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सीरिया के कुर्दों को मिला अमेरिकी विश्वासघात का सबक़

कुर्द अधिकारों तथा द्रूज़, अलावी और अन्य अल्पसंख्यकों के अधिकारों की राजनीतिक स्वीकृति के बिना सीरिया में स्थिरता नहीं आएगी।

कमाल चोमानी जर्मनी के लाइपज़िग विश्वविद्यालय में पीएच.डी. के शोधार्थी और The Amargi (द अमार्गी) के प्रधान संपादक हैं।

U.S. and Turkish soldiers discuss the bombing of Islamic State positions in Aleppo, Syria, in September 2017.
सितंबर 2017 में सीरिया के अलेप्पो में इस्लामिक स्टेट (ISIS) के ठिकानों पर बमबारी पर चर्चा करते अमेरिकी और तुर्क सैनिक। · Shutterstock

इसराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने 8 जनवरी 2026 को कहा कि इसराइल का लक्ष्य एक दशक के भीतर ख़ुद को अमेरिकी सैन्य सहायता से मुक्त करना है। यह एक चौंकाने वाली स्वीकारोक्ति थी, इसलिए नहीं कि यह नई थी, बल्कि इसलिए कि यह एक व्यापक सच्चाई को दर्शाती है: अमेरिका अब वह भरोसेमंद सुरक्षा गारंटर नहीं रहा, जैसा वह कभी होने का दावा करता था। मध्य पूर्व में जिस अमेरिका पर कई लोग निर्भर थे, उसका बर्ताव तेज़ी से ग़ैर-अमेरिकी होता गया है: सौदेबाज़, अनिश्चित और अपने साझेदारों के भविष्य के प्रति उदासीन। यह सबक़ सीरिया के कुर्दों से ज़्यादा शायद ही किसी ने सीखा हो।

रिकॉर्ड पर नज़र डालिए। अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में हस्तक्षेप किया और नाकाम रहा। इराक़ में वह फिर नाकाम रहा। लीबिया में यह एक आपदा बन गया। फिर सीरिया की बारी आई। वॉशिंगटन ने एक ट्रेन-एंड-इक्विप कार्यक्रम पर क़रीब 500 मिलियन डॉलर ख़र्च किए, जिससे लगभग 50 लड़ाके तैयार हुए और उनमें से कई आख़िरकार अल क़ायदा से जुड़े गुटों में चले गए। 2014 तक इस्लामिक स्टेट एक वैश्विक अस्तित्वगत ख़तरे के रूप में उभर चुका था, जिसने इन नाकामियों से पैदा हुए शून्य को भर दिया।

इस्लामिक स्टेट को अमेरिका और उसके नेटो सहयोगियों ने नहीं रोका। दरअसल, नेटो सदस्य तुर्की और अमेरिकी सहयोगी क़तर ने इस्लामिक स्टेट का समर्थन किया और उसे धन दिया। यह सीरिया और इराक़ के कुर्द और वे इराक़ी थे जिन्होंने इस्लामिक स्टेट को हराने के लिए बने वैश्विक गठबंधन का साथ दिया। 2014 से 2017 के बीच कुर्द नेतृत्व वाले बलों ने 3 साल से भी कम समय में इस्लामिक स्टेट की क्षेत्रीय “ख़िलाफ़त” को ध्वस्त कर दिया। दशकों में पहली बार किसी अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप को वैचारिक खाँचों के आर-पार व्यापक समर्थन मिला—बर्नार-आंरी लेवी (Bernard-Henri Lévy) जैसे लोगों से लेकर नोम चॉम्स्की तक, मार्क्सवादियों से लेकर उदारवादियों और रूढ़िवादियों तक। तुर्की और कुर्दिस्तान क्षेत्र के मौजूदा प्रधानमंत्री मसरूर बारज़ानी (Masrour Barzani) को छोड़कर किसी भी गंभीर पक्ष ने इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ लड़ाई में कुर्दों को अमेरिकी समर्थन का विरोध नहीं किया।

और फिर भी, जैसे ही इस्लामिक स्टेट हार गया, वॉशिंगटन ने वही किया जो वह बार-बार करता आया है: वह मुँह मोड़कर चल दिया। दोनों ट्रंप प्रशासनों के दौरान अमेरिका ने कुर्दों को छोड़ दिया। संदेश साफ़ था: रणक्षेत्र में दी गई क़ुर्बानी राजनीतिक संरक्षण में नहीं बदलती।

फिर 2025 और 2026 में, सीरिया के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति के दूत टॉम बैरक (Tom Barrack) ने एक पूर्व अमेरिकी-नामित आतंकवादी को ख़ुश करने के लिए कुर्दों को बस के नीचे धकेल दिया। जनवरी 2026 में अमेरिकी सरकार ने कुर्दों पर चौदह-सूत्री योजना स्वीकार करने का दबाव डाला—सीरिया की संक्रमणकालीन सरकार और कुर्द नेतृत्व वाली सीरियन डेमोक्रेटिक फ़ोर्सेज़ (SDF) के बीच युद्धविराम और एकीकरण समझौता। यह बेहद ख़ामीभरी शांति और जातीय सफ़ाए की आशंका के बीच का चुनाव था। इतिहास यहाँ शिक्षाप्रद है। इराक़ी बाथ शासन ने कुर्दों के ख़िलाफ़ पहला बड़े पैमाने का नरसंहार करने में चौदह साल लगाए। सीरिया में, हयात तहरीर अल-शाम के नेतृत्व वाली सीरियन अरब आर्मी और अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-शरा (Ahmed al-Sharaa) के अधीन, द्रूज़, अलावी और कुर्दों का नरसंहार एक साल से भी कम समय में कर दिया गया। यह समझौता कुर्दों की न्यूनतम माँगें भी पूरी नहीं करता, लेकिन यह बड़े पैमाने के ख़ूनख़राबे को रोक सकता है। कुर्दों ने भ्रम के बजाय जीवित रहने को चुना।

आगे क्या होगा, यह अनिश्चित है। अगर सीरियाई राज्य की पुनर्स्थापना हयात तहरीर अल-शाम के वर्चस्व वाली व्यवस्था के सुदृढ़ीकरण की ओर ले जाती है, तो यह सफल नहीं होगी। लेकिन अगर राज्य की वापसी प्रतीकात्मक रहे और कुर्द नेतृत्व वाली संस्थाओं को इसमें शामिल किया जाए, तो यह समावेशन की दिशा में एक वास्तविक, भले ही नाज़ुक, क़दम हो सकता है। रक़्क़ा और देर एज़्ज़ोर जैसे अरब-बहुल शहरों में राज्य की वापसी कम विवादास्पद है। लेकिन हसाका जैसे कुर्द-बहुल इलाक़ों और अन्य कुर्द क्षेत्रों में शासन का नेतृत्व मुख्य रूप से ख़ुद कुर्दों के हाथ में होना चाहिए। कुर्दों का अमेरिका से भरोसा पूरी तरह उठ जाने से पहले ट्रंप प्रशासन को कम से कम इतना तो ज़ोर देकर कहना ही चाहिए।

अल-शरा इतने व्यावहारिक दिखते हैं कि वह अल्पकाल में सीमित कुर्द स्वायत्तता बर्दाश्त कर लें, कम से कम तब तक जब तक उनकी सत्ता मज़बूत न हो जाए। लेकिन फ़रमान अधिकार नहीं होते। राष्ट्रपति का कोई फ़रमान रातोंरात पलटा जा सकता है, ठीक वैसे ही जैसे अधिनायकवादी शासन संवैधानिक गारंटियों को अर्थहीन बना देता है—जिसका उदाहरण ईरान में संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त लेकिन व्यवहार में लगभग नदारद मातृभाषा शिक्षा है।

ख़तरे काफ़ी बड़े हैं। जिस एकीकरण प्रक्रिया पर बैरक गर्व करते हैं, उसमें सीरियन डेमोक्रेटिक फ़ोर्सेज़ के कई सदस्यों को बाहर किए जाने या अपराधी ठहराए जाने की आशंका है। ख़ासकर महिला बलों को इस्लामवादी नेतृत्व वाले सैन्य ढाँचों में लगभग तय तौर पर हाशिए पर धकेले जाने या अपमानित होने का सामना करना पड़ेगा, जो आज भी उन्हें काफ़िर मानते हैं। इससे भी ज़्यादा ख़तरनाक यह है कि अल होल शिविर में क़रीब एक दशक से बंद रहे पूर्व इस्लामिक स्टेट लड़ाकों का संभावित एकीकरण—जिनमें से कई मानवता के ख़िलाफ़ अपराधों के दोषी हैं—किसी भी भावी स्थिरता के लिए सीधा ख़तरा है।

यह हमें उसी केंद्रीय सबक़ की ओर लौटाता है। अरब जगत में एक मशहूर कहावत है: “जो ख़ुद को अमेरिका से ढाँकता है, वह नंगा है।” कुर्द इस सच्चाई को अब कई बार सीख चुके हैं। नुक़सान सिर्फ़ कुर्दों का नहीं है। क्षेत्र में अमेरिका की विश्वसनीयता क्षीण हो रही है, जिससे राज्य और ग़ैर-राज्य पक्ष कहीं और संरक्षण तलाश रहे हैं। अगर बीजिंग अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है, तो वॉशिंगटन उसका रास्ता आसान बना रहा है।

सीरिया में कुर्द मुद्दा अलगाववाद की समस्या नहीं है। यह मान्यता, न्याय और मानवाधिकारों का सवाल है। कुर्द अधिकारों तथा द्रूज़, अलावी और अन्य अल्पसंख्यकों के अधिकारों की राजनीतिक स्वीकृति के बिना सीरिया स्थिर नहीं होगा। एक दाढ़ी-मूँछ साफ़ तानाशाह की जगह दाढ़ी वाले तानाशाह को बिठा देना बदलाव नहीं है। आज जिहादियों को सामान्य ठहराना उन्हें कहीं और और मज़बूत ही करता है। और अगली बार जो शासन गिरेगा, वह शायद पश्चिम का दुश्मन नहीं, बल्कि उसका सहयोगी होगा। इतिहास उन लोगों के प्रति उदार नहीं होगा जो यह सबक़ सीखने में नाकाम रहे।

मूल अंग्रेज़ी लेख पढ़ें: The Kurds of Syria Learn American Betrayal

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