क्या ईरान राज्य-विफलता की ओर बढ़ रहा है?
शासन अब भी केंद्र पर पकड़ बनाए रख सकता है, लेकिन केंद्र पर पकड़ और राज्य की क्षमता बनाए रखना एक ही बात नहीं है।
उमुद शोकरी वॉशिंगटन, डी.सी. में स्थित ऊर्जा रणनीतिकार और विदेश नीति सलाहकार हैं। उन्हें ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु नीति और वैश्विक ऊर्जा संक्रमण के क्षेत्र में दो दशक से अधिक का अनुभव है।

28 फ़रवरी 2026 के अमेरिकी और इसराइली हवाई हमलों ने अभी इस्लामी गणराज्य ईरान का अंत नहीं किया है, लेकिन उन्होंने ईरानी राज्य की शासन-क्षमता को ज़रूर कमज़ोर किया है। राज्य-विफलता सिर्फ़ तब शुरू नहीं होती जब शासन-तंत्र ढह जाए, बल्कि तब शुरू होती है जब सरकारें बुनियादी ढाँचे की सुरक्षा करने, राजस्व जुटाने, व्यापार को चलता रखने, संस्थानों के बीच समन्वय करने और बुनियादी सेवाएँ मुहैया कराने की क्षमता खो देती हैं। ईरान इस संकट में पहले से ही भारी दबाव के साथ दाख़िल हुआ। विश्व बैंक ने बढ़ते प्रतिबंध दबाव, बढ़ती महँगाई, ऊर्जा और पानी की कमी, और बुनियादी ढाँचे की ऐसी बाधाओं के बारे में चेताया था, जो आर्थिक गतिविधि को बाधित करने के लिए काफ़ी गंभीर थीं। इन हालात ने राज्य के पास किसी बड़े बाहरी झटके को झेलने की बहुत कम गुंजाइश छोड़ी थी। अब ये हमले अहम प्रणालियों को नुक़सान पहुँचाकर और रोज़मर्रा के शासन की लागत बढ़ाकर उस नाज़ुक स्थिति को और बढ़ा रहे हैं।
पहला दबाव-बिंदु बुनियादी ढाँचे की क्षमता है। ईरान की तेल और गैस प्रणाली कुछ चुनिंदा, खुले तौर पर उजागर परिसंपत्तियों पर निर्भर है। ईरान रोज़ाना क़रीब 3.3 मिलियन बैरल कच्चा तेल और 1.3 मिलियन बैरल कंडेनसेट तथा अन्य तरल पदार्थ पैदा करता है; तेल उत्पादन ख़ूज़ेस्तान में केंद्रित है और गैस उत्पादन साउथ पार्स के आसपास बुशेहर में। यह भी उल्लेख किया गया है कि ईरान के कच्चे तेल के निर्यात का लगभग 90 प्रतिशत ख़ार्ग द्वीप से होकर और फिर होर्मुज़ जलडमरूमध्य के रास्ते जाता है। इस तरह का केंद्रीकरण राज्य को बहुत कम वैकल्पिक व्यवस्था देता है। जब हमले या विश्वसनीय धमकियाँ निर्यात, रिफ़ाइनिंग और कमान के कुछ गिने-चुने केंद्रों को निशाना बनाती हैं, तो इससे ऊर्जा की आवाजाही, उद्योग को सहारा देने और मरम्मत का समन्वय करने की राज्य की क्षमता कमज़ोर पड़ जाती है। कुछ अहम अवरोध-बिंदुओं के इर्द-गिर्द खड़ी व्यवस्था व्यवधान तभी झेल सकती है, जब उसके पास वैकल्पिक रास्ते, अतिरिक्त पूँजी और तेज़ मरम्मत-क्षमता हो। ईरान के पास ये तीनों ही सीमित हैं।
दूसरा दबाव-बिंदु राजकोषीय क्षमता है। राज्य अपनी परिसंपत्तियों को अनुमानित, नियमित राजस्व में बदलकर टिके रहते हैं। ईरान अब भी तेल निर्यात करता है, लेकिन प्रतिबंधों ने पहले ही उसे रियायती बिक्री, सीमित ग्राहक आधार और नाज़ुक जहाज़रानी व्यवस्थाओं पर निर्भर बना दिया था। संभावित व्यवधान से बचाव के लिए ईरान ने समुद्र में मौजूद टैंकरों पर रिकॉर्ड स्तर तक कच्चा तेल और कंडेनसेट जमा कर लिया था। जो सरकार स्थिर निर्यात प्रवाह पर भरोसा नहीं कर सकती, वह बजट के समय-निर्धारण, सब्सिडी योजना, आयात के वित्तपोषण और आपात ख़र्च पर नियंत्रण खो देती है। विश्व बैंक के ताज़ा आकलन में पहले ही अनुमान लगाया गया था कि वित्त वर्ष 2026–27 में, जैसे-जैसे प्रतिबंध और व्यापार-प्रतिबंध सख़्त होते जाएंगे, ईरान की अर्थव्यवस्था सिकुड़ेगी। हमले परिवहन, बीमा और भुगतान-निपटान पर जोखिम प्रीमियम बढ़ाकर इस अनुमान को और बिगाड़ देते हैं। जैसे-जैसे राजस्व कम भरोसेमंद होता जाता है, राज्य के लिए वेतन देना, क्षतिग्रस्त बुनियादी ढाँचे की मरम्मत करना, ज़रूरी इनपुट आयात करना और क़ीमतों के झटकों को थामना कठिन होता जाता है।
तीसरा दबाव-बिंदु लॉजिस्टिक क्षमता है। हमलों और ईरान की जवाबी कार्रवाई के बाद ईरान, इराक़, कुवैत, इसराइल और बहरीन के ऊपर का वाणिज्यिक हवाई क्षेत्र बड़े पैमाने पर ख़ाली हो गया, क्योंकि यूरोप, फ़ारस की खाड़ी और एशिया की एयरलाइनों ने उड़ानें स्थगित कर दीं या मार्ग बदल दिए। यह सिर्फ़ यात्री यात्रा का मामला नहीं है। इससे दिखता है कि संघर्ष कितनी तेज़ी से परिवहन-समन्वय, बीमा गणनाओं और क्षेत्रीय आवाजाही को बाधित कर सकता है। प्रतिबंधों से जकड़ी अर्थव्यवस्था में राज्य को पहले ही औद्योगिक इनपुट जुटाने, माल ढोने और स्वीकार्य लागत पर देरी झेलने में मुश्किल आती है। जब युद्ध पूरे क्षेत्र में परिवहन को और उलझा देता है और लेन-देन की लागत बढ़ा देता है, तो सरकार को कम माल पहुँचाने के लिए ज़्यादा प्रयास करने पड़ते हैं। इससे आपूर्ति शृंखलाओं के प्रबंधन, बाज़ारों को स्थिर रखने और रोज़मर्रा के प्रशासन को चलाए रखने की उसकी क्षमता घटती है। राज्य सिर्फ़ तब विफल नहीं होते जब वे भूभाग खो देते हैं, बल्कि तब भी जब वे सामान्य प्रणालियों को कामयाब ढंग से चलाने की लॉजिस्टिक क्षमता गंवा देते हैं।
चौथा दबाव-बिंदु प्रशासनिक क्षमता है। 2025 में ईरानी रियाल अपने मूल्य का लगभग आधा खो चुका था। जनवरी 2026 में विरोध प्रदर्शन फैल गए, क्योंकि कारोबारियों को औपचारिक संस्थाएँ बेअसर लगने लगीं, जबकि अर्थव्यवस्था के अहम क्षेत्रों पर अधिक सुरक्षा-आधारित नेटवर्कों का वर्चस्व दिखा। जब मंत्रालय न तो क़ीमतें स्थिर कर पाते हैं, न व्यापार का नियमन कर पाते हैं, और न ही दुर्लभ संसाधनों का लगातार, एकरूप तरीके से आवंटन कर पाते हैं, तो राज्य नियमित प्रशासन के बजाय तदर्थ उपायों के सहारे ज़्यादा शासन करने लगता है। बाहरी सैन्य दबाव आम तौर पर इस प्रवृत्ति को और गहरा करता है। हमले की स्थिति में तेहरान नागरिक नौकरशाही की क्षमता दोबारा खड़ी करने के बजाय सुरक्षा प्रबंधन और आपात नियंत्रण को प्राथमिकता देगा।
पाँचवाँ दबाव-बिंदु सेवाएँ मुहैया कराने की क्षमता है। हवाई हमलों से पहले भी विश्व बैंक ने चेताया था कि ईरान की ऊर्जा कमी, पानी का दबाव और बुनियादी ढाँचे की कमज़ोरियाँ आर्थिक गतिविधि को बाधित कर रही हैं। ताज़ा हमले इन बोझों को और बढ़ाते हैं। जब निर्यात-राजस्व कमज़ोर पड़ता है, परिवहन महँगा होता है और राज्य के ज़्यादा संसाधन संकट-प्रबंधन में झोंकने पड़ते हैं, तो सरकार के पास खाद्य क़ीमतों में उछाल, दवाओं की कमी, बिजली आपूर्ति में व्यवधान और मरम्मत लागत का असर कम करने की गुंजाइश घट जाती है। राज्य शायद ही कभी एक साथ अपने सारे कामकाज खो देते हैं। वे तब कमज़ोर होते हैं, जब वे सामान्य काम भरोसेमंद ढंग से करना बंद कर देते हैं। अस्पताल चलते रहते हैं, लेकिन कम आपूर्ति के साथ। बाज़ार खुले रहते हैं, लेकिन कम स्थिरता के साथ। मंत्रालय आदेश जारी करते रहते हैं, लेकिन अमल कमज़ोर होता है। व्यावहारिक तौर पर राज्य-विफलता इसी तरह आगे बढ़ती है: किसी एक नाटकीय ढहाव से नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की क्षमता के क्रमिक क्षरण से।
इसलिए, विफल-राज्य जैसी गतिकी में और गहराई तक जाने के लिए ईरान को तत्काल शासन-पतन का सामना करना ज़रूरी नहीं है। अहम सवाल यह नहीं है कि राज्य अब भी बल प्रयोग कर सकता है या नहीं। सवाल यह है कि क्या वह अब भी प्रभावी ढंग से शासन कर सकता है। 28 फ़रवरी 2026 के बाद यह क्षमता और कमज़ोर दिखती है। हमलों ने केंद्रित बुनियादी ढाँचे को नुक़सान पहुँचाया, राजकोषीय दबाव बढ़ाया, लॉजिस्टिक्स बाधित किया और राज्य को अधिक प्रतिक्रियात्मक तथा कम प्रभावी प्रशासन की ओर धकेला। शासन-तंत्र शायद अब भी केंद्र पर पकड़ बनाए रखे, लेकिन केंद्र पर पकड़ बनाए रखना और राज्य-क्षमता को बनाए रखना एक ही बात नहीं है। अगर यही रुझान जारी रहा, तो ईरान राजनीतिक रूप से बरक़रार रहते हुए भी राजकोषीय रूप से और पतला, प्रशासनिक रूप से और कमज़ोर, तथा कार्यात्मक रूप से और कम सक्षम होता जा सकता है। राज्य इसी तरह विफल होना शुरू करते हैं।
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