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Observer

यूएई-पाकिस्तान संबंधों का उत्थान और पतन?

मौजूदा संकट रिश्तों में मामूली अड़चन से कहीं बड़ा दिखता है, जिससे संबंधों को स्थायी नुक़सान पहुँचा है।

इमरान ख़ुर्शीद, पीएचडी, भारत के नई दिल्ली स्थित इंटरनेशनल सेंटर फ़ॉर पीस स्टडीज़ (International Centre for Peace Studies) में एसोसिएट रिसर्च फ़ेलो हैं।

Pakistan's presidential palace in Islamabad in February 2026.
फ़रवरी 2026 में इस्लामाबाद स्थित पाकिस्तान का राष्ट्रपति भवन। · Shutterstock

सबसे पहले, संयुक्त अरब अमीरात ने पाकिस्तान से 3.5 अरब डॉलर का क़र्ज़ चुकाने की माँग की, जिसे इस्लामाबाद सऊदी मदद से ही चुका सका। इसके बाद, ख़बरों के मुताबिक़ अमीराती अधिकारियों ने 15,000 पाकिस्तानियों को निर्वासित कर दिया। एतिहाद एयरवेज़ ने भी कई कर्मचारियों की सेवाएँ समाप्त कर उन्हें 48 घंटे के भीतर देश छोड़ने का आदेश दिया। इन घटनाओं में से कोई एक भी अपने-आप में संयुक्त अरब अमीरात के पाकिस्तान के साथ संबंधों की दिशा पर सवाल खड़े कर देती। लेकिन सबको साथ रखें तो ये एक वास्तविक संकट की तरफ़ इशारा करती हैं।

ऐसा संकट लंबे समय से पक रहा था। दशकों तक पाकिस्तान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच गहरे रणनीतिक, आर्थिक और जन-से-जन संबंध रहे। संयुक्त अरब अमीरात फ़ारस की खाड़ी में पाकिस्तान के सबसे क़रीबी साझेदारों में था, जिसने आर्थिक अस्थिरता के दौर में बार-बार वित्तीय मदद दी, अहम क्षेत्रों में निवेश किया और लाखों पाकिस्तानी प्रवासी कामगारों को अपने यहाँ जगह दी, जिनका भेजा धन पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का एक अहम स्तंभ बन गया।

सैन्य सहयोग, ख़ुफ़िया तालमेल और श्रमिक प्रवास ने इस साझेदारी को और मज़बूत किया, और दोनों देशों के नेता नियमित रूप से एक-दूसरे को “brotherly states” कहते रहे। यह सिलसिला तब बिखरने लगा, जब पाकिस्तान ने सितंबर 2025 में सऊदी अरब के साथ पारस्परिक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत एक पर हमला दोनों पर हमला माना जाता है। पाकिस्तान के इस क़दम से अबू धाबी नाराज़ हुआ, जिसकी रियाद के साथ प्रतिद्वंद्विता उस समय चरम पर पहुँच गई थी, जब सऊदी समर्थित बलों ने दक्षिणी यमन में बढ़त बनाई।

बदलते क्षेत्रीय समीकरणों के बीच अपनी रणनीतिक स्वायत्तता का संकेत देने के लिए संयुक्त अरब अमीरात ने भारत और इसराइल—दोनों—के साथ अपनी सक्रियता बढ़ाई। अबू धाबी ने नई दिल्ली के साथ 19 जनवरी 2026 को रणनीतिक रक्षा साझेदारी पर आशय पत्र (Letter of Intent) पर हस्ताक्षर किए। यह क़दम काफ़ी हद तक प्रतीकात्मक था, लेकिन इसके बावजूद इसने पाकिस्तान और सऊदी अरब—दोनों—को एक संदेश दिया।

ईरान के साथ खाड़ी अरब देशों का तनाव भी इस दूरी की एक वजह बना। अमीरातियों का मानना है कि हाल के संघर्ष के दौरान और उसके बाद पाकिस्तान ने ईरान के प्रति कुछ हद तक सहानुभूति दिखाई। वर्षों से पाकिस्तान को मिली अमीराती वित्तीय मदद को देखते हुए अबू धाबी को ज़्यादा मज़बूत कूटनीतिक साथ की उम्मीद थी, ख़ासकर ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों की पृष्ठभूमि में।

अमीरातियों को यह भी लगा कि शांति वार्ता के दौरान पाकिस्तान ने उनकी चिंताओं को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं किया, जिससे नाराज़गी और बढ़ी। जब खाड़ी अरब देश ख़ुद ईरानी नाकेबंदी का सामना कर रहे थे, तब पाकिस्तान का ईरान के लिए छह ज़मीनी रास्ते खोलने का फ़ैसला समस्या को और बढ़ाने वाला साबित हुआ। अमीराती रणनीतिक टिप्पणियों में पाकिस्तान के साथ बढ़ते तनाव की झलक मिलती है।

अमीरातियों को पाकिस्तानी सोशल मीडिया और विशेषज्ञों की टिप्पणियों से भी नाराज़गी हुई, ख़ासकर तब, जब पाकिस्तानी सीनेटर मुशाहिद हुसैन सैयद (Mushahid Hussain Sayed) ने क़र्ज़ चुकाने के मुद्दे पर संयुक्त अरब अमीरात का मज़ाक़ उड़ाते हुए क़र्ज़दाता-क़र्ज़दार के रिश्ते को उलट दिया। उन्होंने कहा, “Pakistan took the right decision. Our UAE brothers are in need and helpless. We took a loan from them and will repay it in a time of crisis.” अमीरातियों ने उनकी इस टिप्पणी को एहसान-फ़रामोशी और अहंकार भरा माना। अमीरातियों को व्यापक तौर पर इस बात पर भी नाराज़गी थी कि पाकिस्तान में उन्हें इसराइल और भारत के एजेंट के रूप में पेश किया जाता है। कई पाकिस्तानी सोशल मीडिया अकाउंट दुबई और शारजाह पर ईरानी ड्रोन हमलों पर जश्न मनाते दिखे।

मौजूदा संकट रिश्तों में मामूली अड़चन से कहीं बड़ा दिखता है; अब ऐसा लगता है कि अमीरात-पाकिस्तान संबंधों को पहुँचा नुक़सान ज़्यादा स्थायी है। इस रिश्ते में कभी जो भरोसा था—इस समझ पर टिका कि नाज़ुक मौक़ों पर पाकिस्तान अबू धाबी के साथ खड़ा रहेगा—वह अब मौजूद नहीं दिखता। मध्य पूर्व में बदलते समीकरणों ने दोनों देशों के बीच की खाई चौड़ी कर दी है—संयुक्त अरब अमीरात भारत और इसराइल के क़रीब जा रहा है, जबकि पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ अपनी नज़दीकी बढ़ा ली है। अमेरिका-ईरान संघर्ष के दौरान ईरान के प्रति पाकिस्तान की कथित सहानुभूति ने अमीराती भरोसे को और चोट पहुँचाई, जिससे निकट भविष्य में सुधार की संभावना कम दिखती है।

अधिक स्थायी दरार के पाकिस्तान के लिए गंभीर निहितार्थ होंगे। उसकी अर्थव्यवस्था पहले ही अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और बाहरी वित्तीय मदद पर निर्भर है, जबकि फ़ारस की खाड़ी में काम कर रहे लाखों पाकिस्तानी बड़ी मात्रा में धन घर भेजते हैं। चूँकि संयुक्त अरब अमीरात ऐतिहासिक रूप से आर्थिक संकटों के दौरान पाकिस्तान का सहारा रहा है और पाकिस्तानी कामगारों के लिए एक प्रमुख गंतव्य रहा है, इसलिए संबंधों में कोई भी दीर्घकालिक गिरावट पाकिस्तान की आर्थिक कमज़ोरियों को और गहरा करेगी। व्यापक तौर पर देखें तो यह बदलाव मध्य पूर्व की बदलती भू-राजनीतिक व्यवस्था को दर्शाता है, जहाँ पारंपरिक “brotherly” रिश्तों की जगह तेज़ी से रणनीतिक और हित-आधारित समीकरण ले रहे हैं।

मूल अंग्रेज़ी लेख पढ़ें: The Rise and Fall of United Arab Emirates-Pakistan Relations?

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