ईरान में तुर्की की दख़लअंदाज़ी रोकी जाए
तुर्की लंबे समय से ईरान में जातीय अलगाववाद को बढ़ावा देता रहा है और अब वह ईरान के भीतर एक ‘बफ़र ज़ोन’ बनाने की कोशिश कर सकता है, जो आगे चलकर ज़मीन हड़पने में बदल सकता है।
माइकल रुबिन ईरान, तुर्की और हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका के विशेषज्ञ हैं। उनके करियर में पेंटागन में अधिकारी के तौर पर काम करने का अनुभव शामिल है। इसमें ईरान, यमन और इराक़ में ज़मीनी स्तर के अनुभव के साथ-साथ 9/11 से पहले तालिबान के साथ संपर्क भी रहा है। श्री रुबिन ने सैन्य शिक्षा में भी योगदान दिया है और अमेरिकी नौसेना तथा मरीन इकाइयों को क्षेत्रीय संघर्षों और आतंकवाद के बारे में पढ़ाया है। उनके विद्वतापूर्ण काम में कई अहम प्रकाशन शामिल हैं, जैसे “Dancing with the Devil” और “Eternal Iran।” रुबिन ने येल यूनिवर्सिटी से इतिहास में पीएच.डी. और एम.ए., तथा जीव विज्ञान में बी.एस. की डिग्री हासिल की।

आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई, ईरान के सर्वोच्च नेता, की मौत की पुष्टि होते ही ईरानी सड़कों पर नाच रहे हैं। 2 महीने से भी कम वक्त में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया के 2 सबसे ख़राब तानाशाहों को ख़त्म कर दिया है। वेनेज़ुएला में न्यूनतम निवेश के बाद अब वह ईरान में भी वही मॉडल दोहराने के लिए उत्सुक दिखते हैं। इस्लामी गणराज्य ईरान ने ख़ुद एक अंतरिम नेतृत्व परिषद बनाई है, लेकिन हैरानी की बात है कि अमेरिका और इसराइल ने तीन वरिष्ठ ईरानी नेताओं को अछूता छोड़ दिया है। अमेरिका या इसराइल ने पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद और सर्वोच्च नेता के बेटे तथा विश्वासपात्र मोजतबा को मार डाला, जबकि पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद ख़ातमी और हसन रूहानी के साथ-साथ सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रमुख अली लारीजानी ज़िंदा हैं, शायद जान-बूझकर।
अगर ट्रंप इन तीनों में से किसी एक को वेनेज़ुएला जैसी अंतरिम सत्ता का मुखिया बनाना चाहते हैं, तो अमेरिका और इसराइल को निराशा हाथ लगेगी। ख़ातमी ईरान के भीतर से ज़्यादा बाहर लोकप्रिय हैं। रूहानी शासन के वफ़ादार हैं और उसी ईरानी परमाणु कार्यक्रम के लिए काफी हद तक ज़िम्मेदार हैं, जिसे ट्रंप ख़त्म करना चाहते हैं। लारीजानी ख़ामेनेई के सलाहकार थे, अगर उनके दाहिने हाथ नहीं तो भी। जिन ईरानी लोगों ने यह क्रांति शुरू की है, वे न तो रुकेंगे और न ही पुराने शासन के नेताओं पर भरोसा करेंगे, उनके अधीन होना तो दूर की बात है।
यह भी स्पष्ट नहीं है कि पूर्व युवराज रेज़ा पहलवी नियंत्रण मज़बूत कर पाएंगे या नहीं, भले ही उन्हें इसराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और शायद राष्ट्रपति ट्रंप तक का समर्थन मिलता दिख रहा है। पहलवी के साथ समस्या ख़ुद युवराज नहीं, बल्कि उनके प्रमुख सहयोगी हैं, जो आलोचना और चिंताओं को ऐसे मुद्दों के रूप में देखने के बजाय—जिन पर उन्हें विचार करना और जिनका समाधान करना चाहिए—उन्हें इनसे दूर रखते हैं। अगर पहलवी ईरान लौटते हैं, तो उनकी पीठ पर निशाना होगा। अगर वे ख़ुद को ईरानी जनता से अलग-थलग रखते हैं, तो वे सफल नहीं होंगे।
अनिश्चितता, अगर अफ़रा-तफ़री नहीं, के मंडराते साये में तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन ट्रंप और अमेरिकी राजदूत टॉम बैरक (Tom Barrack) पर अपने असर का इस्तेमाल करने की कोशिश करेंगे, जो तुर्की की बातों को पूरी तरह सही मानने की प्रवृत्ति रखते हैं।
यह कई वजहों से एक ग़लती होगी। जब भी बैरक ट्रंप को कोई तुर्की समाधान बेचते हैं, उसका अंत ख़ूनख़राबे में होता है, अगर छद्म युद्ध नहीं तो। कभी-कभी विशेषाधिकार वाला निवेश इसके लायक़ नहीं होता। दुनिया के सबसे बड़े आतंक प्रायोजक की हार जश्न का कारण होनी चाहिए, लेकिन दो विश्व नेताओं ने आधिकारिक तौर पर ख़ामेनेई के निधन पर शोक जताया: एर्दोआन और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन।
तुर्की लंबे समय से ईरान के भीतर जातीय अलगाववाद को बढ़ावा देता रहा है, ठीक वैसे ही जैसे इराक़ के दिवंगत राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन करते थे। किसी भी अलगाववादी आंदोलन का समर्थन करने का मतलब होगा ईरानियों को उन सबसे कट्टर राष्ट्रवादियों के इर्द-गिर्द एकजुट कर देना, जो इस अतिक्रमण से लड़ने को तैयार हैं। यह जल्द ही एक विकल्प में बदल जाएगा: वॉशिंगटन या तो तेहरान का साथ देगा या अंकारा का, लेकिन वह दोनों से गठजोड़ नहीं कर सकता। ऐसी नौबत से बचना अमेरिका के स्पष्ट हित में होगा।
तुर्की में अब ईरान के भीतर एक बफ़र ज़ोन बनाने पर भी बहस हो रही है। ट्रंप को इसे भी खारिज कर देना चाहिए। तुर्की के बफ़र जल्दी ही ज़मीन हड़पने में बदल जाते हैं। तुर्की पहले से ही साइप्रस, सीरिया और इराक़ के हिस्सों पर क़ब्ज़ा किए हुए है; उसकी साम्राज्यवादी प्रकृति और कभी पीछे न हटने की ज़िद को देखते हुए, कोई भी तुर्की बफ़र—ख़ासकर कुर्द आबादी वाले इलाक़ों में—कुर्दों को कट्टर बनाएगा, ईरान में किसी भी नए शासन की वैधता को कमज़ोर करेगा और दोनों पड़ोसियों को अंततः युद्ध के रास्ते पर डाल देगा।
ईरान के भविष्य का कोई जादुई फ़ॉर्मूला नहीं है। यह देश बहुस्तरीय और जटिल है। लेकिन अगर ट्रंप सुरक्षा का ज़िम्मा क्षेत्रीय देशों को सौंपना भी चाहते हैं, तो उन्हें यह समझना चाहिए कि एर्दोआन या बैरक की कानों में फुसफुसाई मीठी बातें क्षेत्रीय सुरक्षा को उलट-पुलट कर सकती हैं, इस क्षेत्र को युद्ध के रास्ते पर ले जा सकती हैं और उनकी विरासत को सुरक्षित करने के बजाय उसे नुक़सान ही ज़्यादा पहुंचा सकती हैं।
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