पाकिस्तान ने कायरता अपनाई, सऊदी रक्षा समझौता रद्दी में फेंका
रियाद को अपनी नाराज़गी जताने के लिए सभी पाकिस्तानी निवासियों और कामगारों को वापस भेज देना चाहिए।
माइकल रुबिन ईरान, तुर्की और हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका के विशेषज्ञ हैं। उनके करियर में पेंटागन में अधिकारी के तौर पर काम करने का अनुभव शामिल है। इसमें ईरान, यमन और इराक़ में ज़मीनी स्तर के अनुभव के साथ-साथ 9/11 से पहले तालिबान के साथ संपर्क भी रहा है। श्री रुबिन ने सैन्य शिक्षा में भी योगदान दिया है और अमेरिकी नौसेना तथा मरीन इकाइयों को क्षेत्रीय संघर्षों और आतंकवाद के बारे में पढ़ाया है। उनके विद्वतापूर्ण काम में कई अहम प्रकाशन शामिल हैं, जैसे “Dancing with the Devil” और “Eternal Iran।” रुबिन ने येल यूनिवर्सिटी से इतिहास में पीएच.डी. और एम.ए., तथा जीव विज्ञान में बी.एस. की डिग्री हासिल की।

9 सितंबर 2025 को इसराइल रक्षा बलों ने क़तर के दोहा में हमास नेताओं की हत्या की कोशिश की। वे निशाना चूक गए। इस पर सिर्फ़ क़तर सरकार ही नहीं, कई अन्य अरब और इस्लामवादी देशों ने भी आक्रोश जताया।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ एकजुटता जताने दोहा गए। पाकिस्तान ने इसराइल की निंदा के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का आपात सत्र बुलाने की मांग की और इस्लामाबाद ने दोहा में हुए अरब-इस्लामिक शिखर सम्मेलन में भी हिस्सा लिया। उसी शिखर सम्मेलन के इतर, शरीफ़ और पाकिस्तानी सेना प्रमुख असीम मुनीर—जो पाकिस्तान के भीतर असली ताक़त हैं—ने पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच रणनीतिक पारस्परिक रक्षा समझौते (Strategic Mutual Defense Agreement) के लिए ज़मीन तैयार की।
17 सितंबर 2025 को सऊदी युवराज मोहम्मद बिन सलमान और शरीफ़ ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसमें आधिकारिक पाकिस्तानी बयान के अनुसार कहा गया है कि “किसी भी एक देश के विरुद्ध किया गया कोई भी आक्रमण दोनों के विरुद्ध आक्रमण माना जाएगा।”
इस संधि के बाद न सिर्फ़ नीति विश्लेषक इसराइल पर और क़तर में की गई उसकी कथित चूक की गंभीरता पर एक साथ टूट पड़े, बल्कि एक “इस्लामिक NATO” के अपरिहार्य गठन की चर्चा भी तेज़ हो गई। उदाहरण के लिए, तुर्की ने संकेत दिया कि वह इस गठबंधन में शामिल हो सकता है। बिन सलमान ने मिस्र और सोमालिया के साथ रक्षा समझौता वार्ताओं को मंज़ूरी दी। मिशिगन विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर और विपुल ब्लॉगर जुआन कोल (Juan Cole) ने दलील दी कि रणनीतिक रूप से सऊदी अरब के लिए पाकिस्तान, इसराइल के साथ किसी समझौते से बेहतर सौदा है।
“पाकिस्तान, क़रीब 250 मिलियन की आबादी वाला एक मुस्लिम देश, जिसकी सेना दुनिया में 12वें स्थान पर है और जिसके पास परमाणु हथियारों का ज़ख़ीरा है। दरअसल पाकिस्तान इसराइल से ऊपर है, जो ग्लोबल फ़ायरपावर इंडेक्स में 15वें स्थान पर आता है। इसराइल के मुक़ाबले पाकिस्तान की इकलौती कमज़ोरी उसकी माली हालत है,” कोल ने लिखा।
लेकिन जब रियाद पर मिसाइलें बरसीं, तब पाकिस्तान कहीं नज़र नहीं आया। ईरान के साथ 565 मील की साझा सीमा होने के कारण पाकिस्तान ईरान के उस “दोनों के विरुद्ध आक्रमण” पर तुरंत जवाब दे सकता था। कम से कम, सीमा की ओर पाकिस्तान की तैनाती इस्लामी गणराज्य ईरान को ज़्यादा रक्षात्मक रुख़ अपनाने पर मजबूर कर देती। जब ईरान ने क़तर के ऊर्जा ढांचे पर हमले किए—ऐसे प्रतिष्ठानों पर जिनमें अमेरिका की न तो कोई मौजूदगी थी, न ही कोई दिलचस्पी—तब भी पाकिस्तान ने ईरान की निंदा नहीं की। इसके बजाय, जब उसके कथित सहयोगियों पर ड्रोन और रॉकेट बरस रहे थे, इस्लामाबाद ख़ामोश रहा।
जब फ़ारस की खाड़ी में युद्ध जारी है, पाकिस्तान ने अफ़ग़ानिस्तान पर अपने हमले तेज़ कर दिए हैं। 16 मार्च 2026 को काबुल के पास एक अस्पताल पर पाकिस्तान के हवाई हमले में ख़बरों के मुताबिक़ 400 से ज़्यादा नागरिक मारे गए; ग़ज़ा के उलट, उनका अस्पताल किसी सैन्य कमान चौकी का दोहरा इस्तेमाल नहीं कर रहा था। पाकिस्तान ने अफ़ग़ानिस्तान के ख़िलाफ़ “खुले युद्ध” का ऐलान कर दिया है।
युद्ध की ऐसी घोषणा का कोई ख़ास औचित्य नहीं है। तालिबान को बड़े पैमाने पर पाकिस्तान ने ही खड़ा किया, और अमेरिकी मौजूदगी के दौरान यह समूह पाकिस्तान का प्रॉक्सी बना रहा। इस्लामाबाद इस बात से नाराज़ है कि तालिबान अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रीय हितों को लेकर अपनी समझ की रक्षा के लिए तेज़ी से स्वतंत्र रुख़ अपना रहा है, लेकिन यह शायद ही कोई casus belli (युद्ध का कारण) है। बल्कि अब यह लगातार साफ़ होता जा रहा है कि अफ़ग़ानिस्तान के प्रति पाकिस्तान की आक्रामकता का एक ही उद्देश्य है: पाकिस्तान के अधिकारियों को यह बहाना देना कि वे सऊदी अरब के साथ अपने रणनीतिक पारस्परिक रक्षा समझौते को लागू न करें और उसका सम्मान न निभाएं।
दूसरे शब्दों में, असीम मुनीर कायर हैं। वह पहलगाम जैसे पर्यटन स्थलों पर निहत्थे हिंदुओं के ख़िलाफ़ आतंक को प्रायोजित करेंगे, लेकिन जब भारत जवाबी कार्रवाई में कई पाकिस्तानी आतंकी प्रशिक्षण शिविरों और हवाई अड्डों को ध्वस्त कर देता है तो वह चीख़ते हैं और पीड़ित होने का नाटक करते हैं। इसी तरह, वह समझौतों पर दस्तख़त करते हैं, नए ख़िताब लेते हुए सीना फुलाते हैं, लेकिन जैसे ही अपनी प्रतिबद्धताओं पर अमल का वक़्त आता है, बहाने गढ़ने लगते हैं।
बिन सलमान भी ज़िम्मेदारी से मुक्त नहीं हैं। वह अपने “इख़वान की धुरी” (Axis of Ikhwan) को लेकर इतने उत्सुक थे कि उन्होंने मुनीर की अकड़ और आत्म-प्रचार पर भरोसा कर लिया। पाकिस्तान के साथ सौदा करके उन्हें लगा कि वे सऊदी अरब को नई दिशा में ले जा सकते हैं—एक ऐसी दिशा में जो दशकों पुरानी अमेरिकी रक्षा साझेदारी पर कम निर्भर हो।
संयुक्त अरब अमीरात ने ईरानी संस्थान बंद कर दिए हैं और जल्द ही ईरानियों को घर भेज सकता है। ख़बर है कि क़तर भी ईरानी राजनयिकों को निष्कासित कर रहा है। सऊदी अरब ने शायद कभी इतने ईरानी प्रवासियों के लिए अपने दरवाज़े नहीं खोले हों, लेकिन रियाद को शरीफ़ और मुनीर के झूठ पर अपनी नाराज़गी जताने के लिए सभी पाकिस्तानी निवासियों और कामगारों को वापस भेज देना चाहिए। आख़िरकार, अगर पाकिस्तान को अफ़ग़ानिस्तान से ऐसा ख़तरा है कि वह अपनी प्रतिबद्धताओं पर अमल नहीं कर सकता, तो फिर पाकिस्तानियों का अपने वतन लौटकर उसे संभालना वाजिब ही है।
भारतीय कामगार यह कमी आसानी से पूरी कर सकते हैं। आज और भविष्य में भी, वे कहीं अधिक सुरक्षित और स्थिर कार्यबल हैं। और अगर पाकिस्तान सरकार को डर है कि सऊदी अरब में काम कर रहे अपने नागरिकों से आने वाले प्रति माह 3 अरब डॉलर से अधिक के धन-प्रेषण से वह वंचित हो सकती है, तो शायद शरीफ़ और मुनीर को बस उतना पैसा लौटा देना चाहिए, जो उन्होंने और अन्य वरिष्ठ राजनेताओं तथा जनरल अधिकारियों ने बरसों में चुराया है। पाकिस्तान के साथ किसी भी रक्षा गठबंधन को वही नाम दीजिए जो वह है: कायरता की धुरी।
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