ट फ़ोरम (Middle East Forum) के मुख्य रणनीतिकार हैं। इससे पहले उन्होंने अमेरिकी सेना के स्पेशल फ़ोर्सेज़ में सेवा दी और दो दर्जन से अधिक देशों में आतंकवाद-रोधी, विद्रोह-रोधी और विदेशी आंतरिक रक्षा से जुड़े अभियान चलाए। वे कई किताबों के लेखक हैं, जिनमें Winning the Second Civil War - Without Firing a Shot और Cut Down the Black Flag - A Plan to Defeat ISIS शामिल हैं।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद के दौर में अमेरिका और इसराइल का गठबंधन सबसे फलदायी गठबंधनों में से एक रहा है। लेकिन कई वजहों से अब यह ख़तरे में है और अगर इस गठबंधन को जारी रखना है, तो दोनों पक्षों को इसके लिए मेहनत करनी होगी।
रिश्तों में पड़ती जा रही दरार का सबसे बड़ा कारण “ग़ज़ा नरसंहार” का आरोप है। यह एक गढ़ा हुआ अत्याचार है, लेकिन फिर भी अमेरिकी मुख्यधारा के अधिकांश मीडिया और सूचना परिदृश्य में यह एक स्थापित तथ्य की तरह मौजूद है। यह शायद आधुनिक समय के सबसे सफल प्रचार अभियानों में से एक है।
7 अक्टूबर 2023 को हमास के आतंकी हमले इतने भयावह थे कि उन्होंने दुनिया भर में इसराइल के लिए समर्थन की एक बड़ी लहर पैदा कर दी। लेकिन तब भी हमास के समर्थन में आवाज़ें उठीं—जैसे कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर रसेल रिकफ़ोर्ड (Russell Rickford) की, जिन्होंने कहा कि वे “रोमांचित” हैं, और आगे जोड़ा: “हमास ने क्या किया है? हमास ने शक्ति संतुलन बदल दिया है। हमास ने अजेयता के भ्रम को छेद दिया है। यही उन्होंने किया है।”
जनता की नज़र में इसराइल के लिए ‘ग्रेस पीरियड’ मुश्किल से तब तक चला, जब तक उसने हमास के हमले का जवाब उस सैन्य ताक़त से नहीं दिया जो सीमा पर बैठे ऐसे दुश्मन को जड़ से उखाड़ने के लिए ज़रूरी थी, जो इसराइल के विनाश पर आमादा है। जैसे ही ऐसे प्रतिद्वंद्वी के ख़िलाफ़ शहरी युद्ध की हक़ीक़त पूरी तरह सामने आई—जिसकी मुख्य रणनीति अपने ही नागरिकों को चारे की तरह इस्तेमाल करना थी—राय तेज़ी से पलट गई और जनवरी 2024 तक अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने इस पर सुनवाई कर ली कि क्या इसराइल की कार्रवाइयाँ नरसंहार के दायरे में आती हैं। बीबीसी ने नतीजा यह बताया: “संयुक्त राष्ट्र की शीर्ष अदालत ने इसराइल को आदेश दिया है कि वह ग़ज़ा में नरसंहार जैसी कार्रवाइयों को रोकने के लिए सभी उपाय करे, लेकिन उसने युद्ध रोकने के लिए कहने से परहेज़ किया।”
इसके बाद के महीनों में वैश्विक समुदाय में मौजूद इसराइल के अनेक दुश्मनों के बीच यह धारणा और पक्की हुई और अमेरिका में बड़े प्रदर्शनों को भी बढ़ावा मिला। यह आम समझ बन गई कि भले ही हमास ने एक भयानक काम किया हो, युद्ध अपराध इसराइल कर रहा है।
यह कथानक सरासर झूठा है, लेकिन इसने इसराइल की आलोचना को मुख्यधारा में पहुँचा दिया। इसकी शुरुआत फ़लस्तीनी-समर्थक और क्रांतिकारी राजनीतिक वामपंथ से हुई, लेकिन यह तेज़ी से फैल गया। इस सुर में अप्रत्याशित आवाज़ें अमेरिकी राजनीतिक दक्षिणपंथ के हाशिये से भी आईं—टकर कार्लसन, मेगन केली और कई अन्य पॉडकास्टरों जैसे लोग, जिनकी इसराइल से नापसंदगी यहूदी-विरोध का एक पतला पर्दा भर है।
ग़ज़ा नरसंहार के दावे के साथ जल्द ही कई और खारिज हो चुके आरोप भी जुड़ गए, जैसे 1967 में USS लिबर्टी पर हमला और यह दावा कि इसराइल ने अमेरिका को पहले खाड़ी युद्ध में घसीटा। इनके साथ नफ़रत भड़काने के लिए गढ़े गए हर तरह के यहूदी-विरोधी झूठ की घिनौनी वापसी भी देखी गई।
अचानक ज़ायनवाद-विरोधी होने का दावा करना और साथ ही सबसे घटिया झूठ उगलना फ़ैशन और ‘एजी’ होने की बात बन गया। इससे कई नतीजे निकले, जिनमें कम जानकारी रखने वाले मीडिया उपभोक्ताओं द्वारा इसका बहुत बड़ा हिस्सा स्वीकार कर लिया जाना शामिल है। लेकिन दूसरा नतीजा उन रूढ़िवादियों की ओर से इसके ख़िलाफ़ प्रतिक्रिया के रूप में सामने आया जो दिमाग़ के इस संक्रमण में साझीदार नहीं हैं: द वॉशिंगटन पोस्ट ने लिखा, “(टकर) कार्लसन ने हाल ही में श्वेत राष्ट्रवादी निक फ़्यूएंटेस को अपने पॉडकास्ट पर बुलाया और यहूदियों के बारे में अपने मेहमान की कट्टर टिप्पणियों को चुनौती नहीं दी, जिससे जायज़ आक्रोश की झड़ी लग गई।”
पहला नतीजा ज़्यादा चिंताजनक है। प्यू रिसर्च सेंटर के अनुसार, इसराइल और अमेरिका-इसराइल गठबंधन को लेकर लोकप्रिय भावना अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुँच गई है। सेंटर ने अप्रैल 2026 में बताया: “दस में से छह अमेरिकी इसराइल के बारे में बहुत या कुछ हद तक प्रतिकूल राय रखते हैं, जो पिछले साल से सात प्रतिशत अंक और 2022 से क़रीब बीस अंक अधिक है। इसराइल के बारे में बहुत प्रतिकूल राय रखने वाले अमेरिकी वयस्कों का हिस्सा (28 प्रतिशत) भी पिछले साल से नौ अंक बढ़ा है—और 2022 के 10 प्रतिशत से लगभग तीन गुना हो गया है।”
ये भावनाएँ युवा अमेरिकियों में और भी ज़्यादा तीखी हैं, जिनमें 70 प्रतिशत तक यह स्वीकार करते हैं कि इसराइल के बारे में उनकी राय प्रतिकूल है। इसे ठीक करने में मेहनत लगेगी। ईरान युद्ध के नतीजे का असर होगा, लेकिन मौजूदा रिश्ते के लिए एक नया तर्क या व्याख्या पेश करनी होगी, ताकि यह दिखाया जा सके कि इसराइल के साथ गठबंधन अमेरिकी हित में क्यों है।
यह कठिन लड़ाई होगी। शिक्षा व्यवस्था के बड़े हिस्से में साफ़ तौर पर इसराइल-विरोधी पूर्वाग्रह है, जिसकी वजह से इसराइल की स्थापना और यहूदी राष्ट्र को मिटाने की पिछले पचहत्तर से अधिक वर्षों की फ़लस्तीनी कोशिशों की ऐतिहासिक समझ का अभाव पैदा हुआ है। अमेरिकी शिक्षा व्यवस्था को K-12 और माध्यमिक, दोनों स्तरों के स्कूलों में इसका मुक़ाबला करना शुरू करना होगा।
इसके अलावा, नीति-निर्माताओं को यह तर्क रखना होगा कि इसराइल एक साझेदार है, न कि आश्रित राज्य—या इससे भी बुरा, कोई दुर्भावनापूर्ण प्रभाव। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल की पहली विदेश यात्रा के दौरान जो योजना शुरू की थी, वह इसराइल के साथ अहम साझेदारी को मज़बूत करने के लिए अब भी एक कारगर ढाँचा है। खाड़ी देश ईरान युद्ध के ज़रिये अमेरिका और इसराइल—दोनों के क़रीब आए हैं और यह ट्रंप की मध्य-पूर्व संबंधी व्यापक रणनीति का मुख्य आधार रहा है।
सुरक्षा व्यवस्थाएँ महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आर्थिक और तकनीकी साझेदारियों से टिकाऊ रिश्ता बनने की संभावना और भी अधिक है। इनमें खाड़ी देशों को जितना अधिक शामिल किया जा सकेगा, आलोचकों के लिए इसराइल को अस्थिरता का कारण बताना उतना ही कठिन होगा। इस क्षेत्र को अधिक शांतिपूर्ण और सुरक्षित स्थिति की ओर आगे बढ़ाने के तरीक़ों पर कई चर्चाएँ चल रही हैं। इन्हें उजागर करना और यह दिखाना कि इनमें कई क्षेत्रीय शक्तियाँ शामिल हैं, इसराइल को लेकर बेहद अलग-अलग रायों को सामान्य बना देगा।
दरअसल यह मददगार साबित हो सकता है कि चरमपंथियों ने इसराइल और अमेरिका के साथ उसके गठबंधन के बारे में बेहद ग़लत और झूठे आरोप उगलकर अपना असली रंग दिखा दिया है। ये झूठ उन आवाज़ों को हाशिये पर डालते हैं और उस साझेदारी का असली मूल्य उजागर करते हैं, लेकिन वॉशिंगटन को यह बात कहीं अधिक व्यापक रूप से रखनी होगी, ताकि जो नकारात्मक धारणाएँ पनपी हैं, उनका मुक़ाबला किया जा सके। अगर ऐसा हो सका, तो मध्य-पूर्व में एक समृद्ध नया दौर—जिसमें इसराइल, खाड़ी देश और शायद ईरान भी शामिल हों—वाक़ई संभव दिखता है।
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