अमेरिका में रह रहे ईरानी मुख़बिर की सूचना पर ईरान में अमेरिकी ग्रीन कार्ड धारक गिरफ़्तार
किसी भी सरकार को विदेश में जुटाई गई जानकारी के आधार पर अभिव्यक्ति की आज़ादी का इस्तेमाल करने वालों को सज़ा नहीं देनी चाहिए।
पॉटकिन अज़ारमेहर मूल रूप से ईरान से ताल्लुक़ रखने वाले ब्रिटिश खोजी पत्रकार और वृत्तचित्र निर्माता हैं। उन्होंने विभिन्न मीडिया संस्थानों और नीति अनुसंधान संस्थाओं के लिए योगदान दिया है, जहां उन्होंने मध्य-पूर्व के मामलों और पश्चिम में इस्लामी चरमपंथ का गहन विश्लेषण पेश किया है।

अरिज़ोना में रहने वाली एक ईरानी महिला को कथित तौर पर तब गिरफ़्तार किया गया, जब विदेश में शासन-विरोधी प्रदर्शनों में उसकी भागीदारी के बाद एक अन्य ईरानी ने एक ऑनलाइन मंच के ज़रिए इस्लामी गणराज्य के अधिकारियों को उसकी पहचान बता दी।
ईरानी समाचार वेबसाइटों ने ईरान में मेहरांगीज़ रास्तीन (Mehrangiz Rastin) की गिरफ़्तारी की ख़बर दी, लेकिन शुरुआती रिपोर्टों में इस बारे में बहुत कम जानकारी थी कि रास्तीन ने कहाँ प्रदर्शन किया था। इन वेबसाइटों ने एक वीडियो प्रसारित किया, जिसमें वह ईरान से बाहर कहीं एक प्रदर्शन में नाचती और गाती दिख रही हैं, और यह भी बताया कि ईरान में उन्हें कहाँ गिरफ़्तार किया गया। लेकिन इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) से संबद्ध फ़ार्स न्यूज़ एजेंसी ने बाद में कुछ स्क्रीनशॉट प्रकाशित किए, जिनसे यह पता चलता प्रतीत हुआ कि उनके बारे में जानकारी ईरानी अधिकारियों तक कैसे पहुँची।
इन स्क्रीनशॉट के मुताबिक़, अरिज़ोना में रहने वाले किसी व्यक्ति ने इलाज [Cure] (Elaj) नाम के एक ऑनलाइन मंच का इस्तेमाल करके रास्तीन के बारे में रिपोर्ट दर्ज कराई। मुख़बिर ने उन्हें एक Uber ड्राइवर बताया, जो 18 साल से अमेरिका में रह रही थीं और जिनके पास ग्रीन कार्ड था। इस सबमिशन में उनके पति के बारे में भी ब्योरा था, जिनका कथित तौर पर एक कार शोरूम है; उनकी यात्राओं का ज़िक्र था; यह भी कि उनके परिवार में एक बहाई सदस्य है; और यह कि परिवार ने अरिज़ोना में शासन-विरोधी प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था।
अगर रास्तीन की गिरफ़्तारी की ख़बरें सही साबित होती हैं, तो यह अंतरराष्ट्रीय दमन का स्पष्ट मामला है: इस्लामी गणराज्य अपनी सीमाओं से बाहर रहने वाले लोगों को धमकाने, परेशान करने, चुप कराने या मजबूर करने के लिए भौतिक या डिजिटल साधनों का इस्तेमाल कर रहा है।
इलाज ने विदेश में रहने वाले कई ऐसे ईरानियों की निजी जानकारी प्रकाशित की है, जिन्होंने प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था। शासन ने लोगों से आग्रह किया कि वे इस मंच के ज़रिए दूसरों की पहचान करें और उनकी रिपोर्ट करें। कुछ प्रोफ़ाइलों में असली नाम, तस्वीरें, राष्ट्रीय पहचान संख्याएँ, जन्मतिथियाँ और पिता के नाम तक शामिल हैं।
Islamic Republic of Iran Broadcasting ने इस परियोजना का सक्रिय रूप से प्रचार किया है, फिर भी यह साफ़ नहीं है कि इसे कौन-सी सुरक्षा या सरकारी इकाई चला रही है।
शासन इससे पहले भी ईरान के भीतर प्रदर्शनकारियों की पहचान के लिए मुख़बिरों और डिजिटल रिपोर्टिंग प्रणालियों का इस्तेमाल करता रहा है। इलाज इस चलन को ईरानी प्रवासी समुदाय तक बढ़ाता दिखता है और लोगों को विदेश में प्रदर्शन करने वाले अपने ही हमवतन ईरानियों की शिकायत करने के लिए उकसाता है। निगरानी और चुग़ली की यह संस्कृति न तो इलाज के साथ शुरू हुई और न ही डिजिटल तकनीक के आने के साथ। इसकी जड़ें इस्लामी गणराज्य में बहुत गहरी हैं।
1982 में, इस्लामी गणराज्य के संस्थापक आयतुल्लाह रूहुल्लाह ख़ुमैनी ने शैक्षणिक वर्ष की शुरुआत में ईरानी छात्रों को एक संदेश भेजा था, जिसमें उन्होंने छात्रों से अपने शिक्षकों, सहपाठियों और यहाँ तक कि परिवार के सदस्यों की जासूसी करने का आग्रह किया था। चार दशक से ज़्यादा बीत जाने के बाद भी यह निर्देश शासन की हुकूमती मानसिकता का हिस्सा बना हुआ है। तरीक़े बदल गए हैं, लेकिन मूल सिद्धांत नहीं बदला: हर किसी को हर किसी पर नज़र रखनी चाहिए, और जो कोई शासन की वैचारिक सीमाओं से बाहर क़दम रखे, उसकी जाँच-पड़ताल होनी चाहिए।
2019 में ईरान की न्यायपालिका ने एक टेक्स्ट-मैसेजिंग प्रणाली शुरू की, जिसके ज़रिए लोग कथित अपराधों की एक लंबी सूची को लेकर दूसरों की शिकायत कर सकते थे, जिनमें इस्लामी हेडस्कार्फ़ हटाना, पार्टियाँ करना, शराब पीना, सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक मानी जाने वाली पोस्ट डालना, या ऐसी कोई भी गतिविधि शामिल थी जिसे अधिकारी शासन के नियमों के ख़िलाफ़ मानते हों।
जनवरी 2026 में प्रदर्शनकारियों के नरसंहार के बाद दुनिया भर में हुए शासन-विरोधी प्रदर्शनों के बाद, ईरानी अधिकारियों ने स्पष्ट रूप से इलाज के ज़रिए इस मॉडल को ईरान की सीमाओं से बाहर भी फैला दिया है। इसके निहितार्थ गंभीर हैं। ऐसी व्यवस्था, जो लोगों को ईरानी प्रवासी समुदाय के अपने ही सदस्यों की शिकायत करने के लिए प्रोत्साहित करती है, पूरे समुदायों को संदेह के घेरे में ले आने का जोखिम पैदा करती है। यह उन लोगों को डराने-धमकाने, परेशान करने और उनकी निजी जानकारी जुटाने के मौक़े भी देती है, जिन्होंने उन देशों में कोई अपराध नहीं किया है जहाँ वे रहते हैं।
ब्रिटेन की संसद की मानवाधिकार संबंधी संयुक्त समिति ने अंतरराष्ट्रीय दमन पर अपनी जुलाई 2025 की रिपोर्ट में इस व्यापक ख़तरे को स्वीकार किया। समिति ने निष्कर्ष निकाला कि ब्रिटेन विदेशी दमन की निगरानी और उस पर नियंत्रण पर्याप्त रूप से नहीं करता। उसने सरकार से आग्रह किया कि वह अंतरराष्ट्रीय दमन की औपचारिक क़ानूनी परिभाषा अपनाए, पुलिस के लिए व्यवस्थित आँकड़ा संग्रह और प्रशिक्षण अनिवार्य करे, पीड़ितों के लिए एक समर्पित हॉटलाइन स्थापित करे, इंटरपोल के रेड नोटिस के दुरुपयोग में सुधार करे, और सार्वजनिक भागीदारी के विरुद्ध रणनीतिक मुक़दमों (Strategic Lawsuits Against Public Participation) से निपटे।
ये सिफ़ारिशें इसलिए मायने रखती हैं क्योंकि अंतरराष्ट्रीय दमन हमेशा हत्या की साज़िश, शारीरिक हमले या किसी विदेशी ख़ुफ़िया अधिकारी की सीधी धमकी का रूप नहीं लेता। इसमें निगरानी, डराना-धमकाना, उत्पीड़न, निजी जानकारी जुटाना और अपने ही समुदाय के सदस्यों को निशाना बनाने के लिए लोगों को लामबंद करना भी शामिल हो सकता है।
हम नहीं जानते कि रास्तीन ने ईरान जाने का फ़ैसला क्यों किया, लेकिन अगर उनकी गिरफ़्तारी की ख़बरें सही हैं, तो ये परिस्थितियाँ कड़ी अंतरराष्ट्रीय निंदा की माँग करती हैं। किसी भी सरकार को विदेश में जुटाई गई जानकारी का इस्तेमाल करके लोगों को अभिव्यक्ति और सभा की आज़ादी का इस्तेमाल करने के लिए दंडित नहीं करना चाहिए।
जनवरी के नरसंहार के दौरान अपने आचरण को सही ठहराने की इस्लामी गणराज्य की कोशिशों में एक विरोधाभास भी है। ईरानी अधिकारियों ने विदेशी मीडिया से कहा है कि जो लोग मारे गए, गिरफ़्तार किए गए और जिन्हें फाँसी दी गई, वे शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी नहीं, बल्कि एक सशस्त्र और हिंसक विद्रोह में शामिल लोग थे। इन अधिकारियों ने ज़ोर देकर कहा है कि प्रशासन शांतिपूर्ण प्रदर्शन का सम्मान करता है।
लेकिन यह दलील तब ढह जाती है, जब शासन ईरान से बाहर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले ईरानियों को निशाना बनाता है। अरिज़ोना में नाचने, गाने और प्रदर्शन करने वाले लोग आख़िर इस्लामी गणराज्य के लिए क्या ख़तरा हैं? शासन को उन देशों में उनकी राजनीतिक गतिविधियों की चिंता क्यों करनी चाहिए, जहाँ उन्हें अपना विरोध व्यक्त करने का पूरा अधिकार है?
छात्रों से अपने शिक्षकों, सहपाठियों और परिवारों की जासूसी करने की ख़ुमैनी की 1982 की अपील ने एक ऐसे निगरानी-राज्य की मानसिकता को सामने रखा था, जो नागरिकों के एक-दूसरे पर संदेह और चुग़ली पर टिका है। चार दशक बाद, इलाज ने उसी तर्क को एक डिजिटल मंच और अंतरराष्ट्रीय पहुँच दे दी है।
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