ईरान का जल संकट: सत्ता-परिवर्तन के बाद की चुनौती
जाँच बताती है कि कुछ इलाक़ों का पानी आबादी से हटाकर औद्योगिक और सुरक्षा ठिकानों की ओर मोड़ा गया, जिनमें परमाणु प्रतिष्ठान भी शामिल हैं।
निक कौसर एक ईरानी-अमेरिकी पत्रकार और जल-प्रबंधन विश्लेषक हैं, जिनका ठिकाना वॉशिंगटन, डी.सी. है। पहले वह राजनीतिक कार्टूनिस्ट रहे हैं; अब वह ईरान के जल संकट पर एक साप्ताहिक कार्यक्रम का निर्माण करते हैं और उसकी मेज़बानी करते हैं।

ईरान पर नज़र रखने वाले बहुत-से लोग बढ़ती उत्तेजना के साथ इस्लामी गणराज्य के पतन का इंतज़ार कर रहे हैं: एक ऐसी व्यवस्था, जिसने क़रीब 47 साल तक शासन किया, विरोधियों पर शायद ही कोई रहम दिखाया, अल्पसंख्यकों को हाशिये पर धकेला और—क्रांति के बाद के उत्साह व शुरुआती जनसमर्थन का लाभ उठाकर—देश को उस दिशा में ले गई, जिसे अमेरिकी दार्शनिक हाना आरेंट (Hannah Arendt) ने “बुराई की सामान्यता” कहा था।
इस शासन के बाद जो बुनियादी ढांचे और पर्यावरण का मलबा बचेगा, वह बहुत बड़ा होगा। इस्लामी गणराज्य ने सिर्फ़ राजनीति को कुचला नहीं; उसने लाखों ईरानियों को और ग़रीब बनाया। और इस तबाही के केंद्र में सत्ता का एक ऐसा ढांचा है, जिसे बहुत-से विश्लेषक आज भी महज़ एक पंचलाइन समझकर ख़ारिज कर देते हैं: “वॉटर माफ़िया”। यह कोई मज़ाक़ नहीं है; बल्कि यह राष्ट्रीय बजट के बड़े हिस्सों को मेगाप्रोजेक्ट्स की ओर मोड़ता है—अक्सर बेहद कम निगरानी के साथ—और अरबों डॉलर को जमे-जमाए संरक्षण-तंत्रों में पहुँचा देता है, जिनमें इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) से जुड़ी इकाइयाँ भी शामिल हैं।
ईरान के जल संकट पर नज़र रखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए सच्चाई यह है कि “लोगों की मदद” बताकर बेचे गए बाँध-निर्माण और अंतर-बेसिन जल हस्तांतरण ने उलटा असर किया है: किल्लत बढ़ाई, पलायन को तेज़ किया, बेरोज़गारी और ग़रीबी को और गहराया—और क्षेत्रीय तनाव भड़काए। दशकों से शासन ने देश के दक्षिण-पश्चिम में ही सबसे बड़े मेगाप्रोजेक्ट्स केंद्रित किए हैं। नदियों के उद्गम क्षेत्रों पर बाँधों को स्थानीय समुदायों के सामने रोज़गार के इंजन और खेती के लिए स्थायी पानी की गारंटी के तौर पर पेश किया गया। कई मामलों में नतीजा यह निकला कि अल्पकालिक निर्माण-रोज़गार मिले, दीर्घकालिक जल-तनाव बढ़ा, और राजनीतिक संरक्षण को खाद-पानी मिला।
इस पूरी मशीनरी का बड़ा हिस्सा ख़ातम अल-अंबिया (Khatam al-Anbiya) के ज़रिए एक प्रमुख ठेकेदार के रूप में और माहाब क़ुद्स (Mahab Ghodss) के ज़रिए एक अहम परामर्श शाखा के रूप में चलता रहा है। नतीजा ज़ाग्रोस की तलहटियों और मैदानों में साफ़ दिखता है: तंगहाली, टैंकरों से पानी पाने वाले क़स्बे, और वे समुदाय जो कभी बड़ी नदियों के किनारे रहते थे, अब राशनिंग और सूखे नलों का सामना कर रहे हैं। जैसे-जैसे सतही प्रवाह घटा, किसानों ने भूजल का सहारा लिया—जब तक कि वह जीवनरेखा भी जवाब न देने लगी। इस बीच, लगातार हो रही जाँचें संकेत देती हैं कि कुछ पानी समुदायों से हटाकर रणनीतिक औद्योगिक और सुरक्षा स्थलों के लिए मोड़ा गया है, जिनमें परमाणु क्षेत्र से जुड़े प्रतिष्ठान भी शामिल हैं।
ईरान हज़ारों साल तक अनुशासित भूजल प्रबंधन के सहारे टिका रहा। 20वीं सदी के मध्य से यह अस्थिरता की ओर मुड़ गया: अत्यधिक दोहन ने देश के जल भंडार को चट कर दिया और कई प्रांतों में ज़मीन धँसने की समस्या शुरू कर दी। घनी आबादी वाले शहरी इलाक़ों में—ख़ासकर जहाँ भूकंपीय जोखिम अधिक है—धँसाव इस आशंका को बढ़ा देता है कि अगला बड़ा भूकंप सामूहिक हताहतों वाली घटना बन जाए।
लेकिन ईरान को इस समय जो भूकंप झकझोर रहा है, वह राजनीतिक है—और उसकी जड़ें दशकों के आर्थिक कुशासन तथा विनाशकारी जल-प्रबंधन में हैं। हाल की झड़पों और विरोध-प्रदर्शनों के भूगोल में एक पैटर्न दिखता है: कई हॉटस्पॉट उन इलाक़ों से मेल खाते हैं, जिन्होंने हाल के वर्षों में गंभीर जल-तनाव झेला है। बड़ा सवाल यह है कि क्या कोई पतन के बाद स्थिरता के लिए तैयारी कर रहा है।
ईरान चरम जल-दिवालियेपन के क़रीब पहुँच रहा है। वित्तीय दिवालियेपन को सँभाला जा सकता है: संस्थाएँ क़र्ज़ का पुनर्गठन करती हैं, नक़दी डालती हैं, वक़्त ख़रीदती हैं। जल-दिवालियापन कहीं ज़्यादा कठोर है: खपत वास्तविक संतुलन से आगे निकल चुकी है, माँग घटाने की कोई भरोसेमंद योजना नहीं है, और अधिकारी ऐसी आपूर्ति का वादा करते रहते हैं जो मौजूद ही नहीं। कई जलभृत (एक्विफ़र) खाली हो चुके हैं। ऐसी हालत में उबरने का मौका सिकुड़ती खिड़की बन जाता है—कोई गारंटीशुदा नतीजा नहीं।
हाँ, दक्षिण-पूर्वी तट पर अलवणीकरण (डीसैलिनेशन) घाटे का कुछ हिस्सा पूरा कर सकता है। लेकिन महँगे समुद्री जल के समाधान अकेले बाक़ी देश को नहीं बचा सकते। तर्कसंगत रास्ता है माँग का सख़्त प्रबंधन, बाढ़ के पानी को रोकना और जलभृतों का पुनर्भरण, अपशिष्ट जल का पुन:उपयोग, और उन प्रोत्साहनों को समाप्त करना जो अति-उपयोग को इनाम देते हैं। वॉटर माफ़िया की बरसों पुरानी इस दलील के उलट कि “और बाँध” ईरान को बचा लेंगे, ईरान की आपूर्ति की रीढ़ हमेशा भूजल ही रहा है। राष्ट्रीय जल-बचत का वह खाता अब लगभग सूख चुका है—और उसे फिर से भरने की ज़रूरत है, लूटने की नहीं। भूजल के क्षरण ने अरबों डॉलर के ठेकों को जायज़ ठहराने में मदद की, लेकिन इसने लाखों लोगों को इतना असुरक्षित भी बना दिया कि अब बहुतों को लगता है कि उनके पास खोने के लिए कुछ बचा ही नहीं।
पानी की कमी खाद्य कमी में बदल जाएगी। और अगर शासन के गिरने के बाद प्रतिबंध हट भी जाएँ, तब भी ईरान के बंदरगाह और लॉजिस्टिक्स सिस्टम जादुई ढंग से दोबारा खड़े होकर देश की ज़रूरतें पूरी करने नहीं लगेंगे। कुछ लोग मानते हैं कि शासन के जाते ही पूर्व युवराज रज़ा पहलवी (Reza Pahlavi) और उनकी टीम—नारों और विदेशी समर्थन से लैस—देश को ठीक कर देगी। लेकिन भले ही विशेषज्ञ उनकी योजनाओं का समर्थन करें, ज़मीन की हक़ीक़तें मनचाही सोच के आगे नहीं झुकेंगी। ईरान के भविष्य के लिए संसाधनों का टिकाऊ शासन और एक गर्म, सूखती जलवायु में ज़मीन को बचाने की गंभीर रणनीति चाहिए—ताकि सूखे, भूख और चरमराती सेवाओं के चलते लाखों लोग पलायन को मजबूर न हों। योजना अभी शुरू होनी चाहिए, और उसका मार्गदर्शन विशेषज्ञ करें, न कि किसी संभावित उद्धारक के इर्द-गिर्द मँडराने वाले चापलूस।
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