सोमालीलैंड को मान्यता युद्ध नहीं, शांति लाएगी
आज सोमाली विस्तारवादियों को ख़ुश करने का मतलब होगा कल कहीं व्यापक युद्ध, जिसमें जिबूती, इथियोपिया और केन्या भी खिंच सकते हैं।
माइकल रुबिन ईरान, तुर्की और हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका के विशेषज्ञ हैं। उनके करियर में पेंटागन में अधिकारी के तौर पर काम करने का अनुभव शामिल है। इसमें ईरान, यमन और इराक़ में ज़मीनी स्तर के अनुभव के साथ-साथ 9/11 से पहले तालिबान के साथ संपर्क भी रहा है। श्री रुबिन ने सैन्य शिक्षा में भी योगदान दिया है और अमेरिकी नौसेना तथा मरीन इकाइयों को क्षेत्रीय संघर्षों और आतंकवाद के बारे में पढ़ाया है। उनके विद्वतापूर्ण काम में कई अहम प्रकाशन शामिल हैं, जैसे “Dancing with the Devil” और “Eternal Iran।” रुबिन ने येल यूनिवर्सिटी से इतिहास में पीएच.डी. और एम.ए., तथा जीव विज्ञान में बी.एस. की डिग्री हासिल की।

इसराइली विदेश मंत्री गिदोन सा’र (Gideon Sa’ar) की 6 जनवरी 2026 को सोमालीलैंड की राजकीय यात्रा, तमाम आकलनों के मुताबिक, सफल रही। 1991 में सोमालिया के अराजकता में डूबने के बाद सोमालीलैंड ने जब दोबारा अपनी आज़ादी की घोषणा की थी, तब से उसे औपचारिक मान्यता देने वाला इसराइल पहला देश बना, और उसके बाद किसी वरिष्ठ इसराइली अधिकारी की यह पहली यात्रा थी।
अमेरिकी कांग्रेस, रक्षा मंत्रालय और ख़ुफ़िया समुदाय में कई लोग सोमालीलैंड की आज़ादी का समर्थन करते हैं, लेकिन उप विदेश मंत्री क्रिस्टोफ़र लैंडाऊ (Christopher Landau) और संभव है कि राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के भीतर कुछ लोगों ने अमेरिकी मान्यता पर ब्रेक लगा दिया है।
सोमालीलैंड को अमेरिकी मान्यता देने का विरोध करने के लिए वे तीन तर्क देते हैं। पहला, उनका कहना है कि मान्यता देने से आतंकवाद-रोधी कोशिशों में बाधा आ सकती है, क्योंकि इससे सोमालिया का सहयोग खत्म हो जाएगा, और यह ऐसा जन-आक्रोश भी भड़का सकता है जो पूरे सोमालिया और सोमालीलैंड में आतंक के विस्फोट की वजह बने। दूसरा, उन्हें चिंता है कि अफ़्रीका में एक नए राष्ट्र को मान्यता देना अन्य अफ़्रीकी देशों को अस्थिर कर सकता है, क्योंकि इससे उन्हें अपनी सीमाएँ दोबारा खींचने का प्रोत्साहन मिलेगा। आखिर में, वे कहते हैं कि सोमालीलैंड को एकतरफ़ा मान्यता देना पूरे क्षेत्र को अस्थिर करेगा और संभव है कि इससे सोमालीलैंड और सोमालिया के बीच युद्ध छिड़ जाए।
इनमें से हर तर्क बेदम है।
पहली बात, सोमालिया का आतंकवाद-रोधी सहयोग, अच्छे से अच्छा मानें तो भी, सबसे ज़्यादा कहें तो असंगत ही रहा है। अल-शबाब सोमाली सरकार में गहरे तक पैठा हुआ है। मोगादिशू के पूर्व ख़ुफ़िया प्रमुख फ़हद यासीन (Fahad Yasin) ने शुरुआत अल जज़ीरा के रिपोर्टर के तौर पर की थी और अमेरिका द्वारा घोषित आतंकी संगठनों के साथ नज़दीकी से काम किया। हाल के वर्षों में सोमाली नेता चीन की ओर मुड़ गए हैं, जबकि अमेरिकी विदेश मंत्रालय अब भी उन्हें सब्सिडी देने की वकालत करता रहता है।
यह कहना भी नादानी है कि सोमालीलैंड में आतंकवाद का विस्फोट हो सकता है। मैं पहले खुद हर्गेसा से बरबरा, फिर विवादित शहर लासआनोद और वहाँ से सोमालिया के पुंटलैंड राज्य की राजधानी गारोवे तक गाड़ी से जा चुका हूँ। देहात वीरान है और इस भूभाग को जोड़ने वाली गिनी-चुनी सड़कों पर जगह-जगह चेकपॉइंट हैं। आखिरकार, सोमालीलैंड ऐसा देश है जहाँ मवेशियों की संख्या इंसानों से कम से कम एक क्रम-मान (order of magnitude) ज़्यादा है, और शायद 15 गुना तक। इस बीच क़बीलाई गतिशीलता का मतलब यह है कि जो भी इस दायरे का नहीं है, उस पर शक किया जाता है। कोई बाहरी व्यक्ति अगर कोई अपार्टमेंट किराए पर ले या घर बनाने की कोशिश करे, तो पड़ोसी तुरंत पुलिस को सूचना देंगे कि जाँच करे—अगर उन्हें नहीं पता कि वह कौन है, उसके पिता और मां कौन हैं, और उसके दादा-दादी कौन थे। इसकी एक वजह है कि सोमालीलैंड में आख़िरी आतंकी हमला 2008 में हुआ था।
दूसरी बात, सोमालीलैंड को मान्यता देने का मतलब सीमाएँ दोबारा खींचना नहीं, बल्कि उन्हें बरकरार रखना है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पाँचों सदस्यों ने ब्रिटिश संरक्षित क्षेत्र के दौर में संधि से तय सीमाओं के तहत सोमालीलैंड को मान्यता दी थी। सोमालिया बनाने वाले 1960 के संघ का विघटन 1989 में सेनेगैम्बिया महासंघ के अंत से अलग नहीं है। दोनों ही मामलों में विफल संघ से पहले मौजूद सीमाओं की ओर लौटना होता है।
आखिर में, यह चिंता कि सोमाली एकता पर मोगादिशू के दावे को कमजोर करने से युद्ध छिड़ जाएगा, खोखली है। ठीक इसके उलट, मोगादिशू के ‘ग्रेटर सोमालिया’ के नैरेटिव का बचाव ही दरअसल युद्ध भड़का सकता है। सोमाली झंडे के पाँच सितारे सोमालिया के उन पाँच क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिन्हें सोमाली विस्तारवादी एकजुट करना चाहते हैं। ब्रिटिश सोमालीलैंड के अपने इतालवी समकक्ष के साथ मिलकर सोमाली गणराज्य बनने के बाद तानाशाह मोहम्मद सियाद बर्रे ने जुलाई 1977 में इथियोपिया के सोमाली-बहुल ओगाडेन क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित कर दिया। इतिहास खुद को दोहराएगा।
लैंडाऊ अभी जो कर रहे हैं, वह जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश की “चिकन कीव” नीति के बराबर है, जिसमें सोवियत संघ के टूटने के खिलाफ सलाह दी गई थी; या विदेश मंत्रालय के अधिकारियों का सद्दाम हुसैन को खुश करने जैसा, और फिर यह देखकर हैरान होना कि उसने इराक़ और कुवैत को बलपूर्वक जोड़ने की कोशिश की। आज सोमाली विस्तारवादियों को खुश करना कल कहीं व्यापक युद्ध का मतलब होगा—ऐसा युद्ध जिसमें जिबूती, इथियोपिया और केन्या भी शामिल हो सकते हैं।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भले ही “मेक अमेरिका ग्रेट अगेन” का वादा करें, लेकिन मोगादिशू के प्रति उनके नियुक्त अधिकारियों की नरमी विदेश में अमेरिका की साख पर दाग लगाती है। आखिर कौन-सी महाशक्ति उन अनिर्वाचित सोमाली नेताओं के आगे झुकती है जो भ्रष्टाचार के नाबदान की निगरानी कर रहे हैं? अमेरिका सोमालीलैंड को मान्यता देने में जितना हर दिन देर करता है, उतना ही हर दिन अमेरिका के विरोधी वॉशिंगटन की अपने ही हितों को कमजोर करने की इस अनोखी क्षमता का जश्न मनाते हैं।
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