इस्लामवादी पश्चिमी धुर-वामपंथ से कट्टरवाद कैसे फैलाते हैं
नारीवादी, LGBTQ+ कार्यकर्ता और नस्लवाद-विरोधी समूह शायद यह नहीं समझते कि उनके इस्लामवादी सहयोगी उसी जीवनशैली और उन्हीं आज़ादियों के ख़िलाफ़ हैं, जिनकी वे पैरवी करते हैं।
यूवल डेविड इसराइली, अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय यहूदी समुदायों में एक अग्रणी शख़्सियत हैं। उनका फोकस ज़ायनवादी, LGBTQ, नागरिक अधिकार और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर है। वे मुख्य वक्ता, सलाहकार और कंटेंट क्रिएटर के तौर पर 40 से अधिक संगठनों को सलाह देते हैं; अमेरिका, इसराइल और अन्य देशों में राजनीतिक नेताओं के साथ पैरवी करते हैं; और अमेरिका, कनाडा व इसराइल में आयोजित कार्यक्रमों में बोलते हैं।

आज के कार्यकर्ता परिदृश्य में इस्लामवादी आंदोलन और कट्टर वामपंथी व प्रगतिशील संगठन लगातार हाथ मिला रहे हैं। यह साझेदारी न तो संयोग है और न ही हानिरहित। यूरोप, उत्तरी अमेरिका और उससे आगे भी, शरिया क़ानून थोपने के इच्छुक इस्लामवादी वैधता, मीडिया मंच और प्रभाव हासिल करने के लिए पश्चिमी वामपंथी अभियानों से ख़ुद को जोड़ लेते हैं।
ऐतिहासिक रूप से, मिस्र के मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे इस्लामवादी समूहों ने धर्मनिरपेक्ष उपनिवेशवाद-विरोधी राष्ट्रवादियों के साथ मिलकर काम किया—और सत्ता पहुँच में आते ही उन्हें किनारे कर दिया, बहुलतावाद की जगह इस्लामवादी वर्चस्व स्थापित कर दिया। आज पश्चिम में वे इसी रणनीति को दोहरा रहे हैं और ख़ुद को सामाजिक न्याय के आंदोलनों में समाहित कर रहे हैं: नस्लीय समानता, LGBTQ+ अधिकार, नारीवाद—वामपंथी ढाँचों का इस्तेमाल कर वे अपने मूलतः विपरीत लक्ष्यों को छिपाते हैं।
यह धुर-वामपंथी–इस्लामवादी गठजोड़ कोई अमूर्त धारणा नहीं है; यह प्रलेखित है और सक्रिय है। मानवविज्ञानी फ़िलिप कार्ल साल्ज़मैन (Philip Carl Salzman) जैसे विश्लेषक तथाकथित “लाल-हरे गठबंधन” का वर्णन करते हैं—जिसमें इस्लामवादी धुर-वामपंथी कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर पश्चिमी सभ्यता, पूँजीवाद, उदार लोकतंत्र और ज़ायनवाद का विरोध करते हैं, जबकि उनके अंतिम लक्ष्य एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। ज़मीनी स्तर पर यह ग़ज़ा और इसराइल को लेकर होने वाले प्रदर्शनों और उकसावे में दिखता है—जैसे ऑस्ट्रेलिया में धुर-वामपंथी प्रदर्शनों में तेज़ी, जहाँ “इस्लामवादी और हरित-मार्क्सवादी ‘प्रगतिशील’ समूह” हिंसक या चरमपंथी बयानबाज़ी के साथ एकजुट नज़र आए।
फ़्रांस में ज़्याँ-ल्यूक मेलांशों (Jean-Luc Mélenchon) की धुर-वामपंथी पार्टी ला फ़्रांस एंसूमीज़ (La France Insoumise) ने पूरी तरह फ़लस्तीनी-समर्थक रुख़ अपना लिया है। कार्यकर्ता रीमा हसन (Rima Hassan) को यूरोपीय संसद का उम्मीदवार चुनना पार्टी की उस राजनीतिक रणनीति को रेखांकित करता है जिसमें इसराइली कार्रवाइयों के लिए “नरसंहार” जैसे शब्दों का प्रयोग कर अरब-मुस्लिम मतदाताओं को लुभाया जाता है—यह बयानबाज़ी ला फ़्रांस एंसूमीज़ के हलकों में लगातार सामान्य बनती जा रही है।
अमेरिका में तथाकथित लाल-हरा गठबंधन 2024 के डेमोक्रेटिक नेशनल कन्वेंशन के आसपास चर्चा में आया। गठबंधन के प्रदर्शनों ने इस्लामवादी-झुकाव वाले समूहों (जैसे अमेरिकन मुस्लिम्स फ़ॉर पैलेस्टाइन) को धुर-वामपंथी तत्वों (जैसे स्टूडेंट्स फ़ॉर जस्टिस इन पैलेस्टाइन, डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट्स ऑफ़ अमेरिका) के साथ जोड़ा, जो इसराइल-विरोधी, ज़ायनवाद-विरोधी और कुछ मामलों में यहूदी-विरोधी उकसावे में एकजुट थे।
हालाँकि ये दोनों ख़ेमे अपने अंतिम दृष्टिकोण में भिन्न हैं—इस्लामवादी धार्मिक शासन चाहते हैं, जबकि धुर-वामपंथी धर्मनिरपेक्ष स्वप्नलोक—फिर भी पश्चिमी संस्थाओं और मूल्यों को ध्वस्त करने का लक्ष्य दोनों में साझा है। वे एक साझा शत्रु के ख़िलाफ़ सुविधा के सहयोगी हैं: पश्चिमी सभ्यता।
इस्लामवादी नेताओं ने इस रणनीति को स्वीकार किया है। प्रतिबंधित अल-मुहाजिरून समूह का संचालन करने वाले ब्रिटिश इस्लामवादी उपदेशक अंजेम चौधरी (Anjem Choudary) ने जेल में होते हुए भी टकराव का उपदेश दिया है और युवा मुसलमानों को वैचारिक युद्ध की ओर प्रेरित किया है। 2024 में उन्हें आतंकवादी संगठन का नेतृत्व करने और उत्तरी अमेरिका में इस्लामिक थिंकर्स सोसाइटी को ऑनलाइन व्याख्यानों के ज़रिये हिंसा के लिए उकसाने पर आजीवन कारावास की सज़ा मिली। चौधरी के जेल में होने के बावजूद इस्लामवादी-संबद्ध समूह वामपंथी एजेंडों को अपनाकर अपनी रणनीति जारी रखे हुए हैं। काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस (CAIR) जैसे संगठन प्रगतिशीलता की ओर मुड़ गए हैं और ब्लैक लाइव्स मैटर तथा जेल सुधार जैसे मुद्दों को अपनाकर उदारवादी गठबंधनों में अपनी जगह मज़बूत कर रहे हैं, साथ ही अपनी चरमपंथी जड़ों को छिपा रहे हैं।
यूरोप में, फ़्रांसीसी ख़ुफ़िया एजेंसियों ने हाल ही में मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़े फ़ोरम ऑफ़ यूरोपियन मुस्लिम यूथ एंड स्टूडेंट ऑर्गनाइज़ेशंस (Forum of European Muslim Youth and Student Organizations) को उन इस्लामवादी नेताओं के प्रशिक्षण स्थल के रूप में चिह्नित किया, जो इस्लामोफ़ोबिया और धार्मिक स्वतंत्रता की मुख्यधारा की पैरवी के पीछे छिपे रहते हैं। वे व्यापक और पक्षपाती घृणा-भाषण क़ानूनों के ज़रिये वैध अभिव्यक्ति पर अंकुश लगाने का दबाव बनाते हैं, जबकि “यूरोपीय मूल्यों” और प्रवास-नियंत्रण का विरोध करते हैं।
उभरता राजनीतिक परिदृश्य चेतावनी के संकेत दे रहा है। अमेरिकी कांग्रेस में मुस्लिम ब्रदरहुड टेररिस्ट डेज़िग्नेशन ऐक्ट ऑफ़ 2025 पारित कराने की कोशिशें यह दिखाती हैं कि दोनों दलों में यह चिंता है कि ब्रदरहुड एक सुसंगत वैचारिक ख़तरा है, जिसकी जड़ें पश्चिम-विरोधी भावना में हैं और जिससे हमास जैसे चरमपंथी समूह पैदा होते हैं।
वामपंथी कार्यकर्ता—चाहे अकादमिक हों, ट्रेड यूनियन से जुड़े हों या नैतिक न्याय के पैरोकार—अक्सर अनजाने में साझेदार बन जाते हैं, साझा तात्कालिक मुद्दों से खिंचे चले आते हैं, पर ‘लॉन्ग गेम’ नहीं देख पाते। नारीवादी पैरोकार, LGBTQ+ कार्यकर्ता या नस्लवाद-विरोधी संगठन शायद यह नहीं समझ पाते कि उनके इस्लामवादी सहयोगी उसी जीवनशैली और उन्हीं आज़ादियों के विरोधी हैं, जिनकी वे पैरवी करते हैं। सुधारवादी मुस्लिम आवाज़ें, जैसे क्विलियम फ़ाउंडेशन (Quilliam Foundation) के माजिद नवाज़ (Maajid Nawaz), चेतावनी देते हैं कि “इस्लामवादियों की दिलचस्पी बहुलतावाद में नहीं है। उनकी दिलचस्पी सत्ता में है।” साझा पीड़ित-भाव या उपनिवेशवाद-विरोधी बयानबाज़ी का वामपंथी महिमामंडन इस्लामवादियों को एक आवरण देता है, जिसे पर्याप्त प्रभाव मिलते ही वे उतार फेंकेंगे।
अंततः यह गठबंधन टिकाऊ नहीं है। इतिहास—ईरान की 1979 की क्रांति से, जहाँ इस्लामवादी शक्तियों ने कभी सहयोगी रहे वामपंथियों का सफ़ाया कर दिया, मिस्र के मुस्लिम ब्रदरहुड के धर्मनिरपेक्ष क्रांतिकारियों के ख़िलाफ़ मुड़ जाने तक—दिखाता है कि जैसे ही इस्लामवादियों को जीत का आभास होता है, वे अपने साझेदारों को किनारे कर देते हैं। जो लोग आज वामपंथी मोर्चे पर रहकर इस्लामवादी आख्यानों को बल दे रहे हैं, उनके भी असुरक्षित या दमित छोड़ दिए जाने की संभावना है।
काम केवल इस्लामवादी चरमपंथ की आलोचना करना नहीं है, बल्कि वामपंथी हलकों में वैचारिक जागरूकता पैदा करना है। कार्यकर्ताओं को यह सवाल पूछना चाहिए कि इस्लामवादी-झुकाव वाले समूहों के साथ एकजुटता उन उद्देश्यों की मदद करती है या अंततः नुक़सान पहुँचाती है, जिनकी वे पैरवी करने का दावा करते हैं। लोकतंत्र, मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्ध उदार समाजों को ऐसे गठबंधनों को बर्दाश्त नहीं करना चाहिए, जो इन्हीं बुनियादों को खोखला करते हैं।
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