पहलवी ने लोकप्रियता साबित की, संगठन क्षमता नहीं
उन्हें अलग-अलग मूल्यों और कई बार टकराते हितों वाले तमाम धड़ों और पक्षों के लिए स्वीकार्य बनना होगा।
Shay Khatiri यॉर्कटाउन इंस्टिट्यूट (Yorktown Institute) में वरिष्ठ फ़ेलो और रेनी सेंटर (Rainey Center) में फ़ेलो हैं।

ईरान के भीतर पूर्व युवराज रेज़ा पहलवी (Reza Pahlavi) को मिलने वाले समर्थन पर काफ़ी चर्चा होती रही है। इस सवाल पर एकमात्र भरोसेमंद सर्वेक्षण 2 साल पुराना है, जिसमें उनकी लोकप्रियता 31 प्रतिशत आँकी गई थी और इससे वे ईरान के कहीं आगे सबसे लोकप्रिय राजनीतिक चेहरे बन गए, भले ही यह बहुमत नहीं बल्कि सापेक्ष बढ़त ही थी। हाल की घटनाएँ संकेत देती हैं कि उनकी स्वीकार्यता बढ़ी है, लेकिन उनकी लोकप्रियता से ज़्यादा अहम उनकी संगठित करने की क्षमता है।
क्रांतियों में नतीजे शायद ही कभी बहुमत तय करता है। राजनीति विज्ञान का साहित्य इस बहस से भरा पड़ा है कि घटनाओं को प्रभावित करने के लिए सही प्रतिशत क्या है। कुछ लोगों का मानना है कि अहिंसक आंदोलनों की सफलता के लिए 3.5 प्रतिशत की भागीदारी काफ़ी है। पैरेटो सिद्धांत कहता है कि 20 प्रतिशत लोग 80 प्रतिशत नतीजे तय करते हैं। राजनीति विज्ञान का एक शोधपत्र तर्क देता है कि आबादी का 4 प्रतिशत हिस्सा 64 प्रतिशत नतीजे तय कर सकता है। ये आँकड़े कई अहम संदर्भों को नहीं समेटते—जैसे राजनीतिक व्यवस्था का चरित्र, आयु-संरचना, और यह कि मानव स्वभाव तथा राजनीति को संख्याओं में नहीं बाँधा जा सकता। फिर भी ये एक बड़ा सच उजागर करते हैं: छोटे लेकिन प्रतिबद्ध अल्पमत अक्सर इतिहास गढ़ते हैं।
1917 की फ़रवरी क्रांति में रूस की आबादी का 1 प्रतिशत से भी कम हिस्सा शामिल था। दूसरी क्रांतियों की तुलना में 1979 की इस्लामी क्रांति व्यापक थी, जिसमें ईरान की 10 से 20 प्रतिशत आबादी ने हिस्सा लिया। इसमें शामिल धड़ों में ख़ोमैनीवादी सबसे छोटे समूहों में से थे, लेकिन सबसे प्रतिबद्ध थे।
इसका उलट भी सच हो सकता है। 2009 में ग्रीन मूवमेंट ने अकेले तेहरान में एक ही दिन में 3 मिलियन लोगों को सड़कों पर उतारा—यानी शहर की आबादी का चौथाई और देश की आबादी का 4 प्रतिशत। दूसरे शहरों के मार्च जोड़ दें तो यह संख्या 3.5 प्रतिशत की सीमा से काफ़ी ऊपर थी। लेकिन ग्रीन मूवमेंट, नेतृत्व से लेकर ज़मीनी कार्यकर्ताओं तक, असंगठित, अप्रतिबद्ध और डरपोक था।
इसका कोई अनुमान नहीं है कि जनवरी 2026 में पहलवी के प्रदर्शनों के आह्वान पर कितने ईरानियों ने प्रतिक्रिया दी, लेकिन संभावना है कि यह संख्या कई मिलियन रही होगी, और एक तिहाई से अधिक ईरानियों के बीच उनकी लोकप्रियता उससे कहीं ज़्यादा है जितनी अलेक्जेंडर केरेंस्की या रुहोल्लाह ख़ोमैनी कभी जुटा पाए थे। पहलवी ने साबित कर दिया है कि सफलता के लिए ज़रूरी संख्या उनके पास है। अब उन्हें अपनी क्षमता साबित करनी है।
उनका काम आसान नहीं है। उन्हें अलग-अलग मूल्यों और कई बार टकराते हितों वाले तमाम धड़ों और पक्षों के लिए स्वीकार्य बनना होगा। इनमें सबसे प्रमुख हैं ख़ुद ईरानी, जो अपने राजनीतिक विचारों में विविध हैं और प्रवासी समुदाय तथा देश के भीतर रहने वालों में बँटे हुए हैं। दोनों ही अहम वर्ग हैं; देश के भीतर के लोग सड़कों पर उतरते हैं, जबकि प्रवासी समुदाय पश्चिमी राजनीतिक नेतृत्व पर दबाव बनाता है और आर्थिक मदद देता है।
पहलवी को उन क्षेत्रीय पक्षों की भी स्वीकृति चाहिए जो ट्रंप प्रशासन को प्रभावित करते हैं—इसराइल से लेकर तुर्की और खाड़ी सहयोग परिषद के देशों तक। सबसे अहम यह कि उन्हें अमेरिकी सरकार, ख़ासकर ट्रंप प्रशासन को संतुष्ट करना होगा। अंत में, उन्हें व्यवस्था के भीतर बैठे लोगों के लिए भी स्वीकार्य होना होगा, जिन्हें वे क्रांति में शामिल होने का न्योता देते हैं। उनका रिकॉर्ड मिला-जुला है। अमेरिकी प्रशासन उन्हें लेकर संशय में है; सार्वजनिक रूप से रिपोर्ट की गई इकलौती मुलाक़ात जनवरी 2026 में राष्ट्रपति के दूत स्टीव विटकॉफ़ (Steve Witkoff) के साथ हुई। सार्वजनिक रिपोर्टों के अनुसार, पहलवी जिन राष्ट्राध्यक्षों से मिले हैं, वे सिर्फ़ इसराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की हैं।
पहलवी का सबसे बड़ा संगठनात्मक दावा उनका दलबदल अभियान है। 23 जून 2025 को उन्होंने व्यवस्था के भीतर से दलबदल कराने की एक योजना की घोषणा की। बाद में उन्होंने दावा किया कि 50,000 लोगों ने उनसे संपर्क किया है। 24 जनवरी 2026 को उन्होंने CNN के जेक टैपर से कहा कि यह संख्या 100,000 पार कर चुकी है। इनमें से सभी दावे वास्तविक नहीं हैं, क्योंकि व्यवस्था झूठे दावों के ज़रिए इस प्रक्रिया को जाम करने की कोशिश करती है। उनका संगठन कहता है कि वह इनकी तस्दीक़ की प्रक्रिया में है। पहलवी ने न तो दलबदलुओं की पुष्टि और उन्हें सक्रिय करने की कोई समय-सीमा बताई है, न ही यह ज़ाहिर किया है कि उनसे उनकी क्या माँगें हैं—मसलन, क्या उन्हें पीछे हट जाना चाहिए या व्यवस्था और विदेशी छद्म बलों पर बंदूक़ें तान देनी चाहिए।
पहलवी के आलोचकों की कमी नहीं है, लेकिन अक्सर उनका ध्यान ग़लत चीज़ पर होता है। उनकी वैधता पर सवाल उठाना हारी हुई लड़ाई है; उनका नाम लोग पहचानते हैं और लोग लगातार उनके साथ जुट रहे हैं। उनके पास व्यवस्था को गिराने के लिए पर्याप्त समर्थक हैं, बशर्ते वे उन्हें संगठित कर सकें और बाहरी समर्थन को सही दिशा दे सकें।
हालाँकि यह स्पष्ट नहीं है कि वे ऐसा कर पाने में सक्षम हैं। इसी हफ़्ते, कई दिनों तक ईमेल का जवाब न देने के बाद, उनके प्रतिनिधि ने अमेरिकी सीनेटरों के साथ आने वाले सप्ताहांत की प्रस्तावित बैठक को यह कहकर दर्प भरे अंदाज़ में ठुकरा दिया कि पहलवी बहुत व्यस्त हैं। दसियों हज़ार प्रदर्शनकारियों की मौतें भी यह याद दिलाती हैं कि रणनीति के बिना निहत्थे नागरिक व्यवस्था को गिराने के लिए काफ़ी नहीं होंगे। यह दावा करने के अलावा कि दलबदलू उनसे संपर्क कर रहे हैं, पहलवी ने ईरान के भीतर किसी संगठन का कोई सबूत पेश नहीं किया है—निजी तौर पर भी नहीं। संशय रखने वालों को उनसे यह टटोलना शुरू करना चाहिए कि आँकड़ों से आगे उनके पास क्या है।
पश्चिमी नीति-निर्माताओं को उनसे यह माँग करनी चाहिए कि वे गंभीर हों, भले ही इसके लिए अक्षम वफ़ादारों पर सख़्ती करनी पड़े। हालांकि पहलवी के आलोचकों के लिए यह कड़वी घूँट होगी, क्योंकि इसमें यह मौन स्वीकृति निहित है कि पहलवी के पास वह लोकप्रियता है जो दूसरे संभावित नेताओं को कभी हासिल नहीं होगी।
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