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ईरान के शहज़ादे रेज़ा पहलवी के साथ दिक़्क़त

पहलवी का शासन-विरोधी संगठन उनकी अहस्तक्षेपी राजनीतिक शैली को दर्शाता है, और आगे बढ़ने के लिए उन्हें कुछ अनुशासन लागू करना होगा।

मुख्य बिंदु

  • रेज़ा पहलवी का संगठन अव्यवस्थित है, जिसमें कई सहयोगी उनकी ओर से बोलने का दावा करते हैं, संदेशों के जवाब नहीं आते, और ईरानी ख़ुफ़िया एजेंसियों की घुसपैठ है जिसे उन्होंने जड़ से नहीं उखाड़ा है।
  • ‘तानाशाह’ का ठप्पा लगने के डर से प्रेरित प्रवासी समुदाय और भीतर के विपक्ष को काबू में न लाने का पहलवी का रवैया कायरतापूर्ण या लापरवाह प्रतीत हो सकता है और इससे इस्लामी गणराज्य को डरने लायक़ कुछ ख़ास नहीं मिलता।
  • निर्वासित समूहों में अकेले पहलवी के आंदोलन में ईरान में सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण में योगदान देने की संभावना है, भले ही अंतिम नतीजा राजशाही न हो।

माइकल रुबिन ईरान, तुर्की और हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका के विशेषज्ञ हैं। उनके करियर में पेंटागन में अधिकारी के तौर पर काम करने का अनुभव शामिल है। इसमें ईरान, यमन और इराक़ में ज़मीनी स्तर के अनुभव के साथ-साथ 9/11 से पहले तालिबान के साथ संपर्क भी रहा है। श्री रुबिन ने सैन्य शिक्षा में भी योगदान दिया है और अमेरिकी नौसेना तथा मरीन इकाइयों को क्षेत्रीय संघर्षों और आतंकवाद के बारे में पढ़ाया है। उनके विद्वतापूर्ण काम में कई अहम प्रकाशन शामिल हैं, जैसे “Dancing with the Devil” और “Eternal Iran।” रुबिन ने येल यूनिवर्सिटी से इतिहास में पीएच.डी. और एम.ए., तथा जीव विज्ञान में बी.एस. की डिग्री हासिल की।

Reza Pahlavi, the oldest son of Mohammad Reza Pahlavi, the last Shah of Iran, in a 2023 file photo.
ईरान के आख़िरी शाह मोहम्मद रेज़ा पहलवी के सबसे बड़े बेटे रेज़ा पहलवी, 2023 की एक फ़ाइल तस्वीर में। · Shutterstock

ईरानी क्राउन प्रिंस रेज़ा पहलवी निस्संदेह ईरान के सबसे पहचाने जाने वाले विपक्षी चेहरे हैं। मुजाहिदीन-ए-ख़ल्क़ (Mujahidin al-Khalq) की मरियम राजवी के विपरीत—जो सख़्त पर्दा लागू करती हैं और जिन्होंने कभी इराक़ी तानाशाह सद्दाम हुसैन का साथ दिया था—वह एक ईरानी देशभक्त हैं। कुछ ईरानी उनके दिवंगत पिता की ज़्यादतियों का ठीकरा बेटे के सिर फोड़ने की कोशिश करते हैं, लेकिन यह दो वजहों से अनुचित है। पहली, बेटे अपने-आप पिता की ग़लतियां नहीं दोहराते। तानाशाही आनुवंशिक नहीं होती। मोरक्को के राजा मोहम्मद VI आम तौर पर उदार हैं; उन्होंने अपने पिता, राजा हसन II, के मानवाधिकार उल्लंघनों को स्वीकार किया और एक सत्य एवं सुलह आयोग की अध्यक्षता की। इसी तरह, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अकेले दम पर अपने पिता की सामाजिक रूढ़िवादिता को पलट दिया। दूसरी, रेज़ा पहलवी इतिहास के विद्यार्थी हैं। वह अपने पिता की ज़्यादतियों को समझते हैं और उन्हें न दोहराने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाते हैं। अपने विचार थोपने के बजाय वह उल्टा करते हैं। वह सुनते हैं, उपदेश नहीं देते। वह ख़ुद को ऐसे गठबंधन-निर्माता के रूप में देखते हैं जो ईरानी राजनीति के बिखरे धागों को दो सिद्धांतों के इर्द-गिर्द एकजुट कर सके: ईरानी राष्ट्र की एकता और लोकतंत्र। वह एक बड़ा तंबू चाहते हैं, जिसमें उदारवादी, गणतंत्रवादी और राजशाही-समर्थक—सभी साथ रह सकें।

जहाँ कई ईरानी कार्यकर्ता—इस्लामी गणराज्य समर्थक कार्यकर्ता जो नेशनल ईरानियन अमेरिकन काउंसिल (NIAC) और क्विंसी इंस्टीट्यूट (Quincy Institute) में भरे पड़े हैं—राजशाही के दौर में पीड़ित रहे माता-पिता के अनुभवों के आधार पर क्राउन प्रिंस को नीचा दिखाते हैं, वहीं इस्लामी गणराज्य के भीतर फँसे आम ईरानियों का नज़रिया अलग है। 1979 की इस्लामी क्रांति में पूरे 10 प्रतिशत ईरानियों ने हिस्सा लिया था; इसकी तुलना में इतिहासकारों का अनुमान है कि अमेरिकी क्रांति में केवल 1 प्रतिशत अमेरिकी उपनिवेशवासियों ने सक्रिय रूप से भाग लिया था। आयतुल्लाह रुहोल्लाह ख़ुमैनी ने ऐसी भीड़ किसी ख़ास कार्यक्रम के पक्ष में नहीं, बल्कि शाह के ख़िलाफ़ ईरानियों को लामबंद करके जुटाई थी। ख़ुमैनी ने बार-बार निजी महत्वाकांक्षा या सत्ता की चाह से इनकार किया और इसके बजाय “इस्लामी लोकतंत्र” का वादा किया। जब तक ईरानियों को पता चला कि उन्होंने झूठ बोला था, तब तक बहुत देर हो चुकी थी: वह नियंत्रण समेट चुके थे। युद्ध, भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन और अलगाव ने ईरानियों के जीवन स्तर पर गहरा असर डाला।

शाह के दौर में ईरानी अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही थी; इसके बाद हुए तेज़ शहरीकरण ने जन-असंतोष बढ़ाया, क्योंकि अधिक पारंपरिक मानसिकता वाले गाँववासी शहरों में उमड़ पड़े और या तो ईरान के पश्चिम-समर्थक मोड़ से मोहभंग का शिकार हुए या उन्हें लगा कि जो प्रगति वे देख रहे हैं, उसमें वे पीछे छूट गए हैं। मौलवी शासन में पिसने के बाद कई ईरानी जल्द ही उस चीज़ पर अफ़सोस करने लगे जो उन्होंने खो दी थी। दूसरी ओर की घास हमेशा हरी दिखती है।

मैंने ऐसे ईरानियों को देखा है, जो इस्लामी गणराज्य से एक शादी में शामिल होने आए थे और वहाँ क्राउन प्रिंस को देखकर चौंक गए—उन्हें पता ही नहीं था कि वह समारोह में मौजूद होंगे। उनमें से कोई राजशाही-समर्थक नहीं था; फिर भी सब उनके इर्द-गिर्द जुट गए। कुछ ने झुककर अभिवादन किया। कुछ ने उनके हाथ चूमने की कोशिश की। राजशाही-समर्थक हों या न हों, रेज़ा पहलवी ईरानियों के लिए बेहतर दिनों के प्रतीक हैं।

इतनी संभावनाओं के बावजूद, फिर रेज़ा पहलवी के साथ दिक़्क़त क्या है?

विडंबना यह है कि एक बड़ी समस्या अपने पिता की ग़लतियाँ न दोहराने का उनका जुनून ही है। ईरानी प्रवासी समुदाय और भीतर के विपक्ष को संगठित करना बिल्लियों को हाँकने जैसा हो सकता है। लेकिन रेज़ा पहलवी ‘तानाशाह’ का ठप्पा लगने के डर से उन्हें काबू में लाने का रास्ता नहीं चुनते। कई बार ऐसी निष्क्रियता उपयोगी हो सकती है; लेकिन कई बार यह कायरतापूर्ण, और शायद लापरवाह भी, प्रतीत होती है। इस्लामी गणराज्य शासन-विरोधी ईरानियों के बीच उद्देश्य की एकता से डरता है; दुर्भाग्य से, पहलवी ने उन्हें चिंता करने लायक़ कुछ ख़ास नहीं दिया है… अभी तक।

रेज़ा पहलवी और जॉर्डन के पूर्व क्राउन प्रिंस हसन के बीच एक दुर्भाग्यपूर्ण समानता उभर रही है। हसन एक प्रतिभाशाली, भले ही बातूनी, बुद्धिजीवी थे, जिन्हें 1999 में राजा हुसैन ने दरकिनार कर अपने कम योग्य और अधिक भ्रष्ट बेटे अब्दुल्ला II को तरजीह दी। 2003 के इराक़ युद्ध से पहले कई इराक़ियों को उम्मीद थी कि हसन किसी न किसी भूमिका में काम कर सकते हैं, कम से कम एक संविधान सभा की अध्यक्षता ही कर लें। हाशमी परिवार को कई इराक़ी उसी वजह से अच्छी तरह याद करते हैं, जिस वजह से ईरानी पहलवियों को: वे ‘स्वर्ण युग’ के प्रतीक थे। जैसा कि 2000 में एक इराक़ी ने मुझसे चुटकी लेते हुए कहा था, “सद्दाम ख़ुदा का अज़ाब था, क्योंकि कम्युनिस्टों ने [हाशमी] बादशाह को मार डाला था।” हसन ने ख़ुद अपने बचपन की गर्मियाँ इराक़ में बिताई थीं और वह उस देश से परिचित थे। इराक़ियों के बीच निश्चित रूप से उनकी वैधता जे गार्नर, ज़ल्मय ख़लीलज़ाद और पॉल ब्रेमर जैसे महत्वाकांक्षी—लेकिन या तो अभागे या सुर्ख़ियाँ बटोरने वाले—अमेरिकी अधिकारियों से कहीं अधिक थी, जिन्हें राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने इराक़ भेजा था और जिन्होंने आम इराक़ियों को खिजाया। हसन की समस्या कायरता थी। वह छलांग लगाने से डरते थे, शायद इराक़ लौटने तक से। ख़ुद आत्मविश्वास की कमी से जूझ रहे अब्दुल्ला II को डर था कि उनके चाचा का क़द बढ़ जाएगा, इसलिए उन्होंने चाचा को चुप कराने की कोशिश की। उधर, हसन अब्दुल्ला II की अवहेलना करने से इसलिए डरते थे कि कहीं राजा या फ़ारस की खाड़ी के तेल-अमीरातों में उसके सहयोगी हसन का भत्ता बंद न कर दें। आख़िरकार, हसन जोखिम उठाने से डर गए।

रेज़ा पहलवी का जोखिम अलग है। उन्हें विदेशी अनुदान नहीं मिलता और वह उतने संपन्न भी नहीं हैं, जितना कई ईरानी मान लेते हैं। उनका डर शायद यह है कि वह मूलतः श्रोडिंगर की बिल्ली (Schrödinger’s cat) हैं। अभी वह बड़े अधिकार का दावा करते हुए दोनों तरह से फायदा उठा सकते हैं। अगर वह कोई क़दम उठाते हैं और ईरानी उनके साथ नहीं जुटते, तो उनकी ताक़त और प्रासंगिकता तुरंत और स्थायी रूप से ख़त्म हो जाएगी। इसके उलट, अगर ईरानी उनके इर्द-गिर्द जुट जाते हैं, तो उनके अमेरिकी आलोचक भी उनके क़द या भूमिका पर सवाल नहीं उठा पाएँगे। सवाल यह है कि क्या रेज़ा इतना डरते हैं कि यह जोखिम नहीं उठा पा रहे। उन्हें क्षेत्र का दौरा करना चाहिए, और शायद नजफ़ में अस्थायी निवास भी बनाना चाहिए—जहाँ ख़ुमैनी ने निर्वासन के वर्षों का समय बिताया था और जहाँ ईरानी तीर्थयात्री उनसे मिल सकते हैं और शायद उनके इर्द-गिर्द जुट भी सकते हैं। इराक़ी सरकार को यह पसंद न आए, और सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनेई के गुंडे उनकी हत्या की कोशिश करेंगे, लेकिन किसी न किसी मोड़ पर उन्हें चिंता को किनारे रखकर एक साहसिक क़दम उठाना ही होगा।

लेकिन रेज़ा पहलवी अगर यह कर भी लें, तब भी उन्हें उन दूसरी समस्याओं से निपटना होगा, जिन्होंने उन्हें बहुत लंबे समय से रोक रखा है। उनका अपना संगठन उनकी ‘हैंड्स-ऑफ’ राजनीतिक शैली को दर्शाता है। इसे अव्यवस्थित कहना भी कम होगा। कई सहयोगी उनकी ओर से बोलने का दावा करते हैं। इससे समस्या तब खड़ी होती है, जब सहायक उनके अधिकार का इस्तेमाल करके वाद-विवाद में उतरते हैं और दूसरे ईरानी कार्यकर्ताओं, यहाँ तक कि ग़ैर-ईरानी अमेरिकियों को भी निशाना बनाते हैं। उनके नाम पर बोलने वालों की ज़िम्मेदारी आख़िरकार क्राउन प्रिंस की ही है—जब तक कि वह बिना अनुमति ऐसा करने वालों को फटकारें नहीं या उन्हें निकाल न दें। राजशाही-समर्थक मुजाहिदीन-ए-ख़ल्क़ की तरह कोई पंथ नहीं हैं, लेकिन रेज़ा पहलवी के समर्थकों का एक छोटा हिस्सा यह भूल जाता है।

पहलवी के संगठन के भीतर फ़ॉलो-अप की भी समस्या है। कई लोग ख़ुद को वास्तविक मंत्री मानने लगते हैं; उन्हें शोहरत चाहिए, लेकिन वे काबिलियत नहीं दिखाते। संदेशों का जवाब नहीं आता। उनकी टीम बैठकें माँगती है, फिर प्रस्तावित तारीख़ों या समय पर प्रतिक्रिया नहीं देती। पहलवी को शायद डर है कि अनुशासन लागू करने के लिए सख़्ती बरतना—यहाँ तक कि उन लोगों को निकालना भी जो उनके आंदोलन में कुछ ख़ास नहीं जोड़ते या उसे नुक़सान पहुँचाते हैं—पीठ पीछे की बुराई और ग़ैरज़रूरी ध्यान-भटकाव की वजह बनेगा। उनके संगठन में ईरानी ख़ुफ़िया एजेंसियों की घुसपैठ भी है। निश्चित रूप से रेज़ा पहलवी इसे समझते हैं। इन घुसपैठियों को जड़ से उखाड़ पाने में असमर्थता या अनिच्छा समस्या है। लेकिन इस्लामी गणराज्य के डगमगाने के साथ ही, वह अब और देर नहीं कर सकते। अगर वह अपना ही संगठन प्रभावी ढंग से नहीं चला पाते, तो वह उन आलोचकों को बल देते हैं जो कहते हैं कि वह किसी देश की तो बात ही छोड़िए, एक संविधान सभा तक नहीं चला सकते।

इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि निर्वासित समूहों में अकेले पहलवी के पास ईरान में सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण में योगदान देने की संभावना है, भले ही अंतिम नतीजा राजशाही न हो। जहाँ ईरानी मुजाहिदीन-ए-ख़ल्क़ से ख़ुमैनी का समर्थन करने, सद्दाम के हाथों ईरान से ग़द्दारी करने और फिर आतंकवाद का समर्थन करने के लिए नफ़रत करते हैं, वहीं वे रेज़ा पहलवी को अपने स्वर्ण युग का प्रतीक मानते हैं। पहलवी की नीयत अच्छी है, लेकिन जब तक वह अपने आंदोलन पर अनुशासन लागू नहीं करते, और जब तक वह प्रबंधन में उतना समय नहीं लगाते जितना बेहतर भविष्य की संभावना को लेकर अपनी नैतिक श्रेष्ठता का दिखावा (virtue signaling) करने में लगाते हैं, तब तक वह यह सुनिश्चित करते रहेंगे कि उनकी असली महत्वाकांक्षा कभी पूरी न हो। यह न केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी होगी, बल्कि ईरानी लोगों के लिए भी त्रासदी होगी, जो इससे कहीं बेहतर के और संसदीय लोकतंत्र के एक वास्तविक अवसर के हक़दार हैं।

मूल अंग्रेज़ी लेख पढ़ें: The Problem with Iran’s Crown Prince Reza Pahlavi

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