रेज़ा पहलवी ईरान कैसे लौटेंगे और क्या वहाँ जीवित रह पाएँगे
ईरान वापसी ख़तरों से भरी होगी, जैसा सद्दाम के पतन के समय हुआ था जब एक भीड़ ने शिया धर्मगुरु अब्दुल मजीद अल-ख़ूई की हत्या कर दी थी।
माइकल रुबिन ईरान, तुर्की और हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका के विशेषज्ञ हैं। उनके करियर में पेंटागन में अधिकारी के तौर पर काम करने का अनुभव शामिल है। इसमें ईरान, यमन और इराक़ में ज़मीनी स्तर के अनुभव के साथ-साथ 9/11 से पहले तालिबान के साथ संपर्क भी रहा है। श्री रुबिन ने सैन्य शिक्षा में भी योगदान दिया है और अमेरिकी नौसेना तथा मरीन इकाइयों को क्षेत्रीय संघर्षों और आतंकवाद के बारे में पढ़ाया है। उनके विद्वतापूर्ण काम में कई अहम प्रकाशन शामिल हैं, जैसे “Dancing with the Devil” और “Eternal Iran।” रुबिन ने येल यूनिवर्सिटी से इतिहास में पीएच.डी. और एम.ए., तथा जीव विज्ञान में बी.एस. की डिग्री हासिल की।

ईरान में प्रदर्शनों का तीसरा सप्ताह शुरू होने को है और ऐसा लगता है कि इन्होंने सत्तारूढ़ शासन को जड़ों तक हिला दिया है। ईरानी लोग ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत की मांग कर रहे हैं। तेहरान के मज़दूर-बहुल उपनगर इस्लामशहर में हमलावरों ने एक पुलिस प्रमुख की हत्या का वीडियो बनाया। दूसरे ईरानी ख़ुद मोलोटोव कॉकटेल बनाते हुए अपने वीडियो बना रहे हैं।
चाहे क्रांति-पूर्व दौर के प्रति पुरानी यादों के चलते हो या सच्चे समर्थन के कारण, बहुत से ईरानी रेज़ा पहलवी का नाम पुकार रहे हैं। पूर्व युवराज होने के नाते वह ईरानियों के लिए निस्संदेह सबसे पहचाने जाने वाले विपक्षी चेहरे हैं।
पंद्रह साल पहले, फ़्लोरिडा में एक शादी में, जिसमें मैं शामिल था, वह दूल्हे के साथी (बेस्ट मैन) थे। इस्लामी गणराज्य ईरान से शादी में आए कई ईरानियों को पता ही नहीं था कि रेज़ा पहलवी वहां होंगे। उनमें से ज़्यादातर ऐसे परिवारों से थे जो परंपरागत रूप से राजशाही का समर्थन नहीं करते थे, लेकिन उन्होंने धर्मतंत्र के तहत तकलीफ़ें झेली थीं। जब उन्होंने युवराज को देखा, तो वे घुटनों के बल बैठ गए। कई ने उनके हाथ चूमने की कोशिश की। ज़्यादातर रो पड़े।
रेज़ा पहलवी का राजनीतिक दफ़्तर अक्षम है और हाल के वर्षों में उनके सहयोगी एकता की उनकी बयानबाज़ी के बावजूद फूट डालने वाले रहे हैं। मुजाहिदीन-ए-ख़ल्क़ जैसी ट्रोलिंग की नकल एक संभावित बादशाह के लिए अच्छी छवि नहीं है। उनके और उनके शीर्ष समर्थकों के सामने एक “श्वेत रूसी” (White Russian) समस्या भी है—ऐसा लगता है कि वे ईरानियों की नई पीढ़ी तैयार करने की कड़ी मेहनत के बजाय निर्वासन का जीवन और अमेरिका तथा पश्चिमी यूरोप की यात्राएं पसंद करते हैं। फिर भी, किसी भी अन्य ईरानी के मुक़ाबले वह एक संवैधानिक, लोकतांत्रिक व्यवस्था की ओर शांतिपूर्ण संक्रमण कराने की बेहतर स्थिति में हैं, भले ही वह राजशाही न हो। ज़्यादातर ईरानी उसी चीज़ को पसंद करेंगे जिसके पहलवी प्रतीक हैं, बजाय वेनेज़ुएला जैसे संक्रमण के जो पूर्व राष्ट्रपति हसन रूहानी जैसे किसी ख़ामेनेई-सहयोगी को ताक़त दे दे।
आख़िरकार इसका मतलब यह है कि पहलवी को ईरान लौटना होगा। हालांकि अभी ऐसा करने का समय नहीं आया है—ईरानी जनता के नियंत्रण में सिर्फ़ कुछ परिधीय क़स्बे हैं—उनकी वापसी एक राजनीतिक भूकंप होगी। कई ईरानी इसे इस्लामी गणराज्य के अंतिम पतन का संकेत मानेंगे।
अब सवाल यह है कि वह ऐसा कैसे करेंगे। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों ने रेज़ा शाह—मौजूदा युवराज के दादा—को इस विश्वास के चलते निर्वासन के लिए मजबूर किया था कि उनके मन में नात्सी सहानुभूति है। मोहम्मद रेज़ा शाह ने मित्र सेनाओं के बल पर सत्ता संभाली।
इसके बाद जब राजशाही के ख़िलाफ़ प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्दिक़ की तख़्तापलट की कोशिश के दौरान मोहम्मद रेज़ा शाह भाग गए, तो वह देश तभी लौटे जब ईरानी सेना ने अमेरिकी और ब्रिटिश ख़ुफ़िया एजेंसियों के साथ मिलकर जवाबी तख़्तापलट किया।
1979 में स्थिति उलटी थी। शाह मिस्र भाग गए, और उसके बाद अमेरिका आए। उसके क़रीब दो हफ़्ते बाद एयर फ़्रांस आयतुल्लाह रूहुल्लाह ख़ुमैनी को तेहरान ले गया, जहां उनका ज़बरदस्त स्वागत हुआ।
हालांकि हर मामले में सत्ता का हस्तांतरण दो ईरानी दावेदारों के बीच सीधे टकराव के बिना हुआ। रेज़ा पहलवी संभवतः ख़ामेनेई के जाने का इंतज़ार कर रहे हैं। अगर ऐसा है, तो उनका सफ़री बैग तैयार होना चाहिए और उन्हें दिसंबर 2025 के आख़िर की तरह छुट्टी पर और पहुंच से बाहर नहीं पकड़ा जाना चाहिए।
लेकिन ईरान लौटना ख़तरों से भरा होगा। जब सद्दाम का पतन हुआ, तो एक प्रमुख आयतुल्लाह के बेटे शिया धर्मगुरु अब्दुल मजीद अल-ख़ूई पवित्र शहर नजफ़ में प्रकट हुए। उन्होंने सुलह का रुख़ अपनाया और सद्दाम-पश्चात व्यवस्था के लिए शांतिपूर्ण संक्रमण लाने की कोशिश की। ऐसा होना नहीं था। एक भीड़ उन पर टूट पड़ी—कथित तौर पर उसे तब तक अपेक्षाकृत अनजान मुक़्तदा अल-सद्र ने भड़काया था, जो एक और प्रमुख आयतुल्लाह के बेटे हैं—और ख़ूई को काटकर मार डाला। इराक़ी स्तब्ध रह गए, और अमेरिकी उससे भी ज़्यादा।
पहलवी जब ख़ामेनेई के जाने (या मरने) से पहले या बाद ईरान लौटने की योजना बना रहे हैं, तो अब सवाल यह है कि क्या और कैसे अमेरिका तथा दूसरे क्षेत्रीय देश उन्हें उन विचारधारावादियों से बचाएंगे जो धर्मतंत्र के पतन पर कुढ़ रहे हैं।
इसके आसान जवाब नहीं हैं, लेकिन जैसे-जैसे शासन डगमगा रहा है, कठिन चर्चा शुरू करने का समय आ गया है, क्योंकि वापसी पर पहलवी की हत्या ऐसी अराजकता भड़का सकती है जिसके सामने इराक़ी विद्रोह शांत दिखाई देगा।
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