ईरानी हमले ने अरब जगत को शिया धुरी के ख़िलाफ़ एकजुट किया
तेहरान के ख़िलाफ़ एक नया क्षेत्रीय गठजोड़ उसी समय बन गया, जब ईरानी मिसाइलें हवा में ही थीं।
मुख्य बिंदु
- ख़ाड़ी देशों पर ईरान के जवाबी हमलों के कुछ ही घंटों के भीतर सऊदी अरब, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात ने ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिका-इसराइल अभियान की नहीं, बल्कि ईरान की निंदा की।
- संयुक्त अरब अमीरात के रक्षा मंत्रालय ने कहा कि हवाई सुरक्षा प्रणालियों ने कई ईरानी बैलिस्टिक मिसाइलों को रोका, लेकिन गिरते मलबे ने एक रिहायशी इलाक़े को चपेट में ले लिया, जिससे एशियाई नागरिकता वाले एक नागरिक की मौत हो गई।
- किसी भी खाड़ी देश ने अमेरिका-इसराइल के हमलों की निंदा नहीं की, न युद्धविराम की माँग की और न ही ईरान के साथ मुस्लिम एकजुटता का हवाला दिया, और 2023 का सऊदी-ईरानी मेल-मिलाप व्यावहारिक तौर पर खत्म हो चुका है।
ग्रेग रोमन (Gregg Roman) मिडिल ईस्ट फ़ोरम (Middle East Forum) के कार्यकारी निदेशक हैं। 2014 में ज्यूइश टेलीग्राफ़िक एजेंसी (Jewish Telegraphic Agency) ने उन्हें “दुनिया के दस सबसे प्रेरणादायी यहूदी नेताओं” में शामिल किया था और इससे पहले वह इसराइल के उप विदेश मंत्री के राजनीतिक सलाहकार रह चुके हैं तथा इसराइली रक्षा मंत्रालय के लिए काम कर चुके हैं। मध्य पूर्व के मामलों पर अक्सर बोलने वाले रोमन ने अमेरिकी कांग्रेस और क्नेसेट के सामने गवाही दी है और फ़ॉक्स न्यूज़, i24NEWS, अल जज़ीरा, BBC World News और इसराइल के चैनल 12 और 13 जैसे अंतरराष्ट्रीय समाचार चैनलों पर नज़र आते हैं। उन्होंने अमेरिकन यूनिवर्सिटी और हर्ज़लिया स्थित इंटरडिसिप्लिनरी सेंटर में राष्ट्रीय सुरक्षा और राजनीतिक संचार का अध्ययन किया है और The Hill, Newsweek, the Los Angeles Times, the Miami Herald और the Jerusalem Post में लिखते रहे हैं।

इस्लामी गणराज्य ईरान ने चार दशक इस तरह की “प्रतिरोध की धुरी” की कहानी गढ़ने में लगाए कि वह ख़ुद को पश्चिमी और इसराइली ताक़त के मुक़ाबले मुस्लिम जगत के पैरोकार के तौर पर पेश कर सके। लेकिन एक ही सुबह ईरानी बैलिस्टिक मिसाइलों ने उस कहानी को उतनी ही पूरी तरह ढहा दिया, जितना कोई अमेरिकी या इसराइली बम नहीं कर सकता था।
खाड़ी देशों पर ईरान के जवाबी हमलों के कुछ ही घंटों के भीतर सऊदी अरब, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात ने आधिकारिक निंदा-पत्र जारी किए—ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिका-इसराइल अभियान की नहीं, बल्कि ख़ुद ईरान की। इन बयानों की भाषा अपनी विशिष्टता और तल्ख़ी में असाधारण थी। ये चिंता जताने वाली गोलमोल कूटनीतिक अभिव्यक्तियाँ नहीं थीं। ये तेहरान के ख़िलाफ़ एक नए क्षेत्रीय जमावड़े का ऐलान थीं, और ये तब सामने आईं जब ईरानी मिसाइलें अब भी उड़ान में थीं।
बयानों में क्या कहा गया
सऊदी अरब के विदेश मंत्रालय ने अमीरात, बहरीन, क़तर, कुवैत और जॉर्डन की “संप्रभुता के खुले उल्लंघन और खुली ईरानी आक्रामकता” की “कड़े से कड़े शब्दों” में निंदा की—और हर प्रभावित देश का नाम लेकर गिनाया। रियाद ने निशाना बनाए गए देशों के साथ “पूर्ण एकजुटता” जताई, उनके लिए “अपनी सारी क्षमताएँ” उपलब्ध कराने का वादा किया और संप्रभुता तथा अंतरराष्ट्रीय क़ानून के लगातार उल्लंघन के “गंभीर परिणामों” की चेतावनी दी। इसके बाद साम्राज्य ने पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इन हमलों की निंदा करने और उन ईरानी उल्लंघनों के ख़िलाफ़ “सभी कड़े क़दम” उठाने का आह्वान किया जो “क्षेत्र की सुरक्षा और स्थिरता को कमज़ोर करते हैं”।
बहरीन के नेशनल कम्युनिकेशन सेंटर ने पुष्टि की कि साम्राज्य को “अपनी सीमाओं के भीतर स्थलों और प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने वाले बाहरी हमलों का सामना करना पड़ा”। मनामा ने इन हमलों को संप्रभुता का “खुला उल्लंघन” बताया और—सबसे अहम—“अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा के लिए जवाब देने तथा सभी आवश्यक क़दम उठाने का अपना पूरा अधिकार” जताया, वह भी “सहयोगियों और साझेदारों” के समन्वय में। इस आख़िरी वाक्यांश का अपना वज़न है। बहरीन में अमेरिका का पाँचवाँ बेड़ा तैनात है। “सहयोगी और साझेदार” कौन हैं, इसमें कोई अस्पष्टता नहीं।
संयुक्त अरब अमीरात के रक्षा मंत्रालय ने पुष्टि की कि देश पर “ईरानी बैलिस्टिक मिसाइलों” से हमला हुआ। उसने कहा कि हवाई सुरक्षा प्रणालियों ने उनमें से कई को “उच्च दक्षता” से रोका, लेकिन गिरते मलबे ने एक रिहायशी इलाक़े को चपेट में ले लिया, जिससे भौतिक क्षति हुई और एक नागरिक की मौत हो गई—जिसे एशियाई नागरिकता वाला बताया गया। मंत्रालय ने हमले को “एक ख़तरनाक वृद्धि और कायराना कृत्य” क़रार दिया और कहा कि अमीरात “इस वृद्धि का जवाब देने का अपना पूरा अधिकार सुरक्षित रखता है”।
बयानों में क्या नहीं कहा गया
जो नहीं कहा गया, उसका महत्व भी उतना ही है जितना जो कहा गया।
किसी भी खाड़ी देश ने ईरान पर अमेरिका-इसराइल के हमलों की निंदा नहीं की। किसी ने युद्धविराम की माँग नहीं की। किसी ने इस्लामी गणराज्य ईरान के साथ मुस्लिम एकजुटता का हवाला नहीं दिया। किसी ने वॉशिंगटन या यरुशलम से अपना राजदूत वापस नहीं बुलाया। किसी ने गठबंधन की भर्त्सना के लिए अरब लीग का आपात सत्र बुलाने की माँग नहीं की। सऊदी अरब—जिसने 2023 में चीन की मध्यस्थता वाले समझौते के तहत ईरान से संबंध सामान्य किए थे—ने न कोई बचाव वाला रुख़ अपनाया, न दुविधा दिखाई और न ही दोनों पक्षों से तनाव घटाने की अपील की। उसने नाम लेकर ईरान की निंदा की, निशाना बनाए गए देशों को सैन्य समर्थन की पेशकश की और अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई का आह्वान किया।
यह उस प्रतिक्रिया के ठीक उलट है जिसकी तेहरान को उम्मीद थी। दशकों से ईरान की रणनीतिक तर्क-प्रणाली एक धारणा पर टिकी रही है: कि इसराइल या अमेरिका के साथ किसी भी टकराव से सुन्नी अरब जगत में इतनी जन-सहानुभूति और सरकारी सहानुभूति पैदा होगी कि अमेरिकी नेतृत्व वाला गठबंधन बंध जाएगा। इस्लामी गणराज्य ने दाँव लगाया था कि उसकी मिसाइल सेनाएँ खाड़ी में अमेरिकी ठिकानों पर अपेक्षाकृत बेख़ौफ़ होकर हमला कर सकती हैं, क्योंकि मेज़बान सरकारें तनाव बढ़ने के लिए तेहरान को नहीं, वॉशिंगटन को ज़िम्मेदार ठहराएँगी।
यह दाँव आज नाकाम हो गया।
यह क्यों नाकाम हुआ
खाड़ी की एकजुट प्रतिक्रिया के तीन कारण हैं।
पहला, ईरान ने संप्रभु अरब भूभाग पर हमला किया। व्यापक संघर्ष को लेकर खाड़ी देशों ने जो भी कूटनीतिक अस्पष्टता बनाए रखी हो सकती थी, वह उसी क्षण खत्म हो गई जब ईरानी बैलिस्टिक मिसाइलें बहरीन, अमीरात, क़तर, कुवैत और जॉर्डन की ज़मीन पर गिरीं। अमीरात में एक नागरिक की मौत हुई। बहरीन में प्रतिष्ठानों पर हमला हुआ। यह किसी दूर के युद्ध का अनुषंगी नुक़सान नहीं था—यह अरब देशों पर सीधा ईरानी हमला था, और इसने निशाना बने हर देश की सरकार को ज़ोरदार जवाब देने के लिए राजनीतिक आवरण भी दिया और घरेलू अनिवार्यता भी।
दूसरा, खाड़ी देश इस घड़ी के लिए पहले से तैयार थे। 2023 का सऊदी-ईरानी मेल-मिलाप हमेशा लेन-देन आधारित था, बुनियादी बदलाव वाला नहीं। रियाद ने वॉशिंगटन के साथ अपना रक्षा संबंध बनाए रखा, उन्नत सैन्य प्रणालियाँ ख़रीदता रहा और ईरानी विस्तारवाद के ख़िलाफ़ अपनी रणनीतिक मुद्रा कभी नहीं छोड़ी। अमीरात वर्षों से ईरान के मामले में सबसे सख़्त खाड़ी देश रहा है। बहरीन में सुन्नी राजशाही शिया-बहुल आबादी पर शासन करती है और तेहरान ने उसे बार-बार अपने प्रभाव में लेने की कोशिश की है; वह इस्लामी गणराज्य को अस्तित्व का ख़तरा मानता है। इनमें से कोई भी सरकार ईरानी आक्रामकता से हैरान नहीं थी। वे इसके लिए तैयार थीं।
तीसरा, तेहरान के पास उन्हें देने के लिए ऐसा कुछ नहीं था जिसे वे बचाने लायक़ मानते। अरब जगत के लिए इस्लामी गणराज्य की पेशकश हमेशा सीमित रही है—प्रतिरोध की बयानबाज़ी, दूसरों के देशों में प्रॉक्सी युद्ध, और अस्थिरता फैलाने की अंतर्निहित धमकी। 2026 तक, जब ईरान की अर्थव्यवस्था ध्वस्त है, उसकी आबादी विद्रोह पर है और उसकी सैन्य क्षमताएँ खोखली साबित हो चुकी हैं, खाड़ी देशों के पास ऐसे शासन को ढाल देने की कोई वजह नहीं थी जो एक साथ उनके भूभाग पर हमला भी कर रहा था और ख़ुद शुरू किया हुआ युद्ध हार भी रहा था।
क्षेत्रीय पुनर्गठन
इसके निहितार्थ तात्कालिक संकट से कहीं आगे तक जाते हैं।
सऊदी अरब का बयान—निशाना बनाए गए देशों को अपनी सारी क्षमताएँ देने की पेशकश और अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई की माँग—रियाद को तटस्थ मध्यस्थ के तौर पर नहीं, बल्कि ईरान के ख़िलाफ़ एक क्षेत्रीय गठबंधन के सक्रिय हिस्सेदार के रूप में पेश करता है। यह उस सतर्क मुद्रा से नाटकीय बदलाव है जो साम्राज्य ने पिछले ईरान-इसराइल टकरावों के दौरान अपनाई थी। तेहरान के साथ 2023 का मेल-मिलाप व्यावहारिक तौर पर खत्म हो चुका है। उसे ईरानी मिसाइलों ने ही खत्म किया।
“सहयोगियों और साझेदारों” के समन्वय में जवाब देने के अपने अधिकार पर बहरीन का ज़ोर अब तक का सबसे साफ़ संकेत है कि मनामा अपने भूभाग पर अमेरिकी सैन्य सुविधाओं के विस्तारित इस्तेमाल को मंज़ूरी दे सकता है—या आगे के ईरानी हमलों के ख़िलाफ़ रक्षात्मक अभियानों में सीधे शामिल हो सकता है। पाँचवें बेड़े के मुख्यालय को निशाना बनाया गया था। बहरीन की प्रतिक्रिया एक प्रेस बयान तक सीमित नहीं रहेगी।
अमीरात द्वारा एक नागरिक की मौत की पुष्टि क़ानूनी और राजनीतिक गणित बदल देती है। अमीराती ज़मीन पर ईरानी बैलिस्टिक मिसाइल से मारे गए एक नागरिक की मौत अबू धाबी को अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत युद्ध का कारण (casus belli) और अपनी प्रतिक्रिया बढ़ाने का घरेलू राजनीतिक आधार देती है। रक्षा मंत्रालय की भाषा—“जवाब देने का अपना पूरा अधिकार सुरक्षित रखता है”—किसी औपचारिकता का वाक्य नहीं, एक चेतावनी है।
अलगाव की धुरी
इन बयानों का संयुक्त असर—साथ में कज़ाख़स्तान का निकासी आदेश और फ़लस्तीनी प्राधिकरण का अपने नागरिकों से ईरान छोड़ने का आह्वान—इस्लामी गणराज्य के इर्द-गिर्द ऐसी स्थिति के उभरने की ओर इशारा करता है जिसे अलगाव की धुरी ही कहा जा सकता है। जिन देशों पर ईरान ने हमला किया, वे उसकी निंदा कर रहे हैं। जिन देशों पर उसने हमला नहीं किया, वे वहाँ से अपने लोगों को निकाल रहे हैं। जिस आबादी का नेतृत्व करने का ईरान दावा करता है, वह उसके ख़िलाफ़ हुए हमलों का जश्न मना रही है।
तेहरान की “प्रतिरोध की धुरी” दरअसल हमेशा एक ईरान-निर्देशित हिंसक नेटवर्क के लिए गढ़ा गया मुलायम शब्द ही रही है, जिसका मक़सद प्रॉक्सियों और डर के ज़रिए ताक़त का प्रदर्शन करना था। उस मॉडल की बुनियादी कमज़ोरी अब सामने है: जब केंद्र लगातार हमले की ज़द में हो और प्रॉक्सियाँ उसकी हिफ़ाज़त न कर सकें, तो पूरा ढाँचा बाहरी सहानुभूति और एकजुटता पर टिक जाता है—और वह मौजूद ही नहीं है। अरब जगत ईरान की रक्षा में नहीं जुट रहा। वह उसके ख़िलाफ़ कतार में खड़ा हो रहा है।
इस्लामी गणराज्य आने वाले दिनों में देखेगा कि उसने एक उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल कर ली है—उसने खाड़ी के अरब देशों, अमेरिका और इसराइल को एक साझा उद्देश्य के तहत एक कर दिया है। कूटनीति के ज़रिए नहीं। अपनी ही मिसाइलों के ज़रिए।
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