मुस्लिम ब्रदरहुड पर सऊदी अरब ने ट्रंप को ठेंगा दिखाया
दक्षिणी यमन की सेनाओं पर बमबारी का फ़ैसला बताता है कि सऊदी क्राउन प्रिंस 11 सितंबर, 2001 से पहले वाले सऊदी रवैये की ओर लौट रहे हैं।
माइकल रुबिन ईरान, तुर्की और हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका के विशेषज्ञ हैं। उनके करियर में पेंटागन में अधिकारी के तौर पर काम करने का अनुभव शामिल है। इसमें ईरान, यमन और इराक़ में ज़मीनी स्तर के अनुभव के साथ-साथ 9/11 से पहले तालिबान के साथ संपर्क भी रहा है। श्री रुबिन ने सैन्य शिक्षा में भी योगदान दिया है और अमेरिकी नौसेना तथा मरीन इकाइयों को क्षेत्रीय संघर्षों और आतंकवाद के बारे में पढ़ाया है। उनके विद्वतापूर्ण काम में कई अहम प्रकाशन शामिल हैं, जैसे “Dancing with the Devil” और “Eternal Iran।” रुबिन ने येल यूनिवर्सिटी से इतिहास में पीएच.डी. और एम.ए., तथा जीव विज्ञान में बी.एस. की डिग्री हासिल की।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस कार्यकारी आदेश के एक महीने से कुछ ज़्यादा समय बाद, जिसमें अमेरिकी विदेश मंत्रालय को मुस्लिम ब्रदरहुड की कुछ शाखाओं को विदेशी आतंकवादी संगठन (FTO) घोषित करने की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया गया था, सऊदी अरब ने अपना फ़ैसला कर लिया है। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान भले ही अपने देश में मुस्लिम ब्रदरहुड को दबाते हों, लेकिन पड़ोसी यमन में वे उसे ताक़त दे रहे हैं।
सऊदी अधिकारियों के लिए इससे दो लक्ष्य साधे जाते हैं। पहला, इससे रियाद मुस्लिम ब्रदरहुड और उसके समर्थकों को साध सकता है—यानी सऊदी अरब भीतर दमन करता रहे और वे अपनी विचारधारा और आतंक को बाहर निर्यात करते रहें। दूसरा, सऊदी क्राउन प्रिंस यमन में स्थिरता और सुरक्षा की अंतरराष्ट्रीय कोशिश के मुक़ाबले, संयुक्त अरब अमीरात के ख़िलाफ़ अपनी छद्म लड़ाई और निजी ईर्ष्याओं को तरजीह देते हैं।
मुकल्ला में दक्षिणी सेनाओं (Southern Forces) पर बमबारी का सऊदी फ़ैसला बताता है कि मोहम्मद बिन सलमान 11 सितंबर, 2001 से पहले वाले सऊदी रवैये की ओर लौट रहे हैं। न्यूयॉर्क और वॉशिंगटन पर अल-क़ायदा के हमलों से पहले के दशकों तक सऊदी अरब वैश्विक स्तर पर इस्लामवादी चरमपंथ का सबसे बड़ा इंजन और वित्तपोषक रहा। 11 सितंबर के बाद भी उसने इस्लामवादी अभियानों को समर्थन देना जारी रखा और कार्रवाई सिर्फ़ तब की, जब इस्लामवादी आतंकवादियों ने ख़ुद किंगडम पर हमले शुरू किए। सऊदी अरब को इसका उलटा असर झेलना पड़ा—यह कोई हैरानी की बात नहीं थी। जो भी देश अपनी सीमाओं से बाहर इस्लामवादी चरमपंथी गुटों को समर्थन देता है, उसे आख़िरकार अपने घर में उनकी हिंसा का सामना करना पड़ता है। यह सबक़ पाकिस्तान, सीरिया और तुर्की ने सीखा; अगर सऊदी अरब यमन की हिंसक मुस्लिम ब्रदरहुड से निकली शाखा को फिर से समर्थन देता है, तो वह भी इसका अपवाद नहीं होगा।
इस्लाह (Islah) के ऑपरेटिव न सिर्फ़ हूतियों तक हथियारों की तस्करी करते हैं, बल्कि अरब प्रायद्वीप में अल-क़ायदा (AQAP) की भी मदद करते हैं। सऊदी क्राउन प्रिंस अबू धाबी के असर पर लगाम लगाना चाह सकते हैं, लेकिन आतंकवादियों को ताक़त पहुँचाने वाले तरीक़े से ऐसा करना नासमझी है। इस्लाह ने हज़रामौत के रास्ते हूती बलों तक तस्करी के रूट को आसान बनाया, जो मारिब के पास यमनी तेल क्षेत्रों पर क़ब्ज़ा करने के लिए लड़ रहे हैं। सऊदी अधिकारियों को तय करना होगा कि ज़्यादा अहम क्या है: संयुक्त अरब अमीरात से गठजोड़ वाली किसी ताक़त का नियंत्रण मज़बूत होना, या हूतियों का फिर उभार।
सऊदी-हूती रिश्ते पेचीदा हैं। यमन की राजधानी सना पर हूतियों के क़ब्ज़े के बाद, सऊदी अरब ने शुरुआत में हूतियों को रोकने की कोशिश की, लेकिन राष्ट्रपति बराक ओबामा और जो बाइडन, और अपने दूसरे कार्यकाल में डोनाल्ड ट्रंप के हूतियों के ख़िलाफ़ लड़ाई में सऊदियों का साथ छोड़ देने के बाद रियाद इस नतीजे पर पहुँचा कि अमेरिका अब सऊदी अरब के साथ खड़ा नहीं है, और फिर उसने इस समूह को मनाने का फ़ैसला किया। यह अल्पकाल में काम कर सकता है, लेकिन दीर्घकाल में यह तबाही साबित होगा, क्योंकि हूती जितने एक क़बाइली समूह हैं, उतने ही वैचारिक दुश्मन भी हैं।
ट्रंप इस क्षेत्र में ‘हैंड्स-ऑफ़’ रुख़ पसंद करते हैं, और वे सऊदी अरब को मुख्यतः उसकी निवेश क्षमता के नज़रिए से देखते हैं। फिर भी, जब सऊदी अरब एक बार फिर मुस्लिम ब्रदरहुड को बढ़ावा दे रहा है और यमन में आतंक के ख़िलाफ़ लड़ाई को कमजोर कर रहा है, तो ट्रंप और अमेरिकी विदेश मंत्रालय को उनका यह दोहरा खेल ख़ारिज करना चाहिए, हथियारों की खेप रोकनी चाहिए, और ऐसे किसी भी सऊदी अधिकारी या निजी नागरिक पर प्रतिबंध लगाने चाहिए, जिसके क़दम इस्लाह को ताक़त या समर्थन देते हों।
11 सितंबर, 2001 से पहले के दौर में सऊदी अरब ने अमेरिका को मूर्ख बनाया था। इस हफ़्ते दक्षिणी यमन में सऊदी अरब की कार्रवाइयाँ साफ़ करती हैं कि सोच के स्तर पर 11 सितंबर से पहले के दौर में सिर्फ़ अमेरिकी ही नहीं लौटे हैं, सऊदी अरब भी उस समय के सबक़ भूल गया है और अब उनके संभावित तौर पर दोहराव के लिए मंच तैयार कर रहा है।
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