सूडान पर पश्चिम और मानवाधिकार संगठनों को दलगत खेल बंद करना ही होगा
ट्रंप प्रशासन का सूडान को लेकर रुख़ सही है और सामान्य परिस्थितियों में इसे दोनों दलों का समर्थन मिलना चाहिए था।
ख़ालिद ओमर यूसुफ़ सूडान के पूर्व ‘मंत्रिमंडल मामलों’ के मंत्री और सूडानी कांग्रेस पार्टी (Sudanese Congress Party) के उपाध्यक्ष हैं।

आज से कुछ ज़्यादा पाँच साल पहले, 25 अक्टूबर 2021 को, सूडानी सशस्त्र बलों के जनरल अब्देल फ़तेह अल-बुरहान और रैपिड सपोर्ट फ़ोर्सेज़ के नेता मोहम्मद हमदान दगालो, जिन्हें हेमेती कहा जाता है, ने प्रधानमंत्री अब्दल्ला हमदोक की नागरिक-नेतृत्व वाली संक्रमणकालीन सरकार का तख़्तापलट कर दिया, जो एक जनक्रांति के बाद बनी थी। बाद में दोनों जनरलों के बीच तनाव बढ़ता गया और अप्रैल 2023 में सूडान युद्ध में झोंक दिया गया, जिसमें संघर्ष को हवा देने में पूर्व इस्लामवादी शासन के अवशेषों ने बड़ी भूमिका निभाई। यह युद्ध दुनिया की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी बन चुका है। यह एक और बड़ी चीज़ का शिकार भी है: उस व्यवस्था का पीछे हटना, जिसे मेरे जैसे देशों के गिरने पर उन्हें थामना था।
सूडान जैसे युद्धों को रोकने के लिए बनाई गई संस्थाएँ लकवाग्रस्त हैं और अब कोई एक राजधानी यह तय कर सकती है कि वे काम करेंगी भी या नहीं। नवंबर 2024 में रूस ने ब्रिटेन द्वारा प्रायोजित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के एक प्रस्ताव पर वीटो कर दिया, जिसमें सिर्फ़ नागरिकों की सुरक्षा की मांग थी; बाकी 14 सदस्यों ने पक्ष में वोट दिया। हथियारों पर वह प्रतिबंध, जो इस युद्ध का गला घोंट सकता था, तभी से अटका पड़ा है, हालांकि इस पर शायद ही कोई विवाद हो कि विदेशी हथियार ही इसे धधकाए हुए हैं। अफ़्रीकी संघ का हाल भी बेहतर नहीं रहा: पिछले फ़रवरी में जब उसकी शांति एवं सुरक्षा परिषद सूडान पर बैठी, तो बहस बंदूक़ें ख़ामोश कराने पर नहीं, बल्कि इस पर थी कि किस पक्ष को वैध कहलाने का हक़ है।
सूडान हमेशा से भुलाया हुआ नहीं था। तीन दशकों तक यह वॉशिंगटन में दोनों दलों को जोड़ने वाला एक दुर्लभ मुद्दा रहा। डेमोक्रेट और रिपब्लिकन दक्षिण के गृहयुद्ध, दारफ़ुर नरसंहार और उमर अल-बशीर की इस्लामवादी तानाशाही पर दलगत रेखा लांघकर साथ आ जाते थे। आज का युद्ध उन्हीं युद्धों की जड़ें और वही भयावहता साझा करता है। बदला सूडान नहीं, बल्कि पश्चिम है, जहां विदेश नीति घरेलू सांस्कृतिक युद्ध का एक और मोर्चा बन गई है और दूर के संघर्षों को इस नज़र से पढ़ा जाता है कि वे पश्चिमी राजनीति के बारे में क्या कहते हैं, न कि इस नज़र से कि वे उन्हें भुगत रहे लोगों के साथ क्या कर रहे हैं।
इसी दरार से वह चीज़ निकली है जिसे कुछ लोग लाल-हरा गठजोड़ कहते हैं—अति-वामपंथ और राजनीतिक इस्लामवाद का एक गठबंधन, जिसके सूडान पर रुख़ पश्चिमी बहसों से उपजते हैं, सूडानी हक़ीक़तों से नहीं। यह युद्ध को उसकी जड़ों से—छह दशकों के सैन्य शासन और एक संकीर्ण सैन्य-इस्लामवादी अभिजात वर्ग द्वारा राज्य पर क़ब्ज़े से, जिसने बल के बूते शासन किया—अलग कर देता है और उसे एक वैश्विक होड़ में विशुद्ध प्रॉक्सी युद्ध बताकर पेश करता है। ब्रिटिश विदेश मंत्री यवेट कूपर (Yvette Cooper) ने फ़रवरी में कहा था कि एक दर्जन से अधिक देश इस युद्ध को हवा दे रहे हैं, फिर भी यह खेमा सिर्फ़ उन कुछ देशों को चुनता है जो उसके क्षेत्रीय नक़्शे में फ़िट बैठते हैं। और एक ही मिट्टी से बने दो लड़ाकू पक्षों की निंदा करने के बजाय यह एक को ढाल देता है, उस रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल पर भी चुप रहता है जिसकी पुष्टि अमेरिकी सरकार ने की है। जाने-माने मानवाधिकार संगठन भी अब एक आंख से देखते नज़र आते हैं।
इन पूर्वाग्रहों को ढकने के लिए यह ऐसे नारे उधार लेता है जिनकी सूडान में कोई पकड़ नहीं। “साम्राज्यवाद-विरोध” बुरहान और उनके साथी जनरलों पर नहीं चिपकता। “संप्रभुता” का हवाला यूं दिया जाता है मानो वह नागरिकों पर बमबारी का लाइसेंस हो, न कि उनकी रक्षा का कर्तव्य। “सूडानी समाधान” का नारा ठीक उन्हीं अफ़सरों के लिए लगाया जाता है, जिन्होंने विदेशी समर्थन से उस समाधान का तख़्तापलट किया जिसे सूडानियों ने दिसंबर 2018 की क्रांति में चुना था। अधूरे सच सबसे बुरे क़िस्म का झूठ होते हैं—और सबसे बुरे उनके लिए, जो मानवाधिकारों की ओर से बोलने का दावा करते हैं।
सूडान को चुकानी पड़ रही क़ीमत साफ़ है: इस रवैये ने युद्ध को लंबा खींचा है और त्रासदी को गहरा किया है। किसी मशहूर हस्ती का वीडियो दो सबसे सरल मांगों—युद्ध रोको और राहत आने दो—को लेकर वायरल नहीं हुआ, क्योंकि ध्यान कहीं और है। और ख़तरा सूडान की सीमाओं पर ख़त्म नहीं होता। सूडान वैश्विक मुस्लिम ब्रदरहुड की ट्रॉफ़ी है: वही एक देश, जिस पर उसने 30 साल राज किया, और जहां अब उसके पास एक सैन्य मोर्चे के पीछे से दोबारा राज करने का मौक़ा है। कुछ पश्चिमी वामपंथी ब्रदरहुड के विरोध को इस्लाम के प्रति शत्रुता मान लेते हैं, मानो वे सऊदी अरब, मिस्र, संयुक्त अरब अमीरात और जॉर्डन से भी बड़े मुसलमान हों, जिन सबने इसे ग़ैरक़ानूनी घोषित कर रखा है। ख़ार्तूम में इस्लामवादियों की वापसी का मतलब होगा लाल सागर पर आतंकवादियों की पनाहगाह, एक व्यापक क्षेत्रीय युद्ध और ईरान तथा पश्चिम के अन्य विरोधियों के लिए एक पुलसिरा। यह फ़िल्म हम पहले देख चुके हैं: पिछली बार जब सूडान के इस्लामवादियों के पास एक राज्य था, तो उसका अंत मैनहटन में आतंकवाद के साथ हुआ था।
इससे मैं वॉशिंगटन के दलगत पक्षधरों के लिए एक असुविधाजनक सच्चाई पर आता हूं: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यापक एजेंडे के बारे में कोई जो भी सोचे, सूडान को लेकर उनके प्रशासन का रुख़ सही है और सामान्य दुनिया में इसे दोनों दलों का समर्थन मिलना चाहिए था। इसने सूडान को प्राथमिकता बनाया—अपने बयानों में भी और अपने दूत मसाद बौलोस (Massad Boulos) की शटल कूटनीति में भी। इसने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और मिस्र के साथ क्वाड बनाया, एक रोडमैप तैयार किया जिसे वह हर अड़चन के बावजूद आगे बढ़ा रहा है, और उसे बहुपक्षीय क्विंटेट के साथ समन्वित किया। यह रोडमैप इस्लामवादी गुटों को लेकर स्पष्ट था और उसने ख़तरों को स्वीकारते हुए इस्लामवादियों को शांति प्रक्रिया से बाहर रखा। इसने मानवीय युद्धविराम को प्राथमिकता बनाया, समझौते का मसौदा तैयार किया और उसके लिए दबाव डाला। इसने सूडान के लोकतांत्रिक भविष्य का साफ़ पक्ष लिया और 2021 के तख़्तापलट को वैधता देने के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय रेखा बनाए रखी, जबकि अन्य पश्चिमी सरकारें बिना किसी स्पष्ट नैतिक औचित्य के उसे मान्यता देने की ओर बहती चली गईं, जिससे पता चला कि उनके लोकतांत्रिक मूल्य कहां जाकर रुक जाते हैं। इसने ब्रदरहुड की भूमिका को साफ़ शब्दों में नाम दिया, सूडानी इस्लामिक मूवमेंट को आतंकवादी संगठन घोषित किया। इसने सेना द्वारा रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल की पुष्टि की और साथ ही उनके प्रतिद्वंद्वियों पर भी उनके अत्याचारों के लिए प्रतिबंध लगाए। और इसने वर्षों में सबसे महत्वाकांक्षी कोशिश सामने रखी, ताकि युद्ध की विदेशी आपूर्ति लाइनें काटी जा सकें: सुरक्षा परिषद का एक प्रस्ताव, जो हथियार प्रतिबंध को पूरे सूडान और उसके हर पक्ष तक, ड्रोन समेत, बढ़ा देता। अजीब बात यह है कि इस रिकॉर्ड पर संदेह सूडानियों से ज़्यादा पश्चिम के कुछ हिस्सों में जताया जाता है।
सूडान को इसकी ज़रूरत नहीं कि पश्चिम ट्रंप पर सहमत हो। उसे ज़रूरत इसकी है कि पश्चिम सूडान पर सहमत हो, जैसा वह कभी था। युद्धविराम, खुले राहत गलियारे, विदेशी हथियारों पर रोक और उस नागरिक संक्रमण की वापसी जिसे सूडानियों ने चुना था—ये दलगत मांगें नहीं हैं। एक शालीन दुनिया 50 मिलियन लोगों के प्रति कम से कम इतना तो क़र्ज़दार है। ट्रंप प्रशासन ने सही दिशा तय कर दी है। उसे यह रास्ता अकेले नहीं चलना चाहिए।
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