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Middle East Quarterly

निर्णायक सबूत: फ़लस्तीन में अरब प्रवास, 1922-1931

अति प्राचीन काल में, ख़ासकर मिस्र में, उस शुरुआती सभ्यता में जहाँ कलाएँ सबसे ज़्यादा विकसित हुईं, दृश्य-चित्रण ‘पक्षात्मक’ (aspective) था: यानी रंगों या उभरी हुई नक़्क़ाशी में काम करने वाला कलाकार अपनी द्विआयामी सतह पर उतना वह नहीं उतारता था जो उसकी आँखों ने देखा, बल्कि वह उतारता था जो वह जानता था कि वहाँ मौजूद है।

- पॉल जॉनसन (Paul Johnson), The Renaissance

अतीत की जनसांख्यिकी जैसे बेहद संकीर्ण फोकस पर इतना कुछ दाँव पर लगाने में दिक़्क़त यह है कि उन्नीसवीं सदी के शुरुआती दौर से जनसांख्यिकीविदों और दूसरे लोगों के तैयार किए गए आँकड़ों में सटीकता इतनी कम है कि, जनसांख्यिकी से जुड़े कुछ विवादित मुद्दों में, जैसा कहा जाता है, “किसी का भी अनुमान किसी और के अनुमान जितना ही अच्छा है।” या लगभग वैसा ही। बेशक, फ़लस्तीनी जनसांख्यिकीय युद्ध के इस ऊँचे-दाँव वाले खेल में अब भी लगे लोग इससे असहमति जताएंगे। कुछ अपवादों को छोड़कर, वे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि उनके अपने स्रोत बेहतर हैं, उनके अपने अनुमान ज़्यादा वैज्ञानिक हैं और उनके आलोचक ज़्यादा विचारधारात्मक हैं।

फ़लस्तीनी जनसांख्यिकी के आकलन से जुड़े असल में दो मुद्दे—या दो मोर्चे—हैं। पहला, महज़ संख्याओं का है; यानी समय के साथ फ़लस्तीन की कुल आबादी और उप-समूहों की आबादी के आकार को मापना। दूसरा मोर्चा कहीं ज़्यादा विवादास्पद है। वह है उप-समूहों में जनसंख्या वृद्धि के उन प्रतिशतों का आकलन करना, जिन्हें प्राकृतिक वृद्धि और आप्रवासन से जोड़ा जाता है।

इसमें आप्रवासन का कारक—या उसका न होना—सबसे अहम है। अगर किसी आबादी का एक बड़ा हिस्सा हाल में आए लोगों से बना हो, तो ऐतिहासिक रूप से वहाँ बसे होने के दावे कमज़ोर पड़ते हैं। इसी से समझ आता है कि अरब फ़लस्तीनी और दूसरे लोग फ़लस्तीन की यहूदी आबादी को “घुसपैठिया” क्यों कहते हैं। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में फ़लस्तीन की यहूदी आबादी के लिए यहूदी आप्रवासन का महत्व निर्विवाद है। लेकिन भूभाग की विरासत और राष्ट्रीय संप्रभुता पर यहूदी दावे कहीं और टिके थे—जनसांख्यिकी में नहीं, इतिहास में।

दूसरी ओर, अरब फ़लस्तीनियों के लिए उनकी जनसांख्यिकी का स्वरूप ही भूभाग की विरासत और राष्ट्रीय संप्रभुता के उनके दावे का केंद्र है। उनका दावा, जिसे वे अपने हिसाब से निर्विवाद मानते हैं, यह है कि अरब फ़लस्तीनियों की उस भूगोल में गहरी और कालातीत जड़ें हैं और उस भूगोल में उनका अपना आप्रवासन कभी भी महत्वपूर्ण नहीं रहा। इसलिए उस दावे को चुनौती देना, संप्रभुता के लिए उनके स्वयं-चयनित मानदंड को चुनौती देना है।

यानी अरब फ़लस्तीनी जनसांख्यिकी का स्वरूप ही वह एकमात्र सबसे अहम साक्ष्य है जो भूभाग की विरासत और राष्ट्रीय संप्रभुता के अरब फ़लस्तीनी दावे को सहारा देता है। अरब फ़लस्तीनी आबादी—बड़ी हो या छोटी, बढ़ती हो या नहीं—उनके आग्रह के मुताबिक़ सख़्ती से फ़लस्तीन में अरब फ़लस्तीनियों के बीच जन्म और मृत्यु दर, यानी केवल प्राकृतिक वृद्धि से तय होती है। अपनी आबादी की उत्पत्ति का यह नज़रिया उनके और भी ज़्यादा भीतरमुखी “स्थानिक चिपचिपेपन” (spatial stickiness) के नज़रिये से जुड़ा है; यानी उनका यह आग्रह भी कि अरब न सिर्फ़ फ़लस्तीन से बाहर या फ़लस्तीन में भीतर आने के लिए प्रवास के प्रति अनिच्छुक रहे हैं, बल्कि अरब फ़लस्तीनी फ़लस्तीन के भीतर भी एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाने के प्रति अनिच्छुक रहे हैं।

इन दावों और अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, जनसांख्यिकी और इतिहास जैसे विविध विषयों के विद्वानों द्वारा पेश किए गए परस्पर प्रतिस्पर्धी अरब फ़लस्तीनी जनसंख्या अनुमानों की जाँच करने से पहले, यह अंदाज़ा लगाना उपयोगी हो सकता है कि उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के शुरुआती दौर की फ़लस्तीनी जनसांख्यिकी को देखने वाला कोई भी व्यक्ति क्या पाए जाने की उम्मीद करे।

अगर आपसे कहा जाए कि दो मक्का किसानों में—एक औसत आयोवा का खेत मज़दूर और एक औसत मिस्री खेत मज़दूर—प्रति एकड़ ज़्यादा मक्का कौन पैदा करता है, तो पूरी संभावना है कि आप आयोवा वाले किसान को चुनेंगे। और उतनी ही संभावना है कि आप सही होंगे—और सही वजहों से। अपने चयन को समझाने के लिए आप दो कारण देंगे: 1) आयोवा के किसान को ज़्यादा पूँजी तक पहुँच है, और 2) आयोवा के खेत में इस्तेमाल होने वाली तकनीक का स्तर कहीं ज़्यादा उन्नत है। ज़्यादा पूँजी और ऊँचे तकनीकी स्तर का यह प्रभावशाली मेल इसे एकतरफ़ा बना देता है।

आपका तर्क—खेती की उत्पादकता, पूँजी और तकनीक के बीच कारण-परिणाम संबंध—प्रदर्श 1 में मैप किया गया है। उत्पादन वक्र Q उस मक्का के मूल्य को मापता है जो अलग-अलग मात्रा की पूँजी के साथ काम करता एक खेत मज़दूर पैदा करता है। खेत मज़दूर जितनी ज़्यादा पूँजी का इस्तेमाल करता है, उसकी उत्पादकता उतनी ही बढ़ती है। उदाहरण के लिए, $200 की कृषि मशीनरी के साथ काम करते हुए खेत मज़दूर $50 मूल्य का मक्का पैदा करता है, बिंदु a। अगर प्रति मज़दूर पूँजी का अनुपात $200 से बढ़कर $250 हो जाए—अर्थशास्त्री इस बढ़ोतरी को “पूँजी गहनीकरण” कहते हैं—तो मज़दूर की उत्पादकता $50 से बढ़कर $60 हो जाती है, बिंदु b। Q की वक्रता—पूँजी गहनीकरण के साथ चपटी होती हुई—ह्रासमान प्रतिफल के नियम से समझाई जाती है। एक बिंदु के आगे, पूँजी गहनीकरण से मिलने वाले उत्पादकता लाभ तेज़ी से शून्य के पास पहुँचने लगते हैं।

लेकिन कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती। खेती की ज़्यादा उन्नत तकनीक उत्पादन वक्र को Q से ऊपर उठाकर Q’ पर पहुँचा सकती है। यानी वही $200 की पूँजी इस्तेमाल करते हुए, लेकिन इस बार गुणात्मक रूप से बेहतर तकनीक के रूप में, $50 नहीं बल्कि $70 मूल्य का मक्का पैदा होता है, बिंदु c। तकनीक में कुछ बदलाव उत्पादकता में बेहद नाटकीय बदलाव ला सकते हैं। मिसाल के तौर पर, $1,000 के कंप्यूटर प्रिंटर की उत्पादकता की तुलना $1,000 मूल्य के क़लम और स्याही से पैदा होने वाली उत्पादकता से कीजिए।

सीख काफ़ी सीधी है। अर्थव्यवस्थाएँ जितना ज़्यादा पूँजी गहनीकरण और तकनीकी बदलाव में जुटेंगी, उतना ही उन्हें श्रम उत्पादकता में बढ़ोतरी का अनुभव होगा। श्रम उत्पादकता के ऊँचे स्तर ऊँची मज़दूरी दरों को वहनीय बनाते हैं और रोज़गार के स्तर भी बढ़ाते हैं। अब दो पड़ोसी अर्थव्यवस्थाओं की कल्पना कीजिए—एक पूँजी गहनीकरण और तकनीकी बदलाव में गहराई से शामिल, दूसरी अपनी तकनीक या पूँजी गहनीकरण के स्तर में बदलाव करने से हिचकती या असमर्थ। नतीजे तय हैं। दोनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच उत्पादकता का अंतर बढ़ता जाता है और इससे श्रम की आवाजाही के लिए प्रोत्साहन पैदा होते हैं।

जब कुत्ता आदमी को काटता है, वह ख़बर नहीं बनती। जब आदमी कुत्ते को काटता है, वह ख़बर बनती है। इसी तरह, जब श्रम उत्पादकता, मज़दूरी दरों और रोज़गार के अवसरों में बड़े क्षेत्रीय अंतर के बावजूद श्रम की आवाजाही नहीं होती—ख़ासकर एक-दूसरे के नज़दीक के क्षेत्रों के बीच—तो वह ख़बर के क़ाबिल होता है। यानी असल में जिस बात की व्याख्या चाहिए, वह यह नहीं कि लोग कम आकर्षक अर्थव्यवस्थाओं से ज़्यादा आकर्षक अर्थव्यवस्थाओं की ओर क्यों जाते हैं, बल्कि यह कि वे जाते क्यों नहीं।

बेशक, हर कोई नहीं जाता। जानकारी की कमी के साथ-साथ भौतिक, क़ानूनी, राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक बाधाएँ आवाजाही में रोड़ा बन सकती हैं। बुज़ुर्ग आम तौर पर युवाओं की तुलना में आर्थिक प्रोत्साहनों पर कम प्रतिक्रिया देते हैं, और लोगों की ऊर्जा का स्तर व निजी आकांक्षाएँ काफ़ी अलग हो सकती हैं। इन सबके बावजूद, यह तर्क देने के लिए कल्पना पर ज़्यादा ज़ोर नहीं देना पड़ता कि आबादियों में प्रवास की प्रेरणा की तीव्रता श्रम उत्पादकता और जीवन-स्तर के अंतर से काफ़ी हद तक सहसंबद्ध है।

प्रवास की प्रेरणा के पक्ष में ऐतिहासिक और समकालीन साक्ष्य—ख़ासकर दुनिया की विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की आबादियों के मामले में—अकाट्य रूप से भारी हैं। [1] हालांकि विशिष्ट अनुमानों पर शक करने की पूरी वजहें हैं—प्रवासियों पर नज़र रखने में इस्तेमाल पद्धति अब भी काफ़ी कच्ची है और कुछ मामलों में राजनीतिक मक़सद से प्रेरित—फिर भी तस्वीर साफ़ है। कुछ प्रवासी रास्ते तो लगभग राजमार्ग बन चुके हैं। बीसवीं सदी के मध्य से, लाखों उत्तर अफ़्रीक़ी और पूर्वी यूरोपीय प्रवासी पश्चिमी यूरोप में ज़्यादा उत्पादक और ज़्यादा वेतन वाली नौकरियों के लिए अपने गाँव, क़स्बे और शहर छोड़ चुके हैं। यूरोपीय आयोग का अनुमान है कि हर साल लगभग 500,000 प्रवासी अवैध रूप से यूरोपीय संघ (EU) में दाख़िल होते हैं, जो क़ानूनी तौर पर प्रवेश करने वालों के लगभग बराबर है। [2] ऐसे प्रवासी प्रवाह कतई अनोखे नहीं हैं। एशिया में जापान, हांगकांग, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड, ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसी ज़्यादा औद्योगिक रूप से उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में ऊँची तनख़्वाह वाली रोज़गार संभावनाओं ने कम तकनीकी रूप से विकसित अर्थव्यवस्थाओं से अनुमानित 6.5 मिलियन एशियाई प्रवासियों को आकर्षित किया है। [3] 1998 में अकेले जापान में क़ानूनी और अवैध प्रवासी मज़दूरों की संख्या 1.35 मिलियन थी। मुख्य मूल देश चीन (234,000 क़ानूनी और 38,000 अवैध) और फिलीपींस (84,000 क़ानूनी, 43,000 अवैध) थे। [4] या इंडोनेशिया-मलेशिया कनेक्शन को देखिए। 2001 में मलेशिया में 850,000 इंडोनेशियाई क़ानूनी रूप से काम कर रहे थे। इसके अलावा 350,000 से 400,000 अनधिकृत थे। [5] जब आप देखते हैं कि इंडोनेशियाई प्रवासी मलेशिया में प्रतिदिन $2 कमाते थे, जबकि इंडोनेशिया में उन्हें प्रतिदिन $0.28 मिलते, तो यह कोई हैरानी की बात नहीं। [6]

प्रवास की प्रेरणा लगभग उन्हीं वजहों से अमेरिकी महाद्वीपों में भी पूरी तरह जीवित है। मेक्सिकोवासियों की रियो ग्रांडे पार कर उत्तर की ओर क़ानूनी और अवैध, दिन-रात चलने वाली आवाजाही अब भी अमेरिका-मेक्सिको के मज़दूरी अंतर की तीखी खाई से चलती है। 1996 में संयुक्त राज्य अमेरिका आए 496 बिना दस्तावेज़ वाले मेक्सिकी प्रवासियों के एक सर्वे में पाया गया कि वे औसतन प्रति सप्ताह $278 कमाते थे, जबकि मेक्सिको में अपनी पिछली नौकरी में उन्होंने $31 कमाए थे। [7] हालांकि मेक्सिकी प्रवासी प्रवाह के लिए दिए गए विशिष्ट आँकड़ों पर—ख़ासकर अवैध प्रवास के अनुमानों पर—सवाल उठाने की वजह हो सकती है, लेकिन खुद इस प्रवाह से जुड़े आर्थिक कारणों पर सवाल उठाने का कोई ख़ास आधार नहीं है।

1970 के दशक के अफ़्रीका में, तेल-समृद्ध नाइजीरिया ने लाखों क़ानूनी और अवैध अफ़्रीकी प्रवासियों को समाहित किया, जो अपने मूल देशों—घाना, नाइजर और चाड—में सूखे, अकाल और ग़रीबी से बचने की कोशिश कर रहे थे। 1980 के दशक में तेल क़ीमतों के ढहने ने नाइजीरिया को अपनी खुले-दरवाज़े वाली आप्रवासन नीति पर दोबारा सोचने को मजबूर किया और 1980 के दशक के मध्य तक इन प्रवासियों में से लगभग 2 मिलियन—अकेले घाना से 1 मिलियन—को देश छोड़ना पड़ा। [8]

समकालीन प्रवासों के ये संदर्भ, बेशक, प्रवास रूपी हिमखंड की महज़ नोक हैं। दुनिया के कुल प्रवासों को जोड़ें तो प्रभावशाली, लेकिन हैरान न करने वाले, आँकड़े सामने आते हैं। इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में अपने मूल देशों के बाहर रह रहे लोगों की कुल संख्या 150 मिलियन से ज़्यादा आँकी गई थी, जिनमें से करीब 100 मिलियन—30 मिलियन बिना दस्तावेज़ वाले—प्रवासी श्रमिक और उनके परिवार थे। [9]

बाक़ी दुनिया के प्रवासी प्रवाहों को समझाने में जो तर्क ठीक बैठता है, वही मध्य पूर्व पर भी लागू होना चाहिए। और होता भी है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के मुताबिक़, मध्य पूर्व के प्रवासी श्रमिक—जो मध्य पूर्व के भीतर और मध्य पूर्व से बाहर दोनों जगह जाते हैं—दुनिया के कुल 100-मिलियन का लगभग 9 प्रतिशत हैं। [10] 1987 तक, 1.6 मिलियन तक मिस्रवासी दूसरे अरब देशों में प्रवास कर चुके थे। हैरानी नहीं कि उनके प्रमुख पसंदीदा गंतव्य तेल-समृद्ध अर्थव्यवस्थाएँ थीं। इराक़ में 43 प्रतिशत, सऊदी अरब और कुवैत में 39 प्रतिशत। [11] 1990-91 के कुवैत युद्ध ने मिस्र के उत्प्रवास की मेज़बान अर्थव्यवस्थाओं में नाटकीय बदलाव ला दिया। इराक़ और कुवैत ने उस युद्ध के दौरान और उसके बाद अपनी अधिकांश प्रवासी आबादी को बाहर निकाल दिया और 2000 तक सऊदी अरब, मिस्र के अब 2.7 मिलियन उत्प्रवासियों का सबसे अहम मेज़बान बन गया, जिसने कुल का 34 प्रतिशत तक समाहित किया। अरब मेज़बान अर्थव्यवस्थाओं में लीबिया 12 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर आया और उसके बाद जॉर्डन 8 प्रतिशत के साथ रहा। [12]

दिखाई देता है कि अरब फ़लस्तीनी भी प्रवास की प्रेरणा के प्रति मिस्रवासियों से कम संवेदनशील नहीं थे। संयुक्त राष्ट्र राहत और कार्य एजेंसी (UNRWA) के 1998 के अनुमानों के मुताबिक़, सऊदी अरब में 275,000 अरब फ़लस्तीनी थे, कुवैत में 38,000 (कुवैत युद्ध से पहले दर्ज 400,000 से नाटकीय गिरावट), लीबिया में 74,000 और दूसरे खाड़ी देशों में 100,000 से ज़्यादा। [13] सैकड़ों हज़ार लोग मध्य पूर्व को पूरी तरह छोड़कर चले गए। फिर किसी को यह शक क्यों होना चाहिए कि अरब फ़लस्तीनी मिस्रवासियों, या मेक्सिकोवासियों, या घानावासियों, या मोरक्कोवासियों, या इंडोनेशियाइयों, या तकनीक, उत्पादकता, आय और रोज़गार में क्षेत्रीय असमानताओं का सामना करने वाली किसी भी अन्य आबादी से अलग तरह से व्यवहार करेंगे? मज़दूरी और रोज़गार की असमानताओं का खिंचाव अरब फ़लस्तीनियों के लिए मायने रखता है, यह बात न सिर्फ़ उनके प्रवासी प्रवाह के आकार से साबित होती है, बल्कि इस तथ्य से भी कि उच्च-उत्पादकता वाले इसराइल में रहने वाले बहुत कम अरब फ़लस्तीनी उस प्रवाह का हिस्सा थे। दरअसल, 2000 में पर्यटक वीज़ा पर इसराइल में दाख़िल हुए अनुमानित 40,000 जॉर्डनवासी, वीज़ा की अवधि ख़त्म होने के बाद भी वहीं टिके रहे ताकि इसराइल में उन्हें मिलने वाली ज़्यादा वेतन वाली रोज़गार संभावनाओं का फ़ायदा उठा सकें। [14]

यह मानना वाजिब लगता है कि जिन वजहों से बीसवीं सदी के अंत में अरब फ़लस्तीनी और दूसरी मध्य पूर्वी आबादियाँ कम आकर्षक अर्थव्यवस्थाओं से ज़्यादा आकर्षक अर्थव्यवस्थाओं की ओर गईं, उन्हीं वजहों से उन्होंने बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में भी वैसा ही किया होगा। दो घटनाओं ने बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों के फ़लस्तीन को उसके मध्य पूर्वी पड़ोसियों से अलग किया: 1) यूरोपीय यहूदियों का फ़लस्तीन में आप्रवासन, जिसके साथ यूरोपीय पूँजी और यूरोपीय तकनीक भी आई, और 2) फ़लस्तीन में ब्रिटिश मैंडेट सरकार की स्थापना, जिसकी ज़िम्मेदारियों में फ़लस्तीन का आर्थिक विकास भी शामिल था। राष्ट्र संघ द्वारा दिए गए मैंडेट के नतीजे में ब्रिटिश पूँजी और ब्रिटिश तकनीक ब्रिटिश झंडे के पीछे-पीछे आई।

इन दोनों घटनाओं से आर्थिक गतिविधि की ऐसी रफ़्तार बनी कि फ़लस्तीन में जीवन-स्तर का ऐसा स्तर पैदा हुआ, जो पहले मध्य पूर्व में अज्ञात था। तालिका 1 में 1920 के दशक के दौरान फ़लस्तीन की आर्थिक गतिशीलता में योगदान देने वाले कुछ अहम कारक दर्ज हैं।

तालिका 1

पूँजी निर्माण और बुनियादी ढाँचा विकास के चुनिंदा संकेतक: 1922-1931

पूँजी भंडार a

पूँजी आयात b

पूँजी गहनीकरण c

बिजली की खपत d

टेलीफ़ोन लाइनें e

पक्की सड़कों के किलोमीटर

1922

5,056

3,821

84.2

450

1924

6.541

5,522

90.3

3,526

580

1926

9,603

5,013

90.8

2,344

5,611

631

1928

12,022

2,891

98.6

2,974

8,780

706

1931

16,539

3,225

95.2

9,546

14,557

922

स्रोत: R. Szereszewski, Essays on the Structure of the Jewish Economy in Palestine and Israel (जेरूसलम: Maurice Falk Institute for Economic Research in Israel, 1968), पृ. 60, 82; और S. Himadeh, Economic Organization of Palestine (बेरूत: American University at Beirut, 1938), पृ. 282, 565. (a) 1936 की क़ीमतों पर मापे गए वास्तविक LP के ‘000s; (b) LP के ‘000s, (c) 1936 की क़ीमतों पर मापा गया वास्तविक LP, (d) बेची गई KWH इकाइयाँ, (e) स्थानीय टेलीग्राफ़ और टेलीफ़ोन लाइनों के किलोमीटर।

पूँजी भंडार 14.1 प्रतिशत की सालाना दर से बढ़ा और इसका बड़ा हिस्सा पूँजी आयात का नतीजा था। पूँजी का गहनीकरण—प्रति मज़दूर पूँजी भंडार—पूँजी भंडार की वृद्धि के साथ-साथ हुआ। बुनियादी ढाँचा विकास के रूप में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया सड़क निर्माण, विद्युत शक्ति और टेलीफ़ोन संचार में हुई बढ़ोतरी से दिखती है। [15] तालिका 1, प्रदर्श 1 के Q t वक्र पर आगे बढ़ने—पूँजी गहनीकरण—और वक्र में ऊपर की ओर होने वाले बदलाव, जो तकनीकी परिवर्तन का संकेत देते हैं, दोनों का फ़लस्तीनी संस्करण पेश करती है। नतीजे नाटकीय थे। प्रति व्यक्ति वास्तविक शुद्ध घरेलू उत्पाद तेज़ी से बढ़ा और 1922-31 के दौरान दोगुना होकर 19.4 LP (फ़लस्तीन पाउंड) से 38.2 LP पहुँच गया।

आधुनिकीकरण की इस शुरुआती कामयाबी का असर अरब फ़लस्तीनियों और पड़ोसी अर्थव्यवस्थाओं में रहने वाले अरबों—दोनों की नज़र से छिपा नहीं रह सकता था। [16] तालिका 2 में अरब फ़लस्तीनियों के जीवन स्तर की तुलना दूसरे मध्य पूर्वी अर्थव्यवस्थाओं के जीवन स्तर से की गई है।

तालिका 2

मध्य पूर्वी अर्थव्यवस्थाओं में आर्थिक प्रदर्शन और जीवन स्तर: 1932-1936

प्रति व्यक्ति आय a

औद्योगिक दैनिक मज़दूरी b

प्रति व्यक्ति खाद्य सामग्री की खपत c

प्रति कृषि श्रमिक शुद्ध उत्पादकता d

मिस्र

12

NA

16.0

90.1

सीरिया

13

50-310

19.0

97.6

इराक़

10

40-60

13.8

93.2

ट्रांसजॉर्डन

NA

NA

NA

90.1

अरब फ़लस्तीनी

19

70-500

22.9

186.3

स्रोत: F. Gottheil, “Arab Immigration into Pre-State Israel: 1922-1931,” Middle Eastern Studies , अक्टूबर 1973, पृ. 320. (a) British pound sterling, 1936; (b) in mils, 1933-5; (c) International Units (IU), 1934-6; (d) IU, 1934-6।

1920 के दशक में फ़लस्तीन में अरब आप्रवासन का अनुमान लगाने से जुड़ी कई समस्याएँ हैं; इनमें सबसे बड़ी यह है कि अरब प्रवास प्रवाह, कुल मिलाकर, अवैध थे, इसलिए उनकी न सूचना दी गई, न दर्ज किया गया। [17] लेकिन वे पूरी तरह अनदेखे भी नहीं रहे।

जनसांख्यिकीविद यू.ओ. श्मेल्त्ज़ (U.O. Schmelz) ने 1905 में जेरूसलम और हेब्रोन कज़ा (ऑटोमन ज़िले) की आबादी के ऑटोमन पंजीकरण आँकड़ों का जन्मस्थान के आधार पर विश्लेषण किया। इससे पता चला कि अपने निवास-स्थल से बाहर जन्मे अरब फ़लस्तीनियों में से लगभग आधे फ़लस्तीन के भीतर ही आवाजाही का नतीजा थे—कम आर्थिक गतिविधि वाले इलाक़ों से अधिक आर्थिक गतिविधि वाले इलाक़ों की ओर—जबकि बाकी आधे ख़ुद फ़लस्तीन में अरब आप्रवासन को दर्शाते थे, जिनमें 43 प्रतिशत एशिया, 39 प्रतिशत अफ़्रीक़ा और 20 प्रतिशत तुर्की से आए थे। [18] श्मेल्त्ज़ ने अनुमान लगाया:

यहूदी बहुल शहर यरूशलम के आसपास के अरब गाँवों में औसत से अधिक जनसंख्या वृद्धि मैंडेट काल के अंत तक जारी रही। इसका कारण ज़रूर—जैसा कि फ़लस्तीन में मिलती-जुलती परिस्थितियों वाले अन्य स्थानों पर था—आर्थिक अवसरों से आकर्षित होकर आने वाले प्रवासी रहे होंगे, और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के मृत्यु दर घटाने वाले लाभकारी प्रभाव रहे होंगे—ठीक वैसे ही, जैसा फ़लस्तीन के दूसरे हिस्सों में बड़ी यहूदी आबादी वाले शहरों के आसपास हुआ। [19]

यू.ओ. श्मेल्त्ज़ (U.O. Schmelz) की तरह रॉबर्टो बाकी (Roberto Bachi) ने भी फ़लस्तीन में, और फ़लस्तीन के भीतर, प्रवास से जुड़े आँकड़ों और चर्चा के लगभग न के बराबर होने पर कुछ हिचक जताई। वे लिखते हैं:

1800 और 1914 के बीच मुस्लिम आबादी में सालाना औसत वृद्धि लगभग 6-7 प्रति हज़ार के परिमाण की थी। इसकी तुलना दुनिया के “कम विकसित देशों” (एशिया, अफ़्रीक़ा और लैटिन अमेरिका में) के लिए 1800 और 1910 के बीच लगभग 4 प्रति हज़ार के बहुत मोटे अनुमान से की जा सकती है। संभव है कि मुस्लिम आबादी की वृद्धि का कुछ हिस्सा आप्रवास के कारण रहा हो। [21]

सत्यापन योग्य प्रमाणों की कमी ने भी बाकी को फ़लस्तीन के भीतर आंतरिक प्रवास को लेकर स्पष्ट बात कहने से नहीं रोका:

तटीय मैदानों का ज़बरदस्त आर्थिक विकास—जो मोटे तौर पर यहूदी आप्रवास की वजह से था—1922-1931 और 1931-1944, दोनों अवधियों में इस क्षेत्र की मुस्लिम और ईसाई आबादी में अन्य क्षेत्रों के मुक़ाबले कहीं तेज़ बढ़ोतरी के साथ जुड़ा रहा। इसकी संभवतः दो वजहें थीं: यहूदी इलाक़ों के आसपास ग़ैर-यहूदी आबादी की मृत्यु दर में अधिक तेज़ गिरावट, और अधिक विकसित क्षेत्रों की ओर आंतरिक प्रवास। [22]

1920 के दशक में फ़लस्तीन में अरब आप्रवास का ज़िक्र ब्रिटिश मैंडेट सरकार की जनसंख्या पर सांख्यिकीय आँकड़ों की वार्षिक संकलन पुस्तिका में भी मिलता है। मसलन, The Palestine Blue Book, 1937 में कालक्रमिक जनसांख्यिकीय आँकड़े दिए गए हैं, जिनके वार्षिक अनुमान 1922 की जनगणना से किए गए प्रक्षेपणों पर आधारित हैं। [24] फ़लस्तीन की जनसंख्या वाली तालिका के साथ दी गई पादटिप्पणी में लिखा है:

1931 की जनगणना के बाद की अवधि में यहूदियों और अरबों, दोनों का अभिलिखित न किया गया अवैध आप्रवास हुआ है, लेकिन यह स्पष्ट है कि चूँकि इसे दर्ज नहीं किया जा सकता, इसलिए इसकी मात्रा का कोई अनुमान संभव नहीं है। [25]

एक हज़ार पाँच सौ सत्तावन व्यक्तियों (जिनमें 565 यहूदी शामिल हैं) को, जो चोरी-छिपे देश में घुस आए थे और बाद में पकड़े गए, उनके अपराध के लिए कारावास की सज़ा दी गई और निर्वासन की संस्तुति की गई। [26]

इतिहासकार गैड गिलबार (Gad Gilbar) ने अपने संपादित खंड Ottoman Palestine, 1800-1914 में रूथ कार्क (Ruth Kark) के योगदान पर जो टिप्पणी की है, वह फ़लस्तीन में और फ़लस्तीन के भीतर अरब आप्रवास के मुद्दे को छूती है। वे “The Rise and Decline of Coastal Towns in Palestine” में प्रस्तुत उनके विचारों को मध्य पूर्व के शहरों के विकास में अल्पसंख्यक समूहों और विदेशियों की भूमिका संबंधी चार्ल्स इस्सावी (Charles Issawi) की थीसिस से जोड़ते हैं। ऑटोमन शासन के अंतिम तीन दशकों में फ़लस्तीन का कोई और शहर याफ़ा और हाइफ़ा जितनी तेज़ी से क्यों नहीं बढ़ा, इसकी व्याख्या करते हुए गिलबार लिखते हैं: “दोनों ने ग्रामीण और शहरी आसपास के इलाक़ों से आबादी तथा फ़लस्तीन के बाहर से आप्रवासियों को आकर्षित किया।” [27]

जनसांख्यिकीय पहेली का हर टुकड़ा अपने आप में कोई साफ़ तस्वीर नहीं दिखाता। लेकिन ऐसे अनेक टुकड़े मिलकर एक छवि उभारने लगते हैं। रॉयल इंस्टीट्यूट फ़ॉर इंटरनेशनल अफ़ेयर्स (Royal Institute for International Affairs) एक और टुकड़ा जोड़ता है। 1920 और 1930 के दशकों में फ़लस्तीनी आबादी की वृद्धि पर टिप्पणी करते हुए वह बताता है: “सीरिया और ट्रांसजॉर्डन से अवैध रूप से फ़लस्तीन में दाख़िल हुए अरबों की संख्या अज्ञात है। लेकिन संभवतः काफ़ी बड़ी है।” [28] और 1923-36 तक सिनाई के गवर्नर रहे सी.एस. जार्विस (C.S. Jarvis) एक और टुकड़ा जोड़ते हैं:

यह अवैध आप्रवास केवल सिनाई से ही नहीं हो रहा था, बल्कि ट्रांस-जॉर्डन और सीरिया से भी चल रहा था, और अरबों की दुर्दशा का मामला बनाना बहुत कठिन है, अगर उसी समय पड़ोसी राज्यों से उनके हमवतनों को उस दुर्दशा में हिस्सेदार बनने के लिए भीतर आने से रोका न जा सका हो। [29]

इस खंड में फ़लस्तीन के प्रवास अनुमानों की व्युत्पत्ति एक सरल आरोपण (इम्प्यूटेशन) सिद्धांत पर आधारित है। प्रवास उन संख्याओं का अवशिष्ट दावेदार बन जाता है, जिन्हें ज्ञात शुरुआती जनसंख्या भंडार और उस आबादी के लिए ज्ञात जन्म तथा मृत्यु दरों पर आधारित जनसंख्या-अनुमान मॉडल नहीं समझा पाता। इस तरह, बाद के किसी भी वर्ष-समूह के लिए अपेक्षित जनसंख्या भंडार निकाले जा सकते हैं।

इस मॉडल का मूल्य, स्वाभाविक रूप से, शुरुआती जनसंख्या भंडार और प्राकृतिक वृद्धि से जुड़ी दरों के लिए दिए गए अनुमानों की विश्वसनीयता पर निर्भर करता है। फ़लस्तीन में अरब आप्रवास का अनुमान लगाने की समस्या यहीं है। मॉडल अपने आप में सरल और लागू हो सकने वाला है, लेकिन उसकी उपयोगिता—हर अनुमान मॉडल की तरह—डेटा इनपुट की गुणवत्ता पर निर्भर है। फ़लस्तीनी प्रवास के मामले में यह गुणवत्ता अवैध प्रवेशकर्ताओं की खुली उपेक्षा से प्रभावित होती है। अगर अवैध प्रवासी, और बाद में अवैध निवासी, जनगणनाकर्मी की नज़र से बच गए, तो जनगणना उनका हिसाब कैसे रखती? वह रख नहीं सकी और न ही रखा।

इसीलिए यह आश्चर्यजनक नहीं कि ब्रिटिश जनगणना के आँकड़े 1922-31 के लिए अरब फ़लस्तीनी आबादी की ऐसी वृद्धि दिखाते हैं, जो केवल प्राकृतिक वृद्धि और वैध प्रवास से ही उत्पन्न होती दिखाई देती है। 1922 के 589,177 के जनसंख्या भंडार पर 2.5 प्रति वर्ष की वृद्धि दर [30] लागू करने पर 1931 के लिए 735,799 का जनसंख्या अनुमान निकलता है, यानी 1931 की जनगणना में दर्ज 753,822 का 97.6 प्रतिशत। तो क्या आरोपण मॉडल यह “सिद्ध” करता है कि 1922-31 के दौरान फ़लस्तीन में अवैध आप्रवास नगण्य था? बिल्कुल नहीं। जनगणना की जनसंख्या कालक्रमिक श्रृंखला के साथ दी गई एक पादटिप्पणी फ़लस्तीन में अवैध अरब आप्रवास की मौजूदगी को स्वीकार करती है। लेकिन चूँकि इसे दर्ज नहीं किया जा सकता था, इसलिए उसकी संख्या का कोई अनुमान जनगणना गणना में शामिल नहीं किया गया। [31] अवैध प्रवासियों की अनदेखी का मतलब यह नहीं कि वे मौजूद नहीं हैं।

फ़लस्तीन में अवैध आप्रवास को एक ओर रख भी दें, तब भी आरोपण मॉडल फ़लस्तीन के भीतर अरब फ़लस्तीनियों के पर्याप्त प्रवास को दिखाता है और उसी बात की पुष्टि करता है, जिसका संकेत अनेक जनसांख्यिकीविदों, इतिहासकारों, सरकारी प्रशासकों और अर्थशास्त्रियों ने दिया है: कम आर्थिक अवसर वाले गाँवों, क़स्बों और शहरों से अधिक आर्थिक अवसर वाले गाँवों, क़स्बों और शहरों की ओर अरब फ़लस्तीनियों का प्रवास।

कौन से क़स्बे, गाँव और शहर अधिक आर्थिक अवसर देते थे? 1922 और 1931 के जनसांख्यिकीय आँकड़ों का उप-ज़िलेवार विश्लेषण करने और फ़लस्तीन के उन उप-ज़िलों को—जो आगे चलकर 1948 का इसराइल बने, यानी वे उप-ज़िले जिनमें अपेक्षाकृत बड़ी यहूदी आबादी थी (और उसके साथ यहूदी पूँजी और आधुनिक तकनीक)—उन उप-ज़िलों से अलग करने पर, जो 1948 के इसराइल का हिस्सा नहीं बने, फ़लस्तीन के भीतर अरब फ़लस्तीनी प्रवास की न सिर्फ़ दिशा बल्कि उसका परिमाण भी सामने आता है। [32]

जो उप-ज़िले आगे चलकर इसराइल बने, उनमें अरब फ़लस्तीनी आबादी 1922 में 321,866 से बढ़कर 1931 में 463,288 हो गई, यानी 141,422 की बढ़ोतरी। 1922 की अरब फ़लस्तीनी आबादी पर 2.5 प्रति वर्ष की प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि दर लागू करने पर 1931 के लिए अपेक्षित आबादी 398,498 निकलती है, जो ब्रिटिश जनगणना में दर्ज वास्तविक आबादी से 64,790 कम है। आरोपण के मुताबिक़, यह बेहिसाब जनसंख्या वृद्धि या तो ऐसा अवैध आप्रवास रही होगी, जिसका ब्रिटिश जनगणना में हिसाब नहीं रखा गया, और/या पंजीकृत अरब फ़लस्तीनियों का यहूदी-चिह्नित उप-ज़िलों के बाहर से उन चिह्नित उप-ज़िलों में स्थानांतरण रहा होगा। यहूदी उप-ज़िलों में 1922-31 का यह अरब प्रवास उन उप-ज़िलों में रहने वाली 1931 की कुल अरब आबादी का 11.8 प्रतिशत और 1922-31 की वृद्धि का 36.8 प्रतिशत तक था।

जो उप-ज़िले आगे चलकर इसराइल बने, उनमें 1931 की अरब फ़लस्तीनी आबादी का 10 प्रतिशत से अधिक हिस्सा 1922-31 के वर्षों के भीतर उन्हीं उप-ज़िलों में आकर बस चुका था—यह काफ़ी अहम आँकड़ा है। यह फ़लस्तीन में और फ़लस्तीन के भीतर अवैध प्रवास के खंडित साक्ष्यों से मेल खाता है; यह आर्थिक विषमता और प्रवासी प्रेरणा के बीच संबंध के विचार को समर्थन देता है—ऐसा संबंध जिसे सार्वभौमिक रूप से स्वीकार किया जाता है; यह उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के आरंभ की अरब फ़लस्तीनी आबादी पर कुछ विद्वानों द्वारा आरोपित “स्थानिक जड़ता” (spatial stickiness) की थीसिस को कमज़ोर करता है; और यह इस बात का मज़बूत परिस्थितिजन्य प्रमाण देता है कि फ़लस्तीन के भीतर के प्रवास की तरह ही फ़लस्तीन में अवैध अरब आप्रवास भी महत्वपूर्ण था।

अवैध आप्रवास के महत्व के समर्थन में दिए गए तर्क और प्रमाण कुछ विद्वानों को जितने भी ठोस लगें, दूसरों के लिए वे साफ़ तौर पर असंतोषजनक हैं। फ़लस्तीनी जनसांख्यिकी पर सबसे ज़्यादा उद्धृत समकालीन प्रकाशन जस्टिन मैकार्थी (Justin McCarthy) की 1990 की किताब The Population of Palestine है। मैकार्थी के 43 पन्नों के वर्णनात्मक विश्लेषण में—जिसे ऑटोमन, यूरोपीय और यहूदी स्रोत सामग्री से सीधे उतारी गई 188 पन्नों की जनसांख्यिकीय तालिकाओं से पूरक किया गया है—ऑटोमन काल के दौरान फ़लस्तीन में और फ़लस्तीन के भीतर अरब आप्रवास पर सिर्फ़ डेढ़ पन्ने से थोड़ा अधिक हिस्सा है, और उसके बाद के मैंडेट काल के दौरान अरब आप्रवास पर भी इसी तरह लगभग डेढ़ पन्ने। [33] मैकार्थी के मुताबिक़, ये कुछ पन्ने “कुख्यात” आप्रवास थीसिस पर ढक्कन लगाने के लिए पर्याप्त आलोचनात्मक विश्लेषण पेश करते हैं।

पहले ऑटोमन काल के दौरान अरब आप्रवास पर मैकार्थी के विश्लेषण पर गौर करें। उनका किसी उल्लेखनीय अवैध आप्रवास तक न पहुँचना हैरत की बात नहीं, क्योंकि मैकार्थी आधिकारिक ऑटोमन पंजीकरण सूचियों का इस्तेमाल करते हैं, जो अपने वर्गीकरण की प्रकृति के चलते अप्रतिवेदित, अवैध आप्रवास का कोई हिसाब नहीं रखतीं। दूसरे शब्दों में, अगर आप घास के ढेर में ऐसी सुई ढूँढ़ें जो उसमें डाली ही नहीं गई, तो संभावना यही है कि वह नहीं मिलेगी। हैरानी की बात है कि यह विचार मैकार्थी के मन में नहीं आया। आधिकारिक पंजीकरण सूचियों पर केंद्रित रहने का उनका चुनाव उन्हें यह लिखने की गुंजाइश देता है:

तीन फ़लस्तीनी संजक़ों [ऑटोमन उप-प्रांतों] की मुस्लिम आबादी की वृद्धि दरों के विश्लेषण से निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि 1870 के बाद मुस्लिम आप्रवास कम था। [34]

आर्थिक विषमता और प्रवासी प्रेरणा के बीच संबंध को लेकर मैकार्थी का रुख़ और भी अधिक छलपूर्ण प्रतीत होता है। वे लिखते हैं: “ऑटोमन काल में फ़लस्तीन के सापेक्षिक आर्थिक विकास का प्रश्न यहाँ चर्चा का विषय नहीं है।” [36] और उनकी किताब में कहीं और भी इस पर विचार नहीं किया गया। यानी मैकार्थी इस संबंध का खंडन करने के बजाय फ़लस्तीनी संदर्भ में उसकी प्रासंगिकता को नज़रअंदाज़ करते हैं। [37]

मैंडेट काल में फ़लस्तीन में अरब आप्रवास को ख़ारिज करना अवैध आप्रवास को लेकर उनकी कुछ ऐसी मान्यताओं पर टिका है, जो सीमित भी हैं और बिना आधार की भी। उनका दावा है कि भले ही अवैध आप्रवासी प्रवेश के वक्त दर्ज न हुए हों, फ़लस्तीन में उनकी मौतें दर्ज हुई होतीं। इसी तरह, उनका तर्क है, फ़लस्तीन में जन्मे उनके बच्चे भी दर्ज होते। ऐसे पंजीकरणों के आधार पर अनुमान निकालकर वे इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि आप्रवास न्यूनतम था। [38] लेकिन वे यह दिखाने के लिए कोई साक्ष्य नहीं देते कि जन्म और मृत्यु के ये कथित पंजीकरण वास्तव में किए भी गए थे। अगर मैकार्थी ने इस तथ्य पर ध्यान दिया होता कि मैंडेट काल में अवैध आप्रवास पकड़े जाने पर कारावास और निर्वासन होता था, और इससे वाक़िफ़ आप्रवासी मृत्यु और जन्म के किसी भी औपचारिक पंजीकरण से बचते रहे होंगे, तो उन्हें अवैध आप्रवास पर अपना आकलन बदलना पड़ता।

अरब आप्रवास पर मैकार्थी के विश्लेषण के ख़िलाफ़ शायद अधिक गंभीर आरोप रॉबर्टो बाकी के अनुमानों के उनके इस्तेमाल से जुड़ा है। मैकार्थी के आँकड़े आंशिक रूप से बाकी की इस रिपोर्टिंग पर आधारित हैं कि 1931-45 की अवधि में प्रति वर्ष 900 अवैध अरब आप्रवासी आए। [39] लेकिन मैकार्थी, बाकी के अनुमान का मतलब ग़लत तरीके से पेश करते हैं। बाकी सावधानी से स्पष्ट करते हैं कि प्रति वर्ष 900 अवैध अरब आप्रवास का उनका अनुमान सिर्फ़ उन्हीं लोगों के लिए है, जिन्हें मैंडेट अधिकारियों ने पकड़ा। जो अवैध अरब आप्रवास न पकड़ा गया और न दर्ज हुआ, वह इसमें शामिल नहीं है। वे लिखते हैं:

फ़लस्तीन पुलिस द्वारा पकड़े गए अवैध प्रवासी आवागमन के एक हिस्से के पंजीकरण के आधार पर परिशिष्ट 6.5B में प्रस्तुत विस्तृत विश्लेषण दिखाता है कि वैध आवागमन (जैसा कि तालिका 9.4-9.7 में परिलक्षित है) कुल मुस्लिम आप्रवास का केवल एक छोटा अंश था। [40]

मैकार्थी के विश्लेषण या निष्कर्षों में इस तरह की सावधानी भरी टिप्पणी की कोई जगह नहीं बनती। बाकी के अनुमानों का अनुचित इस्तेमाल करते हुए, केवल पंजीकरण सूचियों के आधार पर अनुमान निकालते हुए, और क्षेत्रीय आर्थिक विषमता तथा प्रवासी प्रेरणा के संबंधों को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करते हुए मैकार्थी आत्मविश्वास से निष्कर्ष निकालते हैं,

1947 में रह रहे फ़लस्तीनियों का विशाल बहुमत उन लोगों के बेटे-बेटियाँ थे जो आधुनिक यहूदी आप्रवास शुरू होने से पहले फ़लस्तीन में रह रहे थे। यह मानने का कोई कारण नहीं है कि वे उन अरबों के बेटे-बेटियाँ नहीं थे जो कई सदियों से फ़लस्तीन में थे। [43]

क्षेत्रीय विरासत और राष्ट्रीय संप्रभुता के दावों से जुड़ा वैचारिक युद्ध यहीं निहित है। मैकार्थी के निष्कर्षों या इच्छाओं के विपरीत, यह मानने के पूरे आधार हैं कि ऑटोमन और ब्रिटिश मैंडेट काल में फ़लस्तीन में और फ़लस्तीन के भीतर अरबों का उल्लेखनीय आप्रवास हुआ। ऐसे आप्रवास के समर्थन में सबसे प्रभावशाली तर्कों में क्षेत्रीय आर्थिक विषमता और प्रवासी प्रेरणा के बीच वह संबंध है, जिसे सार्वभौमिक रूप से स्वीकार भी किया जाता है और व्यवहार में भी लाया जाता है।

फ़लस्तीन में और फ़लस्तीन के भीतर अरब आप्रवास का सटीक परिमाण, जैसा कि बाकी ने कहा, अज्ञात है। ऑटोमन पंजीकरण सूचियों और ब्रिटिश मैंडेट जनगणनाओं की अपूर्णता, और दोनों अवधियों में अमाप्य अवैध, अप्रतिवेदित और अनपकड़ा आप्रवास, किसी भी अनुमान को सृजनात्मक विश्लेषण की ओर एक साहसिक छलाँग बना देता है। ज़्यादातर मामलों में फ़लस्तीनी जनसांख्यिकी—या बहुत मोटे आँकड़ों पर आधारित दूसरे जनसांख्यिकीय विश्लेषण—के क्षेत्र में काम करने वाले लोग इसकी सीमाओं और निकाले जा सकने वाले निष्कर्षों की अनिश्चितता को स्वीकार करते हैं।

Fred M. Gottheil यूनिवर्सिटी ऑफ़ इलिनॉय के अर्थशास्त्र विभाग में प्रोफ़ेसर हैं।

1922

2.49

1927

2.10

1923

2.15

1928

2.34

1924

2.47

1929

2.35

1925

2.18

1930

2.81

1926

2.90

1931

2.74

[31] Palestine Blue Book , 1937 , पृ. 140. [32] उप-ज़िलेवार जनसंख्या गणना के लिए तथा 1948 का इसराइल बनने वाले और न बनने वाले उपविभागों को अलग करने की पद्धति के लिए देखें, Fred M. Gottheil, “Arab Immigration into Pre-State Israel: 1922-1931,” Middle Eastern Studies , 9 (1973): 315-24. यहाँ प्रस्तुत विश्लेषण इसी लेख का संक्षिप्त रूप है। [33] Justin McCarthy, The Population of Palestine (New York: Columbia University Press, 1990), पृ. 16-7, 33-4. [34] वही, पृ. 16. ज़ोर जोड़ा गया। [35] वही। [36] वही। [37] संबंध की चर्चा के सबसे क़रीब मैकार्थी अपने इस आग्रह में पहुँचते हैं कि मुस्लिम आबादी की वृद्धि का यहूदी आप्रवास से कोई या लगभग कोई संबंध नहीं था। उनके निष्कर्ष अन्य लोगों के अलावा रूथ कार्क, चार्ल्स इस्सावी, रॉबर्टो बाकी, यू.ओ. श्मेल्त्ज़, Fred M. Gottheil और मोशे ब्रेवर (Moshe Braver) के निष्कर्षों का खंडन करते हैं। मैकार्थी उनके प्रमाणों और प्रतिस्पर्धी निष्कर्षों को संबोधित न करने का चुनाव करते हैं, जबकि अन्य जनसांख्यिकीय मुद्दों पर श्मेल्त्ज़ और बाकी, दोनों के शोध का वे खुलकर हवाला देते हैं। [38] McCarthy, Population of Palestine , पृ. 33. [39] वही। [40] Bachi, Population of Israel , पृ. 133. ज़ोर जोड़ा गया। [41] वही, पृ. 389. [42] वही, पृ. 390. ज़ोर जोड़ा गया। [43] McCarthy, Population of Palestine , पृ. 34. ज़ोर जोड़ा गया।

मूल अंग्रेज़ी लेख पढ़ें: The Smoking Gun: Arab Immigration into Palestine, 1922-1931

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