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Letters to the Editor

अज़रबैजान-आर्मेनिया शांति प्रक्रिया पर पुनर्विचार की ज़रूरत

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के चार प्रस्तावों के बावजूद आर्मेनिया ने तीन दशक तक अज़रबैजानी इलाक़ों पर क़ब्ज़ा बनाए रखा, यह तथ्य बहस से बाहर नहीं रखा जा सकता।

माइकल रुबिन ईरान, तुर्की और हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका के विशेषज्ञ हैं। उनके करियर में पेंटागन में अधिकारी के तौर पर काम करने का अनुभव शामिल है। इसमें ईरान, यमन और इराक़ में ज़मीनी स्तर के अनुभव के साथ-साथ 9/11 से पहले तालिबान के साथ संपर्क भी रहा है। श्री रुबिन ने सैन्य शिक्षा में भी योगदान दिया है और अमेरिकी नौसेना तथा मरीन इकाइयों को क्षेत्रीय संघर्षों और आतंकवाद के बारे में पढ़ाया है। उनके विद्वतापूर्ण काम में कई अहम प्रकाशन शामिल हैं, जैसे “Dancing with the Devil” और “Eternal Iran।” रुबिन ने येल यूनिवर्सिटी से इतिहास में पीएच.डी. और एम.ए., तथा जीव विज्ञान में बी.एस. की डिग्री हासिल की।

The ninth-century Dadivank Monastery rises above ancient stone walls in Nagorno-Karabakh.
नागोर्नो-काराबाख़ में प्राचीन पत्थर की दीवारों के ऊपर खड़ा नौवीं सदी का दादिवांक मठ। · Shutterstock

माइकल रुबिन (Michael Rubin) के 11 अक्टूबर, 2026 के लेख “Will the Armenia-Azerbaijan Peace Be the Latest to Come Undone?” में अज़रबैजान को शांति में बाधा के तौर पर पेश किया गया है। हालांकि आर्मेनिया ने क़रीब तीन दशक तक अज़रबैजानी इलाक़ों पर क़ब्ज़ा किए रखा, जबकि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के चार प्रस्तावों में वहां से हटने की मांग की गई थी। ख़ोजाली नरसंहार को जिस तरह वे खारिज करते हैं, वह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के दस्तावेज़ों में दर्ज अत्याचारों और कई देशों की संसदीय संस्थाओं तथा अंतरराष्ट्रीय संगठनों की ओर से मिली मान्यता की अनदेखी है।

रुबिन, राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव (Ilham Aliyev) की “पश्चिमी अज़रबैजान” संबंधी टिप्पणियों को इस बात का सबूत मानते हैं कि वे सचमुच शांति के प्रति प्रतिबद्ध नहीं हैं। लेकिन आज के आर्मेनिया में मौजूद उन स्थानों का उल्लेख करना, जहां से अज़रबैजानियों को ज़बरन विस्थापित किया गया था, किसी क्षेत्रीय दावे के बराबर नहीं है। 1993 के एक भाषण में, आर्मेनिया के पूर्व राष्ट्रपति लेवोन तेर-पेत्रोस्यान (Levon Ter-Petrosyan) ने अज़रबैजानियों को हटाए जाने को 600 साल पुरानी समस्या का समाधान बताया था।

2022 में अज़रबैजान ने संबंध सामान्य बनाने के लिए पांच सिद्धांत प्रस्तावित किए थे, जिनमें क्षेत्रीय अखंडता की मान्यता और क्षेत्रीय दावों का त्याग शामिल था। 8 अगस्त, 2025 के वॉशिंगटन शिखर सम्मेलन में दोनों देशों ने एक शांति समझौते पर आद्याक्षर किए। इसके बाद अज़रबैजान ने आर्मेनिया के लिए कार्गो ट्रांजिट पर लगी पाबंदियां हटाईं, अनाज की खेप और पेट्रोलियम निर्यात को सुगम बनाया और नागरिक समाज के आदान-प्रदान का समर्थन किया। ट्रंप रूट फ़ॉर इंटरनेशनल पीस एंड प्रॉस्पेरिटी (TRIPP) क्षेत्रीय संपर्क को और आगे बढ़ाने का अवसर देता है।

ये व्यावहारिक उपलब्धियां और विश्वास-बहाली के उपाय दिखाते हैं कि अज़रबैजान टिकाऊ शांति और अमेरिका के साथ रचनात्मक जुड़ाव के लिए प्रतिबद्ध है।

सुल्तान ज़ाहिदोव (Sultan Zahidov) प्रमुख सलाहकार, सेंटर ऑफ़ एनालिसिस ऑफ़ इंटरनेशनल रिलेशंस एंड मल्टीकल्चरलिज़्म, बाकू

मैं श्री ज़ाहिदोव को उनके जवाब के लिए धन्यवाद देता हूं, लेकिन वे मूलतः अज़रबैजानी सरकार की पुरानी दलीलें ही दोहराते हैं। वे नागोर्नो-कराबाख़ द्वारा अपनी स्वायत्तता जताने के लिए उठाए गए संवैधानिक क़दमों और विवादों के समाधान के लिए मिंस्क ग्रुप प्रक्रिया को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से मिले समर्थन की अनदेखी करते हैं। जब मध्यस्थता वाला समझौता नज़दीक आ चुका था और मध्यस्थ उसकी आख़िरी बारीकियां तय कर रहे थे, तभी अज़रबैजान के राष्ट्रपति अलीयेव ने एकतरफ़ा तौर पर बल का सहारा लिया—राजनयिकों को यह भरोसा देने के कुछ ही दिन बाद कि वे ऐसा नहीं करेंगे—और समूचे नागोर्नो-कराबाख़ का जातीय सफ़ाया कर दिया, ठीक वैसे ही जैसा नख़चिवान में किया गया था। दोनों ही क्षेत्रों में अज़रबैजान इससे भी आगे गया और उसने सदियों और सहस्राब्दी पुरानी सांस्कृतिक विरासत को नष्ट कर दिया।

नागोर्नो-कराबाख़ में 100,000 से अधिक मूल निवासी ईसाइयों के जातीय सफ़ाए की इस पृष्ठभूमि में, युद्ध के चरम दौर के तीन दशक से भी पुराने एक चुनिंदा बयान को लेकर ज़ाहिदोव की शिकायत विडंबनापूर्ण ढंग से मेरे लेख के ही मूल तर्क को पुष्ट करती है—कि अज़रबैजान तैयार नहीं दिखता और शांति को कमज़ोर कर रहा है।

ज़ाहिदोव कुछ अन्य तथ्यात्मक ग़लतियां भी करते हैं। अज़रबैजान के पूर्व राष्ट्रपति ने ख़ोजाली को लेकर उस अज़रबैजानी कथानक पर ही संदेह जताया था, जो समय के साथ और अधिक बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता रहा है।

श्री ज़ाहिदोव कुछ कथित “विश्वास-बहाली के उपायों” का ब्यौरा देते हैं, लेकिन वे उन बंधकों का ज़िक्र नहीं करते जिन्हें अज़रबैजान अब भी अपने क़ब्ज़े में रखे हुए है, न ही उन अज़रबैजानी सैनिकों पर मुक़दमा न चलाए जाने का, जो वीडियो में आर्मेनियाई बंदियों के सिर काटते हुए पकड़े गए, और न ही निर्धारित सीमा के पार आर्मेनियाई भू-भाग पर अज़रबैजान के सैन्य क़ब्ज़े का। व्यापक नाकेबंदी और आर्मेनिया को “पश्चिमी अज़रबैजान” बताने वाली बदला लेने की बयानबाज़ी के साथ मिलकर, ये सब बताते हैं कि अलीयेव आज भी उतने ही निष्ठावान हैं जितने तब थे, जब उन्होंने संघर्षविराम तोड़ा, पिछले समझौतों को तार-तार किया और बोस्निया युद्ध के बाद इस पूरे क्षेत्र में सबसे बड़ा जातीय सफ़ाया शुरू किया।

फ़्रीडम हाउस के मुताबिक़, अज़रबैजान दुनिया के सबसे क्रूर पुलिस राज्यों में से एक चलाता है—चीन, तालिबान के अफ़ग़ानिस्तान, क्यूबा और बेलारूस से भी बदतर। 1990 में सद्दाम हुसैन के कुवैत पर हमले से दुनिया ने यह सबक़ सीखा था कि बदला लेने की बयानबाज़ी मायने रखती है, ख़ासकर तब जब आर्थिक गिरावट तानाशाहों को ध्यान भटकाने के लिए रास्ता तलाशने पर मजबूर कर दे। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अलीयेव की लगातार दी जा रही धमकियों को गंभीरता से लेना चाहिए।

Michael Rubin

मूल अंग्रेज़ी लेख पढ़ें: Rethinking the Azerbaijan-Armenia Peace Process

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