मलेशिया में हमास के गढ़ों से निपटें इसराइल और भारत
मलेशिया की 60 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है, और यहूदी-विरोध तथा इसराइल से नफ़रत हमास के लिए समर्थन को हवा दे रहे हैं।
अभिनव पांड्या उसानास फ़ाउंडेशन (Usanas Foundation) के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं, जो भारत की विदेश नीति और सुरक्षा पर काम करने वाली संस्था है।

जनवरी 2024 में मैंने एक वरिष्ठ इसराइली राजनयिक से उन रिपोर्टों के बारे में पूछा कि ग़ज़ा में सैन्य कार्रवाई की वजह से हमास के कुछ नेता मलेशिया जा रहे हैं। उन्होंने जवाब दिया, “हमारे लिए अच्छा और आपके लिए बुरा। … मलेशिया हमसे बहुत दूर है।” हालांकि, हमास का ख़तरा ‘या तो-या’ का सवाल नहीं है; हमास जहाँ भी सुरक्षित पनाह पाता है, ख़तरा पैदा करता है। इसराइल और भारत, और दरअसल सभी लोकतंत्रों का साझा हित मलेशिया की आतंक के प्रति बढ़ती दरियादिली का सामना करने में है। इसमें कोई शक न रहे: मलेशिया आतंक का प्रायोजक नहीं तो कम-से-कम उसका जयघोष करने वाला बनता जा रहा है।
इसराइल-मलेशिया रिश्ते हमेशा इतने तनावपूर्ण नहीं रहे। इसराइल ने 1957 में ग्रेट ब्रिटेन से मलेशिया की आज़ादी का समर्थन किया, संयुक्त राष्ट्र में इस नए देश के प्रवेश का समर्थन किया और उसके साथ व्यापार किया। हालांकि, मलेशिया के पहले प्रधानमंत्री तुंकू अब्दुल रहमान (Tunku Abdul Rahman) इस्लामवादी थे और उन्होंने यहूदी राष्ट्र से मुँह मोड़ लिया। मलेशिया दक्षिण एशिया का पहला देश था जिसने फ़लस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) को पूर्ण राजनयिक मान्यता दी। 1980 और 1990 के दशक में कुआलालंपुर की यात्राओं के दौरान यासर अराफ़ात ने इस दक्षिण-पूर्व एशियाई देश को अरब देशों से ऊपर रखा। तब से मलेशिया संयुक्त राष्ट्र में फ़लस्तीन के पक्ष में पैरवी करता रहा है और फ़लस्तीनी संगठनों को मानवीय सहायता देता रहा है। प्रधानमंत्री नजीब रज़ाक (2009-2018) ने हमास से रिश्ते विकसित किए और 2013 में ग़ज़ा पट्टी का दौरा तक किया। आज मलेशिया फ़लस्तीनियों के लिए 17 मिलियन डॉलर का एक ट्रस्ट चलाता है।
आज की तारीख़ में मलेशिया हमास को ग़ज़ावासियों का वैध और निर्वाचित प्रतिनिधि मानता है। 7 अक्टूबर, 2023 के हमलों के बाद प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम इसराइल के सबसे कठोर आलोचकों में से एक बनकर उभरे हैं और उन्होंने यरुशलम की सैन्य कार्रवाई को “बर्बरता की पराकाष्ठा” कहा। दशकों से मलेशिया इसराइली पासपोर्टधारकों के लिए देश में प्रवेश के वास्ते मलेशिया के गृह मंत्रालय से लिखित अनुमति लेना अनिवार्य करता आया है।
जातीय मलय मुसलमान मलेशिया की आबादी का 60 प्रतिशत हैं। हालांकि कई भारतीय सुरक्षा विश्लेषक और रणनीतिक विचारक मलेशिया को एक सहिष्णु और शांतिपूर्ण इस्लामी देश के रूप में देखते रहते हैं, जो अपनी हिंदू विरासत को सहेजता और मनाता है, लेकिन यह नज़रिया मलय समाज में आए कट्टरपंथीकरण की अनदेखी करता है। मलेशिया की विदेश नीति इस इस्लामवादी आबादी की प्रवृत्तियों को प्रतिबिंबित करती है और इस्लामी एकजुटता को बढ़ावा देने की कोशिश करती है। हमास के हमलों के तुरंत बाद सऊदी अरब, मिस्र, संयुक्त अरब अमीरात और ईरान के अपने तूफ़ानी दौरे में इब्राहिम ने फ़लस्तीनियों के समर्थन में इस्लामी सहयोग संगठन की आपातकालीन बैठक बुलाने की वकालत की।
यहूदी-विरोध और इसराइल से अतार्किक नफ़रत मलेशिया के हमास-समर्थन को धार देती है। बड़े पैमाने पर फ़लस्तीन-समर्थक सड़क प्रदर्शन आम हैं; इब्राहिम ने एक की अगुवाई की। लोगों ने मैकडॉनल्ड्स जैसे फ़ास्ट-फ़ूड प्रतिष्ठानों का बहिष्कार किया, जिन्हें वे इसराइल और अमेरिका से जुड़ा मानते थे। जैसे पाकिस्तान में और अब बांग्लादेश में, वैसे ही राजनेता जातीय मलय लोगों को एकजुट करने के लिए धार्मिक पहचान का इस्तेमाल करना चाहते हैं। व्यवहार में इसका मतलब है इस्लामवादी साख को मज़बूत करना, पश्चिम-विरोधी आख्यान गढ़ना और ग़ैर-मुस्लिमों को इस्लाम के लिए ख़तरे के रूप में पेश करना। यह अलग-अलग रूपों में नीचे तक रिसता है। मिसाल के तौर पर, हमास के हमलों पर इसराइली जवाबी कार्रवाई के बाद इब्राहिम के शिक्षा मंत्रालय ने स्कूलों और कॉलेजों में फ़लस्तीनी एकजुटता सप्ताह कार्यक्रम आयोजित किया।
मलेशिया की इसराइल-विरोधी और इस्लामवाद-समर्थक ताक़तें अब खुलेआम मलेशिया को आतंक की सुरक्षित पनाहगाह बनने दे रही हैं। हमास ने 2010 में 15 सदस्यों को एक सप्ताह के पैराग्लाइडिंग प्रशिक्षण के लिए मलेशिया भेजा था। क़तरियों द्वारा हमास नेतृत्व को देश छोड़ने के लिए मजबूर किए जाने के बाद हमास के कई प्रमुख नेता मलेशिया चले गए, जबकि कुछ अन्य ने ईरान, रूस और तुर्की को चुना। हमास की सैन्य शाखा मलेशिया से अभियान चलाती रही है, हालांकि अब इसके परिणाम भी भुगतने पड़ते हैं। 2018 में आत्मघाती ड्रोन और रॉकेट प्रणालियों के हमास विशेषज्ञ फ़ादी मोहम्मद अल-बतश (Fadi Mohammad Al-Batash) की मलेशिया में गोली मारकर हत्या कर दी गई। मलेशिया स्थित सुरक्षा विश्लेषक नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि हमास और हिज़्बुल्लाह दोनों स्थानीय स्तर पर अपनी मज़बूत पैठ जारी रखे हुए हैं।
कुछ इसराइली मान सकते हैं कि दूरी की वजह से मलेशिया में जो होगा, वह मलेशिया में ही रह जाएगा, लेकिन यह घातक ग़लतफ़हमी साबित हो सकती है। हमास संसाधन जुटाने और ख़ुद को फिर से खड़ा करने के लिए मलेशिया को एक अहम ठिकाने के रूप में इस्तेमाल करेगा। और यह वह अकेले नहीं करेगा। पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज़ इंटेलिजेंस (ISI) एजेंसी मलेशिया में सक्रिय मौजूदगी बनाए रखती है और हमास के साथ तालमेल करती है।
मलेशिया की आतंक के प्रति ढिलाई से ख़तरे में पड़ने वाला अकेला देश इसराइल नहीं है। ISI मलेशिया को कश्मीरी जिहादी गुटों के समर्थन और बैठकें करने के अड्डे के रूप में इस्तेमाल करती है। जम्मू-कश्मीर के शासन को केंद्र शासित प्रदेश के रूप में सामान्य बनाने के लिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद मलेशिया तुर्की और पाकिस्तान के साथ भारत के सबसे कट्टर आलोचकों में से एक बनकर उभरा। तीनों देशों ने औपचारिक रूप से एक वैश्विक इस्लामी टेलीविज़न चैनल बनाने की घोषणा की। ग़ौरतलब है कि कश्मीरी जिहादियों के साथ हमास के बढ़ते रिश्ते और पॉपुलर फ़्रंट ऑफ़ इंडिया जैसे भारतीय इस्लामवादी संगठनों तक उसकी पहुँच, मलेशिया में हमास की मज़बूत होती मौजूदगी को नई दिल्ली के लिए चिंता का विषय बनाती है।
निस्संदेह, भारत और इसराइल को अपने आतंक-विरोधी सहयोग को और आगे बढ़ाना चाहिए। लेकिन मलेशिया में फ़लस्तीनी आतंकी गुटों का मुक़ाबला करना सिर्फ़ किसी विदेशी हित का मामला नहीं होना चाहिए; यह मलेशिया का अपना हित भी होना चाहिए। क़तर और तुर्की जैसे देश हमास को खुली छूट देने के कारण साख के मोर्चे पर नुकसान उठाते हैं। आतंकवादियों को सुरक्षित पनाह देने से लेबनानी, ईरानी और पाकिस्तानी सुरक्षा कमज़ोर हुई है और निवेशक अस्थिरता, हिंसा या प्रतिबंधों के डर से भागे हैं। 77 साल की उम्र में इब्राहिम शायद आतंक-समर्थक नीतियों पर चलने के नतीजे न देख पाएं, लेकिन मलेशियावासी निस्संदेह उसका ख़ामियाज़ा भुगतेंगे।
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