मध्य पूर्व में PKK के ‘जनता के भाईचारे’ की कोई जगह नहीं
कड़वा सच यह है कि यह विचारधारा कुर्दों के मेज़बान देशों में टिकाऊ और शांतिपूर्ण राजनीतिक व्यवस्था बनाने में नाकाम रही है।
लोक़मान राडपे मिडिल ईस्ट फ़ोरम (Middle East Forum) के फ़ेलो हैं और Towards an Independent Kurdistan: Self-Determination in International Law के लेखक हैं।

जनवरी 2026 की शुरुआत में सीरियाई राष्ट्रपति अहमद अल-शरा (Ahmed al-Sharaa) की सरकारी सेनाओं और उनके तुर्की समर्थित सहयोगियों ने अलेप्पो के अशरफ़िया और शेख़ मक़सूद से कुर्दों का नरसंहार किया और उन्हें जबरन निर्वासित किया। इसके कुछ ही दिनों बाद कुर्द नेतृत्व वाली सीरियन डेमोक्रेटिक फ़ोर्सेज़ (SDF) अब फ़रात नदी के पश्चिम में, उन्हीं इलाक़ों में, इन्हीं ताक़तों का सामना कर रही है, जो पहले कुर्दों के नियंत्रण में थे।
कुर्दों का साथ सबसे पहले अरब क़बायली बलों ने छोड़ा। इस दलबदल के गहरे मायने हैं। वर्षों तक कुर्द प्रशासन ने अरब समुदायों को इस्लामिक स्टेट (ISIS) और दूसरे चरमपंथी सुन्नी गुटों से सुरक्षित पनाह दी। उनके इस विश्वासघात ने एक कड़वा सच सामने रख दिया है: कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी (PKK) की “जनता के भाईचारे” वाली विचारधारा कुर्दों के मेज़बान देशों में टिकाऊ और शांतिपूर्ण राजनीतिक व्यवस्था खड़ी करने में नाकाम रही है।
यह विचारधारा तुर्की के साथ कुर्दों के रिश्तों में भी विफल रही है। जेल में बंद PKK नेता अब्दुल्लाह ओजलान (Abdullah Öcalan) द्वारा तुर्की और PKK के बीच लोकतांत्रिक समाधान का आह्वान किए हुए लगभग एक साल बीत चुका है। जवाब में PKK ने ख़ुद को भंग कर और हथियार डालकर सद्भावना का संकेत दिया, इस उम्मीद के साथ कि तुर्की कुर्द पहचान और अधिकारों को मान्यता देगा। अंकारा ने बदले में कुछ नहीं दिया। तुर्की ने कुर्दों के अधिकारों को मान्यता देने की दिशा में एक क़दम भी नहीं उठाया, उनकी पहचान को स्वीकार करने की बात तो दूर रही।
इसके बजाय तुर्की और सीरिया में उसके अरब सहयोगी अब सीरिया के कुर्द नेतृत्व वाले स्वायत्त प्रशासन को खत्म करना चाहते हैं। वे इस क्षेत्र में दूसरी कुर्द इकाई के उभरने को बर्दाश्त नहीं कर सकते। तुर्कों, अरबों और फ़ारसियों—तीनों के लिए राष्ट्रवाद शांति से ऊपर है। इसके उलट, कुर्दों ने उन्हीं राज्यों के भीतर सह-अस्तित्व और समझौते का रास्ता अपनाया है जो उन पर शासन करते हैं। यह असंतुलन उन्हें भारी पड़ा है।
राष्ट्रीय हित हर जगह राजनीति पर हावी रहता है—यह न तो हैरानी की बात है, न अनैतिक। लेकिन PKK की यह धारणा कि कुर्दों को तुर्कों, फ़ारसियों और अरबों की राजनीतिक सोच का लोकतंत्रीकरण करना चाहिए, नाकाम हो चुकी है; यह बोझ किसी राज्यविहीन राष्ट्र का नहीं है। कुर्दों के पास संप्रभुता नहीं, शिक्षा व्यवस्थाओं पर नियंत्रण नहीं, और पड़ोसी राष्ट्रवाद को नए सिरे से गढ़ने के लिए ज़रूरी संस्थागत ताक़त भी नहीं है। उनसे ऐसा करने की उम्मीद करना राजनीतिक कल्पना भर है।
हाल की घटनाएं इस विफलता को रेखांकित करती हैं। इराक़ में कुर्दिस्तान क्षेत्रीय सरकार (KRG) के तहत शांतिपूर्वक रहने वाले सीरियाई अरब अब खुलकर अल-शरा और उनकी सीरियाई सत्ता का समर्थन कर रहे हैं। ईरान में भी कुर्दों के सामने ऐसी ही हक़ीक़त है, और अगर जारी प्रदर्शनों के दबाव में वहां की सत्ता गिरती है, तो इस्लामी गणराज्य के बाद बनने वाली किसी भी व्यवस्था में भी संभवतः यही होगा।
ये पैटर्न एक साफ़ चेतावनी देते हैं। कुर्दों को बहुत पहले ही रास्ता बदल लेना चाहिए था। जैसा कि एक कुर्द कहावत है, “तुम्हारे पिता और दादा के दुश्मन कभी उनके बेटों के दोस्त नहीं बनेंगे” (“ Dujminê bab û kala nabin dostê lawa ”)। कुर्दों को एक परस्पर रणनीति अपनानी होगी: दूसरों के साथ वैसा ही बर्ताव करो जैसा वे तुम्हारे साथ करते हैं—न उससे ज़्यादा, न कम।
मौजूदा हालात अगर युद्धविराम तक भी पहुंचते हैं, तो भी संभावना है कि सीरियन डेमोक्रेटिक फ़ोर्सेज़ (SDF) को फ़रात के पूर्व में पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ेगा। ऐसा हुआ, तो कुर्दिस्तान क्षेत्रीय सरकार (KRG) के पेशमर्गा—ठीक वैसे ही जैसे उन्होंने 2014 में कोबानी में किया था—को सीरिया में अपने हमवतनों के समर्थन के लिए तैयार रहना होगा, ताकि इस दूसरी कुर्द सरकार का अस्तित्व बना रहे। कुर्द एक अस्तित्वगत मोड़ पर खड़े हैं। कुर्द राजनीति को दिशा आदर्शवाद नहीं, हक़ीक़त देनी चाहिए।
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