ईसाई ज़ायनवाद की आलोचना करने वाले यरूशलम के कुलपतियों के बयान का धर्मशास्त्रियों ने खंडन किया
इसराइली ईसाइयों और इस्लाम से धर्मांतरित लोगों ने इस घोषणापत्र पर इस्लाम के प्रति समर्पणकारी रुख़ अपनाने का आरोप लगाया।
जूल्स गोम्स रोम में रहने वाले बाइबिल विद्वान और पत्रकार हैं।

ईसाई धर्मशास्त्री यरूशलम के कुलपतियों और चर्चों के प्रमुखों के एक बयान की कड़ी आलोचना कर रहे हैं, जिसमें ईसाई ज़ायनवाद को एक “हानिकारक” विचारधारा बताया गया है और कहा गया है कि इसका इस्तेमाल “जनता को गुमराह करने, भ्रम फैलाने और हमारे अनुयायियों की एकता को नुक़सान पहुँचाने” के लिए किया जाता है।
17 जनवरी, 2026 की यह घोषणा सोशल मीडिया पर तब तेज़ी से फैली जब यहूदी-विरोधी इन्फ़्लुएंसरों, संयुक्त राष्ट्र की विशेष दूत फ़्रांसेस्का अल्बानीज़ (Francesca Albanese) और हेरिटेज फ़ाउंडेशन के उपाध्यक्ष रॉजर सेवेरिनो (Roger Severino) ने—जिन्होंने बाद में अपना ट्वीट हटा दिया—इसे इसराइल का समर्थन करने वाले ईसाइयों पर हमले के लिए हथियार की तरह इस्तेमाल किया।
यह बयान वामपंथ और “वोक राइट” के इसराइल-विरोधी कार्यकर्ताओं की एक संगठित कोशिश का हिस्सा है, जिसका मक़सद उन इवेंजेलिकल ईसाइयों को बदनाम करना है, जो इसराइल को मिलने वाले अमेरिकी समर्थन की रीढ़ हैं। यह घटनाक्रम फ़ॉक्स न्यूज़ के पूर्व होस्ट टकर कार्लसन के उस हमले के बाद आया है, जिसमें उन्होंने नव-नाज़ी पॉडकास्टर निक फ़्यूएंटेस (Nick Fuentes) के साथ एक इंटरव्यू में ईसाई ज़ायनवाद को “ईसाई विधर्म” और “दिमाग़ी वायरस” कहा था।
हालांकि़ बिना हस्ताक्षर वाली इस घोषणा में दावा किया गया है कि नाम न बताए गए ये नेता “धार्मिक, सामुदायिक और पादरी जीवन” के मामलों में पवित्र भूमि के चर्चों का प्रतिनिधित्व “अकेले” करते हैं, लेकिन पहले के हस्ताक्षरित बयानों से पता चलता है कि इस निकाय में पूर्वी और ओरिएंटल ऑर्थोडॉक्स तथा पूर्वी और रोमन कैथोलिक धर्माध्यक्षों के साथ-साथ लूथरन और एपिस्कोपल पादरी भी शामिल हैं। पोप लियो XIV के दूत कार्डिनल पिएरबतिस्ता पित्साबल्ला (Pierbattista Pizzaballa) इस संगठन के सबसे प्रमुख धर्मगुरु हैं।
बयान में चर्च नेताओं ने ऐसे व्यक्तियों पर हमला किया है जिनका इसराइल ने “स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर आधिकारिक रूप से” स्वागत किया, और परोक्ष रूप से उन 150 इवेंजेलिकल पत्रकारों और 1,000 पादरियों की ओर इशारा किया है जिन्हें इसराइली सरकार ने हाल में यरूशलम में हुए सम्मेलनों के लिए आमंत्रित किया था। साथ ही उन्हें चेतावनी दी गई है कि वे “चर्चों के आंतरिक जीवन” में दख़ल न दें।
बयान में “ईसाई ज़ायनवाद” शब्द की व्याख्या नहीं की गई है, जिसे इंटरनेशनल क्रिश्चियन एंबेसी जेरूसलम (International Christian Embassy Jerusalem) ऐसे ईसाइयों के रूप में परिभाषित करती है जो “यहूदी लोगों के अपनी मातृभूमि लौटने के अधिकार” का समर्थन करते हैं। आंद्रे विलन्यूव (André Villeneuve) और गैविन डी’कोस्टा (Gavin D’Costa) जैसे शीर्ष कैथोलिक धर्मशास्त्री तो “कैथोलिक ज़ायनवाद” की भी पुष्टि करते हैं; विलन्यूव का तर्क है कि ज़ायनवादी यहूदी, ईसाई या ग़ैर-धार्मिक हो सकते हैं।
मिशिगन की सेक्रेड हार्ट मेजर सेमिनरी के प्रोफ़ेसर विलन्यूव कहते हैं, ज़ायनवाद “उन्नीसवीं सदी के प्रोटेस्टेंट डिस्पेंसेशनलिज़्म की उपज नहीं है, बल्कि धर्मग्रंथ में गहराई से निहित है।” “अगर इसराइल के लिए ईश्वर के वरदान और आह्वान अपरिवर्तनीय हैं, तो इसमें भूमि का वरदान और उसमें रहने का इसराइल का आह्वान भी शामिल होना चाहिए।”
रोम के पोंटिफ़िकल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सेंट थॉमस एक्विनास के व्याख्याता डी’कोस्टा लिखते हैं, “यहूदी लोगों के चयन का बिना शर्त वरदान ही कैथोलिक ज़ायनवाद की धर्मशास्त्रीय बुनियाद है।” “नए नियम के कई पाठ इस धारणा का समर्थन करते हैं कि कैथोलिकों को ज़ायनवाद का समर्थन करना चाहिए। ख़ुद ईसा मसीह एक यहूदी ईसाई ज़ायनवादी थे।”
जेरूसलम सेमिनरी में धर्मशास्त्र के डिस्टिंग्विश्ड प्रोफ़ेसर, एंग्लिकन धर्मशास्त्री जेराल्ड मैकडरमॉट (Gerald McDermott) कहते हैं, “विडंबना यह है कि ये बिशप ईसाई ज़ायनवाद की निंदा कर रहे हैं, जबकि उनके अपने चर्च ने ठीक उन्हीं सच्चाइयों की घोषणा की है जिनकी वे भर्त्सना कर रहे हैं।”
मैकडरमॉट बताते हैं कि किस तरह वैटिकन II के Nostra Aetate में रोमियों 9 को उद्धृत कर यह पुष्टि की गई है कि आज के यहूदियों के पास भी “पुत्रत्व और महिमा और वाचाएँ और व्यवस्था और उपासना और प्रतिज्ञाएँ” बनी हुई हैं, और 1991 में पोप जॉन पॉल द्वितीय ने पिछली शताब्दियों में यहूदियों के “इसराइल के पर्वतों” पर लौटने को ईज़ेकिएल की प्रतिज्ञा की पूर्ति बताया था।
The New Christian Zionism: Fresh Perspectives on Israel and the Land के संपादक मैकडरमॉट चेतावनी देते हैं, “यह दुखद है कि 1930 के दशक की याद दिलाने वाले इस विस्फोटक यहूदी-विरोध के दौर में ये बिशप—चर्च की शिक्षा के विपरीत जाकर—इन नफ़रती आरोपों को विश्वसनीयता दे रहे हैं कि इसराइल के साथ ईश्वर की वाचा समाप्त हो चुकी है और इसराइल राष्ट्र के अस्तित्व का कोई औचित्य नहीं है।”
रीजेंट यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर और उसके इंस्टीट्यूट फ़ॉर इसराइल स्टडीज़ के निदेशक ए.जे. नोल्टे (A.J. Nolte) का कहना है कि यह बयान कुलपतियों के “आंतरिक ज़िम्मीपन (dhimmitude)” को उजागर करता है। नोल्टे इसे “इसराइल के भीतर और उससे कहीं अधिक फ़लस्तीनी इलाक़ों में, अरब ईसाइयों की मुस्लिम हितों के प्रति अनकही अधीनता” के रूप में परिभाषित करते हैं।
नोल्टे अफ़सोस जताते हैं, “अरब ईसाइयों से मूल रूप से यही अपेक्षा की जाती है कि वे अरब हित को सक्रिय रूप से बढ़ावा दें और उसका समर्थन करें, वरना अंजाम भुगतें।” “ईसाई ज़ायनवाद पर निशाना साधना, इसराइल पर निशाना साधने से ज़्यादा आकर्षक है। इसके अलावा, ईसाई ज़ायनवादियों पर हमला करने से इसराइली अधिकारियों के साथ उनके रिश्तों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।”
नोल्टे यह भी जोड़ते हैं कि अधिकांश ईसाई ज़ायनवादी इवेंजेलिकल हैं, और बिशप ऐतिहासिक कारणों से इवेंजेलिकलों को पसंद नहीं करते। इनमें यह बात भी शामिल है कि “इवेंजेलिकल अक्सर मुसलमानों का धर्मांतरण कराने की कोशिश भी करते हैं, जिसे पारंपरिक चर्च प्रायः हतोत्साहित करना चाहते हैं।” नोल्टे का कहना है कि इन सभी कुलपति-आसनों के इसराइल के साथ संपत्ति संबंधी विवाद भी चल रहे हैं।
धर्मशास्त्री यह भी बताते हैं कि ऐसे बयानों का बिशपों पर व्यावहारिक रूप से कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता, क्योंकि बिशप जानते हैं कि अगली बार जब हमास या कोई दूसरा कट्टरपंथी फ़लस्तीनी गुट किसी चर्च को बंधक बनाएगा—जैसा उन्होंने चर्च ऑफ़ द नेटिविटी के साथ किया था—तो इसराइली रक्षा बल फिर भी उन्हें बचाएगा।
प्रमुख इसराइली ईसाइयों ने भी इस बयान की निंदा की है। आरामी ईसाई और नेसेट के पूर्व उम्मीदवार शादी ख़ल्लूल (Shadi Khalloul) ने इस “बिना हस्ताक्षर वाले बयान” को यह “स्वीकारोक्ति” बताया “कि ईसाई अरब इस्लामी सरकारों के उत्पीड़न का शिकार हैं और उन्हें लगता है कि ज़िम्मी चर्च वाला रवैया अपनाने से सुरक्षा मिलती है।”
इस्लाम से ईसाई धर्म अपनाने वाले जॉर्डन के लेखक दान बुरमावी (Dan Burmawi) ने ट्वीट किया, “अगर अरब चर्च इसराइल की निंदा करे, तो कुछ नहीं होता। अगर अरब चर्च इस्लामी जिहाद की निंदा करे, तो बहुत कुछ होता है।” “यही वजह है कि पूरे अरब जगत के चर्च इसराइल की निंदा करने में तेज़ी दिखाते हैं, और इस्लामी जिहाद की निंदा लगभग कभी नहीं करते।”
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